कवितायें लिख और चंबल में डाल (कविता)

कवितायें लिखते रहने से न कहीं क्रांति होगी न ही दूर किसी भटके हुए की भ्रांतियाँ होंगी कहाँ किसी ब्रह्मज्ञानी के विचार कभी बदलेंगे न ही पापियों, दुष्टों के अत्याचार कहीं घटेंगे   हाँ , दूर अवश्य  होगी मेरी बेरोजगारी हो चाहे निकासी ज़रूरी संभव है उदर में भरी गैस की थोड़ी कम हो जाए…

ओ पत्तलकार ! (कविता)

( यह कविता उनको संबोधित करती जो देश की बदनामी के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं ) जलती लाशें देख चेहरे पर इतनी लाली क्यूँ है आँखें मौत का मंज़र देख कर भी मतवाली क्यूँ हैं प्राणवायु पड़ गयी कम   चहुंओर फैला है ग़म फिर भी तेरी चहक में ये कव्वाली…

छप्पन फाड़ के ऑक्सिजन ही ऑक्सिजन

देश के कोने-कोने में दिन-प्रतिदिन जितने ऑक्सिजन प्लांट बनाए जाने की घोषणा हो रही है , उसको देखकर लगता है भारत में एक दिन ऐसा भी आयेगा जब प्यार मांगोगे तो ऑक्सिजन मिलेगी, रोटी मांगोगे तो साथ में तरकारी की जगह  ऑक्सिजन और अगर गलती से किसी ने खीर मांग ली तो उसे जबरन ऑक्सिजन…

WATCHING THEM AGAIN- For the Sake of Love

First viewings pass by like sea breeze. One hopes that the Second viewing shall bring rains, as the Westerlies do. Sometimes, they do leave one flooded with joys of rediscovery. Many a times, high expectations are not met, and tedium sets in. The repeat always carries that risk. The eagerness of the first union is…

फूलों पर फिसले हुए (कविता)

फूलों पर फिसले हुए, पत्तियों के प्रति उदासीन, क्या ही मतलबी शौकीन ! रंगीनियत पर कुर्बान, चकाचौंध पर हलकान, गए-गुजरे लंपट आशिकों से ! (6) किसी ने कह दिया, वाह क्या रंग है ! क्या भीनी-भीनी गंध है ! भिनभिनाते भौरों से प्रेरित, मचलती तितलियों से मदोनमत्त, कसीधे पढ़ते रहे फूलों की शान में ।12।…

लौहपथगामिनी में दिव्य निपटान

(अगर आपको गंदगी , पाखाने और सच से घिन आती है तो कृपया आगे न पढ़ें , क्यूंकी यह ब्लॉग इन्हीं सब के बारे में है, और इसे पढ़ना भयावह हो सकता है ) वास्तविक टाइटल – “ट्रेन में टट्टी” बत्तीस घंटे का लंबा सफर है देवास से कोलकाता का । इतनी देर में किसी…

लॉकडाऊन में शादियाँ का महात्म्य

देश के कई शहरों में लॉकडाऊन लगा हुआ है । घर से निकलना, बाज़ार करना, व्यापार चलाना, भीड़ जमा करना – सब पर अंकुश है । फल-सब्जी-दूध भी समयानुसार मिल रहे हैं । रातों का कर्फ़्यू लागू है । ज़िंदगी और मौत में धागे भर का फरक बचा है । ऐसे में आज मोहल्ले मे…

सन सत्तासी में सलीम मलिक का जलवा-ए-ईडन

कल शाम ठाकुर साहब के संग महफिल लगी थी । नौकरी, राजनीति और मौसम से सरकते-घिसटते हुए बातचीत अंततोगत्वा क्रिकेट तक पहुंची । आईपीएल  के सस्ते होहल्ले से दूर हमारी चर्चा के केंद्र में थी मध्यकालीन क्रिकेट । (मेरे हिसाब से प्राचीन काल प्रथम एक-दिवसीय विश्वकप, अर्थात प्रूडेंशियल कप 1975 तक का; 1975 से 1999…

Our Caricatured Heroes : How Nehru became Chacha & Other Tragedies

A couple of photographs of Bhagat Singh wearing red and yellow turbans, and sporting some stubble were published in the I&B Ministry and the Punjab Government advertisements in 2010. They were criticized by Bhagat Singh’s family, Prof. Chaman Lal and Bipan Chandra on the ground that Bhagat Singh had renounced (not just stopped sporting) his…

कोई चुनाव शेष न रह जाएँ (कविता)

देखना , देश में कोई चुनाव शेष न रह जाएँ हमारे प्रचार माध्यम दो पल सुस्ताने न पाएँ ऐसी कोई रैली न रहे जिसका आयोजन न हो कोई रोड़ शो ऐसा जिसमे जन-अभिवादन न हो कोई कोना, कोई बूथ जहां हम पहुँच न सकें कोई वार्ड, कोई सीट जिसपर हम लड़ न सकें  (6) देखना,…

WHY COULD JAWAHARLAL NOT TOLERATE “PRIYA PURUSHOTTAM”?

Rajarshi Tandon’s politics did not initially irk Panditji. The latter had actively backed the former’s ‘No Tax’ campaign in 1930, and also lent support to his work with Kisan Sabhas. Both the leaders came from Allahabad, and worked together since the 1930s, beginning with the Civil Disobedience Movement. In the 1937 Provincial Elections, the INC…