कॉमेडी नहीं कर पा रहा, तो जा पत्रकार बन (व्यंग्य)

कहता तो स्वयं को कोमेडियन है, लेकिन अंतर्यामी जनता को अब न इसकी ज़बान पर भरोसा रहा है, न ही नीयत पर । पहले यह हास्य के नाम पर फूहड़ फब्तियाँ कसा करता था । फिर कुछ जोक्स निशाना भटक गए । तब से ही लेने के देने पड़ गए । नीच की नीचता सतह…

I Come From India & I do not bear any Guilt -A Reply to Vir Das’ PeeJs

I come from India. Which India do I come from? There are not just two, but multitudes of them. It is only the binary-minded, the indoctrinated, the compromised, the hateful, the star struck, burdened consciences who believe that there are just two Indias. Every Indian’s India is different, and there are more than a billion…

दीपावली पर अवांछित मनन-चिंतन

पूजा के सिंगाड़े कल रात ही निपटा दिये थे । गुलाब जामुन धरे रह गए । जीवन ऐसे ही धरा रह जाता है । आदमी गुलाबजामुन को बचाए रख कर पहले सिंगाड़े चरता है । लक्ष्मी पूजा में ईख का जोड़ा भी रखा था । ईख अभी भी लक्ष्मी के इर्द-गिर्द खड़ी हैं । बचे…

Hello Mr. Virat Kohli, How Much is Your Carbon Footprint?

I am a big fan of Virat Kohli. Not particularly of his cricketing skills or his attitude though, but of his eagerness to play a social activist. If he plays his game the right way, he might end up as India’s Thunberg, although Tendulkar’s peak level and popularity might still elude him. Then again, Woko…

WHY I REFUSE TO TWEET IN SUPPORT OF SHAMI

I refuse to tweet or put out a message in support of Shami. That is because I love Mohammad Shami, the Indian fast-bowler, a lot. I love that strong lad, built like a bull, for the jump in his stride, right before he delivers. His deliveries have that abrupt extra bounce that just grows on…

कुफ़्र-काफिर पर ऐतराज नहीं, झांट-झंटुए और *टुए पर है ? (निबंध)

परसों तक सब्र ही तोड़ते थे, कल कुफ़्र भी तोड़ दिया । सब्र का क्या है साहब । हम लोग काफिर हैं, बारह सौ साल से बुतशिकनों की नफरत खत्म होने का इंतज़ार कर रहे हैं । कश्मीर में आज भी हमारे लोग मारे जा रहे हैं । शर्म बस हमें आती नहीं । क्रिकेट…

प्रदीप बनाम वोक् मीडिया – शब्द तो बहाना है, सत्य को दबाना है

हंगामा है क्यों बरपा,मुँह से निकला एक शब्द ही है,न्याय ही तो है माँगा,लिंचिंग तो नहीं की है. सड़कों पे नहीं बैठा,बेअदबी तो नहीं की है,कुछ सवाल ही हैं पूछे,दलाली तो नहीं ली है. सच्चाई उगलती, तीखे सवाल पूछती प्रदीप भंडारी की जिह्वा से हिंदी का एक आधिकारिक शब्द क्या निकल गया, तब से यह…

और क्या चल रहा है ?

डीजल का शतक लग चुका है , पेट्रोल नेल्सन पर है । रसोई गेस नौ सौ पार कर चुकी है, जल्द ही हजारी भी होगी । आज लगातार सातवें दिन कीमतें बढ़ी हैं । विकास ऊंची उड़ान पर है – गुरुत्वाकर्षण को पर करके अन्तरिक्ष पहुँच गया है । उड़ान कंपनी टाटा हो चुकी है…

अमूल माचो एवं लक्स कोज़ी – उर्दूवुड की चड्ढियाँ

रश्मिका मंदाना गिनती ही भूल जाती है । तीन से चार तक आने में तीन दशमलव एक-दो-तीन हो जाती है । क्या है कि कमसिन कन्या की नज़र विकी कौशल के कच्छा स्ट्रेप पर पड़कर वहीं अटक गयी है- एकदम संज्ञा शून्य स्थिति । तानसेन को राग टोढ़ी गाता सुनकर मृग समूह जैसे कभी मंत्रमुग्ध…

दिन में अमिश रहता हूँ, रात को रवीश हो जाता हूँ

रो-जर फेडरर को हार और जीत पर फूट-फूट कर रोते देखा है। स्वयं बाबा ने भी सदन में आँसू बहाये हैं। वधु की विदाई के समय बहुत से वरों के नेत्र सजल होते देखे हैं । सेकंड वेव ने ऐसा विध्वंस मचाया कि प्रधान जी की आँखेँ भी डबडबा गईं । लेकिन रोना-रोना तो रवीश…