कृष्णा सोबती कृत मित्रो मरजानी – फ़ीमेल डिज़ायर इन 1967

 

कई उपन्यास पढ़े हैं तीन-चार सौ पन्नों के । लेखक लिखते चले जाते हैं पर संसार बसाना तो दूर , एक चरित्र ठीक से नहीं ढाल पाते । यहाँ कृष्णा सोबती ने मात्र 98 पृष्ठों की लंबी कहानी में न सिर्फ एक बड़े परिवार के दैनिक जीवन का लेखा-जोखा निकाल कर रख दिया , बल्कि हिन्दी में शायद पहली बार एक स्त्री की दैहिक पिपासा और आवश्यकताओं को खुलकर रेखांकित भी किया । मित्रो (सुमित्रावंती) केवल धनवंती की बाग़ी बहू और सरदारी की शोख बीवी ही नहीं , एक आत्ममुग्ध महिला भी थी जिसे अपनी शारीरिक जरूरतों का पूरा इल्म था ।

 

ऐसा नहीं है कि उसके पति सरदारी में दोष था , पर मित्रो एक ‘जरनैली नार थी जिसे पार पाना किसी कोई छोटे-मोटे मर्द के बस का काम नहीं था’।  हफ्ते-पखवाड़े में सरदारी एकआध बार उस व्याकुल मछ्ली की तड़प मिटा पाता था । उस युग में भारतीय नारी अपने अधिकारों को लेकर उतनी मुखर नहीं थी ,और स्त्री-पुरुष संवाद में उतना खुलापन नहीं होता था । मित्रो अपने ढ़ोल (पति) की बेरुखी की वजह से तनावग्रस्त रहती और इस चलते उसके लोक व्यवहार में उतार-चढ़ाव भी देखने को मिलता । कभी अपनी सास को तपाक से जवाब देती , कभी भाभी और देवरानी को छेड़ती । उसके खीज-भरे तानों और द्विअर्थी संवादों को लेखिका ने गजब की भावनात्मक ऊर्जा और कलात्मक उत्तेजना से उकेरा है ।

 

मित्रो कभी तो नींद से उठाए जाने पर सास से पूछ बैठती कि क्या ‘दूध-मलाई खिलाने के लिए उठाई हो माँजी’। खूब टेढ़ा-मेढा भी बोलती पर जब देवरानी सास पर तीखे बाण चलाती तो मित्रो सास का मान-मर्दन भी न होने देती । कभी अपनी छातियाँ दिखा-दिखाकर भाभी से पूछती कि क्या किसी और की ऐसी छतियाँ देखी हैं ? कभी भाभी को किसी परपुरुष संग संसर्ग करने के अपने सपनों के बारे में बताती , तो कभी अपने ढ़ोल की नाकामी का राग आलापती । एक बार तो भाभी ने उसे रज़ाई में हिलते देख (खुद को खुश करते हुए) धक्का दिया और सपनों में घोड़े उड़ाने पर झिड़क लगाई । कभी खुद ही अपनी महकती काया और दुर्दशा पर मनन करती – “अनोखी रीत इस देह की, बूंद पड़े तो थोड़ी , न पड़े तो थोड़ी” । मित्रो के तरकश में शाब्दिक बाण सदैव तैयार रहते , और मौका लगने पर बेबाकी और निडरता से वह अपने शिकार को बींध देती थी ।

 

मित्रो गुरुदास और धनवंती के परिवार की मँझली बहू थी  । सास-ससुर बूढ़े हो चले थे । उनके अरमान अब सीमित थे – परिवार की  सुख-शांति  ,औलादों को संतान सुख , व्यापार  और खानदान की आबरू में बढ़त  और अदब-नियम-कायदे-संस्कारों का पालन । इतने बरस गृहस्थी की गाड़ी साथ में खींचने के पश्चात दोनों के हित, चिंताएँ, शौक और दुख एक समान हो चुके थे –मानो भाई-बहन ही हों । इस रिश्ते की गहराई को भी कृष्णा जी पूरी शिद्दत से उभारा है ।

