नासा का फिदायीन तैयार, अब बच जाएगा संसार

अमरीकी रक्षा तंत्र और कॉर्पोरेट गठजोड़ सदैव किसी ऐसे शक्तिशाली, प्राणघातक शत्रु को चिन्हित करने में व्यस्त रहता है, जिसके विरुद्ध वह अपनी समस्त सैन्य एवं तकनीकी-प्रौद्योगिक क्षमता को लामबंद कर सके । यह मूल अमरीकी प्रवृति है – शत्रु अपने आप खड़ा हो जाए तो ठीक, नहीं तो उसे येन-केन-प्रकारेण पैदा किया जाए ।…

धंधा या वंशवाद ? (कविता)

वकील का लड़का जज बनेगा,जज का लड़का वकील,वंशवाद नहीं, धंधा है ये,तुम देते रहो दलील,ज्यादा दुखता हो पेट में,तो कर दो फाइल अपील,काले कौवे सारे मिलकर,कर देंगे तुम्हें ज़लील. कहते हैं व्यवस्था इसको,चलता इसमें खून-पैसा-जुगाड़,औलाद ही बाप की वारिस है, बाप खोलता है बंद किवाड़,दोष न निकालो अगले का,चलना सबको यही है दांव,है पास में…

China is not Maharashtra – Pray don’t Search for Leads!

Bloody hell, China is neither Goa, nor Maharashtra. (I’m leaving out Bihar here) It is not a fickle democracy, rather sophistically termed as people’s democracy. Even the coup against the Ts took a long while to brew before it could be confirmed that Brutus had indeed ran away to Gujarat with dozens of other turncoats….

The Essence of Al Pacino (Poem)

Of Al’s fire and the baritone, What can I say? The gaze as intense as his might singe dry hay. The man moves like a gazelle, Still the best in the fray, Let him talk and talk to make his point, Just shoot away. The air in his lungs, The power in his voice, The…

दुर्गा देवी वोरा की भूली-बिसरी वीरगाथा

दुर्गा देवी वोरा, और उनकी ननद, सुशीला, को लाहौर से दिल्ली बुलवा भेजा गया, ताकि वे भगत सिंह के फेरवेल में सम्मिलित हो सकें । 8 अप्रेल 1929 को दिल्ली के कसीदिया पार्क में एक पिकनिक का आयोजन हुआ, जिसमे सम्मिलित हुए चन्द्रशेखर आज़ाद, भगवती चरण वोरा, भगत सिंह, सुशीला, दुर्गा और उनका पुत्र सचीन्द्र…

हर नगर मेरे अंदर रहता है (कविता)

किसी नए नगर में बस जाने से, पुराने घर नहीं छूट जाते, आज भले मैं हूँ कहीं पर, काशी, कलकत्ता याद नहीं आते ? दर्शन करते हुए महाकाल के, क्यूँ कालीघाट पहुँच जाता हूँ, रसगुल्ले चाहे हों ‘गागर’ के, स्वाद ‘बलराम मलिक’ का पाता हूँ ! सब्जी लेने पहुंचा बिट्टन, गाड़ी लगा बेलियाघाटा में, फिर…

एक टंगी हुई साँझ (कविता)

पीली, शुष्क, ज्येष्ठ की साँझ में, मद्धम पवन मदोन्मत्त हो, महीन धूल को इधर से उधर कर रही है – नीम की शाखें लहलहा रहीं, वायु के स्पर्श का अनुभव मुझे भी हुआ, पर मेरे वस्त्र-केश एवं मार्ग पर बैठा कुत्ता अलसाए पड़े हैं, यह साँझ कुछ टंग सी गयी है, लगता है अब कुछ…

तेरह साल बाद बाइज्ज़त बरी  – पुलिस को लताड़, निचली अदालत पर चुप्पी

अभी हाल ही में अनुसूचित जनजाति का एक युवक 13 बरस का कारावास काटकर भोपाल जेल से रिहा हुआ । उच्च न्यायालय ने उस पर लगे हत्या के आरोप को सिरे से खारिज कर दिया । माननीय न्यायालय ने तीखे स्वर में पुलिस की भर्त्सना की और समूची जांच को मनघड़न्त, गैर-जिम्मेदार और विद्वेषपूर्ण पाया…

सत्या एकदम डेंजर था, भीखू तो बस बदनाम हो गया

बार का दरवाजा खुलता है । हेंडल खिंचने की आवाज़ सुनाई देती है । क्या यह सत्या की अंतरात्मा की आवाज़ है? या फिर मौत की ? शायद उसपर चढ़े हुए बदले के फितूर की हो? ऊंची वॉल्यूम पर गाना बज रहा है – हाँ मुझे प्यार हुआ, प्यार हुआ अल्लाह मियां , भरी बरसात…