आधुनिक सामाजिक फंडे बनाम जिम्मेदार परवरिश- थोड़ा उलाहना, थोड़ी अपील

लड़की को सब कुछ चाहिए था लाइफ में, द होल पैकेज ।

तो उसे पेकेज ही बना छोड़ा उसके आशिक ने । 

माँ-बाप को धता बताकर वासना में अंधी लड़की लिव-इन में तो रह ही रही थी । उसका यार पार्टनर के तौर पर हिट साबित हुआ था, ज़ाहिर है हस्बेंड के रोल में भी लड़की ने उसे ही फिट करना चाहा ।

वैसे वह एक रेस्तरां में शेफ का काम कर चुका था । खाना बहुत लज़ीज़ बनाता रहा होगा । फूड ब्लॉगर भी था । साज-सज्जा करने में एकदम निपुण । क्या कहते हैं उसे – ड्रेसिंग?

ओवर-कोन्फ़िडेंस की मारी लड़की भाँप नहीं पायी कि अच्छा मटन अच्छा पकाने वाला, जिस्म के टुकड़े करने में भी तो निपुण होगा । वासना के बुखार और बगावत के तेवरों में जवान लोग इतना केलकुलेट नहीं कर पाते ।  

खैर, विक्टिम शेमिंग करने की मेरी कोई मंशा नहीं है । लेकिन इस क्राइम में कोई विक्टिम लगता भी नहीं । ये 1998 नहीं है जो आपको लव जिहाद से जुड़े खतरों का अंदाज़ा नहीं है । जान बूझकर भंवर में कूदने वाले को गोताखोर कहते हैं, पीड़ित नहीं । और गोताखोर कभी –कभार डूब भी जाया करते हैं । डेटिंग साइट पर टकराए लड़के के लिए जो शहर छोड़ दे, परिवार को लात मार दे, उनसे संपर्क तक काट ले, वह अपनी नियति को एक निश्चित दिशा में मोड़कर किसी गंतव्य की ओर जाना चाह रही थी, सो पहुँच गयी, या पहुंचा दी गयी  ।

वैसे अजीब सोच है, आज़ादी के ख्याल भी पालने हैं, और सामने वाले को ग़ुलाम भी बनाना है । लिव-इन में रहते हुए शादी के लिए दबाव बनाना ब्लैकमेल माना जाना चाहिए । ‘शादी का वादा करके झांसा देना’ – यह वाक्यांश आलसी पत्रकारों, मक्कार वकीलों और नाकारा पुलिसवालों की मिलीभगत से उपजा है। झांसा देना, बरगलना, फुसलाना, मुकर जाना – अपनी मूर्खता छिपने के लिए क्या बकवास बहाने हैं ।  घर से भागकर अंजान लड़के के साथ हमबिस्तर होने और साथ रहने की अक्ल है, पर सच्चे और झूठे वादे का फर्क समझ नहीं आता? और इतनी ही महत्वपूर्ण थी शादी और रिश्ते की पवित्रता, तब काहे नहीं काबू में रखा जिस्मानी भूख को?

लड़की का बाप अब कह रहा है कि हत्यारा उसकी बेटी के साथ मारपीट भी करता था । लड़की पिटती रही पर इस महानुभाव ने न पुलिस में कम्प्लेन्ट दर्ज कराई, न ही उसके बचाव के लिए अन्य कदम ही उठाए । लड़की को भी पता था कि आशिक लंपट है और अन्य लड़कियों के साथ संपर्क में है । वह सेटल होना ही नहीं चाहता था । अरे तभी तो लिव-इन में रह रहा था, वरना निकाह नहीं कर लेता । अब यह कौन सा खगोलशास्त्र है ? तब भी हाय रे ज़िद ! लेकिन जब मियां ही नहीं था राज़ी, तो क्या मरवा लेता अपनी काज़ी?

वैसे न शरीर के टुकड़े मिले हैं, न ही टुकड़े करने के लिए इस्तेमाल किया गया हथियार । लड़के का आदर्श महान सीरियल किलर डेक्सटर है । पुलिस को दुर्गंध तक हाथ नहीं लगी । अब अगरबत्ती जलाता था और इत्र छिड़कता जैसी फालतू दलीलें दे रही है । फॉर्मलडिहाइड या अन्य रसायन कहाँ से खरीदे, यह भी अब पता लगना मुश्किल है । बड़ा फ्रिज़ खरीदना कुछ साबित नहीं करता । फ्रिज़ को कई-कई बार डिटर्जेंट से धोया गया होगा । खून-बोटियाँ इत्यादि सब साफ कर दिये गए हैं । डीएनए नहीं मिला तो केस ठहरेगा ही नहीं । वैसे डीएनए मिल भी गया तो मुकदमा लाश ठिकाने लगाने का चल सकता है, हत्या भी उसी ने की है, ये कैसे साबित होगा । पुलिस के समक्ष दिया गया बयान ढेले भर का महत्व नहीं रखता । वकील दलील दे देगा कि प्रताड़ित करके जबरन बयान दिलवाया गया है । तब न्यायमूर्ति बयान को कचरे में फेंक देगा । तथाकथित हत्यारे को मानसिक रोगी के तौर पर भी पेश किया जाएगा । लिब्रांडु और वामी-कामी मीडिया कवर फायर दे देगा । ऐसी भूमिका अभी से बनने लगी है ।

आज देश में चर्चा का विषय यह है कि आशिक मे छत्तीस टुकड़े किए, या पैंतीस , या फिर बीस ही ? ऐसी भी खबरें हैं कि लड़की के टुकड़े फ्रिज़ में पड़े रहते भी हत्यारा अन्य लड़कियों को कमरे पर ले गया था । बहुत से किटाणुओं को उत्कंठा है कि क्या खूनी ने लड़की का मांस भी चखा होगा, या फिर इन दूसरी लड़कियों को भी स्पेशल रेसिपी कहके परोसा होगा? अब तक ऐसी कोई मसालेदार खबर पुलिस के हवाले से लीक नहीं हुई है । लिब्रांडु हत्यारे की पहचान छुपाने में लगे हुए हैं । उनपर मामले को सेकुलर रंग देनी कि ज़िम्मेदारी है । इस हत्याकांड को लव जिहाद के तार्किक फल के रूप में भी प्रचारित किया जा रहा है । जो ठीक ही है । सवारी अपने जानमाल की हिफाज़त के लिए खुद ही सतर्कता बरते, इक्कीसवीं सदी में ऐसी उम्मीद करना बेमानी नहीं है । फेमिनिस्ट्स थोड़े भरमाए से हैं – पित्रसत्ता और मजहब, दोनों को ही चुनौती देने वाली लड़की के साथ हादसा घटा है । वे कह सकते हैं कि बंधनों से मुक्त होकर बंधन में बंधने-बांधने की कोशिश में रिश्ता गड़बड़ा गया । आम आदमी के लिए सबक एकदम साफ है – अपनी औलादों को लव जिहाद के संभावित दुष्परिणामों से अवगत करवाएँ, आधुनिकता और प्राइवेसी के नाम पर बच्चों पर पकड़ बहुत ढीली नहीं करें और उन्हें किसी संकट में पाएँ तो न्यूक्लियर बटन का इस्तेमाल करें । जिसका बच्चा गया है, विक्टिम वही है – अपनी बची हुई ज़िंदगी में बदनसीब माँ-बाप को यह भयावह घटना हर रोज़ खुरचेगी ।


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