 

बड़ा बेटा बनवारी बहुत जिम्मेदार था । उसकी पत्नी सुहागवंती सुहृदया थी और सास-ससुर ,देवर-देवरानियों की बड़ी पूछ करती थी  । धनवंती को बनवारी और सुहाग पर बड़ा अभिमान था । बनवारी की बात तो ऐसे मानती थी कि मानो बेटे की आज्ञाकारिणी बेटी हो।

 

मित्रो और सरदारी का रिश्ता धौल-धप्पे का अधिक था , साथी-संगिनी का कम ।  बाज़ार में रसिक-भांड मित्रो से मित्रता के कसीधे कढ़ते तो  सरदारी इस छेंटाकशी से आहत रहता । घर आकर जब मित्रो पर कड़ाई दिखाता तो वह आँख दबाने के बजाय उल्टे उलाहने देती और बराबर की बजाती । सास-ससुर-जेठ ने जब घर में ही पंचायत बैठाकर सीधे पूछताछ करना चाही तो वहाँ भी मित्रो दबी नहीं बल्कि खुल कर दहाड़ी । अपने ऊपर लगाए गए बदचलनी के आरोपों को उसने अदालती लहजे में ‘न सच,न झूठ’ करार दिया । यह भी डंके की चोट पर स्वीकारा कि पति द्वारा उपेक्षा के चलते वह  ‘कुछ मनुक्खों के साथ हंसी-मज़ाक कर लेती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पति का दिया राजपाट छोड़ कर किसी कोठे पर जा बैठी है’ ।

ऐसा भी नहीं था कि मित्रो ने ढ़ोल-जानी को रिझाने में कोई कसर रखी हो । झिमाते समय एक बार बोली कि “चाहो तो मेरी यह चिकनी चुपड़ी सौत निगल लो, न हो तो मुझे ही चबा लो” ।  “ न थाली बांटते हो , न नींद बांटते हो….अपने दुख ही बाँट लो “ कहकर अपनी जमा पूंजी पति के हवाले कर दी थी । पति से प्यार तो था , पर उसके जोश पर पूरा भरोसा नहीं था । फिर भी कहती थी – “खांड का बतासा और नून का डला घुलकर ही रहेगा” । कहानी के अंतिम चरण में शर्बती ओठों से वह पति के मुंह पर साकल लगा देती है , और चुम्मे भी जड़ती है । कृष्ण सोबती ने इज़हार में कहीं कोई कसर बाकी नहीं रखी ।

 

सहवास को लेकर मित्रो के मन में कोई घिन , भय या संदेह नहीं था । देह हया का कारण नहीं , सुख का जरिया बनना चाहिए , ऐसा उसका मत था । मित्रो की माँ भी आज़ाद विचारों की थी और दोनों दिल खोल कर बातें छौंकते थे ।  गौर फरमाइए इस एक संवाद पर –

माँ – दिल में लहर हो तो बुलाऊँ तेरी बगीची के लिए कोई माली ?

मित्रो- ओढनी तले दो पंछी मचलने लगे हैं ….

मित्रो के ख्याल उन्मुक्तता को तलाशते हैं – “अपने लड़के बीज डालें तो पुण्य , दूजे डालें तो कुकर्म” । कल्पना कीजिये यह कहानी 1967 में प्रकाशित हुई थी ।

 

विचारों का घनत्व और जीवंत की प्रांजलता का अनूठा मिश्रण कृष्ण सोबती के  उदीयमान सम्प्रेषण कौशल को दर्शाता है । मानवीय स्वातंत्रय और नैतिक उन्मुक्तता को बढ़ावा देती ‘ मित्रो मरजानी’ हिन्दी साहित्य में एक मील का प्रस्तर मानी जाती है । निज के प्रति सचेत रहें और समाज के प्रति चेतना रखें – जीवन की संपूर्णता सिद्ध करने हेतु यह निहित है और यही इस कहानी का ध्येय है  ।

 

 

 

 

 

 

 

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