घोषणापत्र-21 (कविता)

जिस प्याले पर नाम लिखा हो मेरा, वह प्याला मुझको प्रत्येक मिले; अमृत-गरल जो भी हो प्राप्य मेरा, उतना भर मुझको अवश्य मिले ।4। जिस छाले को पलना ही हो मुझपर, वह टिके नहीं लंबा, जल्दी आकर निकले; लड़ना पड़े दुनिया से भी लड़ लेंगे, पर एक बार उससे भी आँख लड़े।8। तेरे दर्शन हों…

How has the Indian Team Responded After their Lowest Test Innings Totals?

36 runs was the lowest that the BCCI XI had ever fallen for. But considering that this had happened in the first test itself of a four-match series in Australia, coupled with the fact that the best batsman and the captain of the side was proceeding  on Paternity Leave, the Adelaide humiliation notwithstanding, apprehensions of…

बेकाबू, बागी मन बनाम अचल,अटल नियति

बहुत वक्त हुआ , बॉस ने ज़ोर देकर,डपटकर कहा था- मन से काम किया करो ! ढूंढो उसे, कहाँ खोया रहता है । तुम्हें भी गायब रखता है । तो अपने काम को ‘मन से’ करने की कवायद में मैंने अपने मन को ढूँढना प्रारम्भ किया ।  मन मिला पर तब एक लड़की पर आया…

रुका-रुका सा, रूखा-रूखा सा (कविता)

शब्द लिखते-लिखते पन्ने भरने को आते हैं, पर वाक्य बनते-बनते अर्थहीन हो जाते हैं । जितने बड़े हों बुल-बुले पानी बन जाते हैं, ऊंचे-ऊंचे पर्वतों पर बर्फ बन जम जाते हैं।4।   बात कहते-कहते वह प्रवचन दे जाते हैं, ज्ञान झरते-झरते यूंही दर्शन लिख जाते हैं। भीड़ जुटते-जुटते ऐसे ही पंथ बन जाते हैं, महात्मा…

भारत में लोकतन्त्र नहीं है क्यूंकी मुझे अब भी सुना जाता है (व्यंग्य)

भारत में लोकतन्त्र नहीं है । आपके ख्यालों में होगा, पर भारत में लोकतन्त्र नहीं है ।मेरा नाम आँधी भले हो पर, मैं आँधी नहीं हूँ। ग और ध भले हों मेरे नाम में पर मैं धागा भी नहीं हूँ । पर अगर आपके ख्यालों में भी भारत ही है तो थोड़ा गौर से देखिये…

भगवतीचरण वर्मा की प्रतिनिधि लघु कहानियाँ – चित्रलेखा और कबरी बिल्ली के प्रणेता

प्रेमचंद की बोलचाल वाली उर्दूयुक्त हिन्दी के युग में संस्कृतनिष्ठ,इतिहासपरक चित्रलेखा लिखने का साहस प्रदर्शित करने वाले भगवतीचरण वर्मा हिन्दी साहित्य के एक स्तम्भ रहे हैं । 1934 में लिखे गए चित्रलेखा ने उन्हें अमर ख्याति प्रदान की ।  ‘भूले बिसरे चित्र’ ने उन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड दिलवाया । साल 1971 में वे पद्म भूषण…

इतना न पुकारो इक्कीस को, कि….(कविता)

इतना न पुकारो इक्कीस को, जाता हुआ बीस अकड़ जाए, इतनी न पालो उम्मीदें , नवागंतुक आते-आते ठिठक जाए।2। मत दोष मढ़ो यूं साल पर सारा, घड़ी नहीं बिदक जाए, हैं दोनों (20-21) समय ही –एक प्रवृत्ति, महाठगबंधन न बन जाए।4। खिंच न जाए ये दिसंबर ,जनवरी स्थगित न हो जाए, जंच जाये समय को…

एक वोटर से ज्यादा, एक कार्यकर्ता से कम (कविता)

संचार क्रांति के इस युग में मैं महज एक वोटर नहीं रहा, सोशल मीडिया के आगमन के साथ मेरी मासूमियत जाती रही, तटस्थ होना हर काल में अपराध था, अब तो विचार न रखना, रख पाना मेरी जड़ता होगी ।4। बिना प्राथमिक सदस्यता गृहण किए भी मैं एक कार्यकर्ता हूँ, हर समय, प्रतिदिन- तैनात, मुस्तैद,…

सुबह की बिदकी कविता (कविता)

कविता काफ़ूर हो गयी है, चूंकि आज देर से उठा ! फुर्सत फुर्र हो गयी है, क्यूँ देर से उठा ! चिड़ियाँ भी उड़ गईं हैं, छत पर चुग्गा नहीं पड़ा, आज क्या लफड़ा हुआ, क्या अलार्म नहीं बजा?   (8) अब आँख खुली है तो जमाने का बोझ है मुझ पर, दो पल का चैन…

लील्यो ताही मधुर फल जानु (कविता)

मैंने अग्नि का धधकता गोला निगल लिया है, उसकी लपटें- पेट में पड़ीं बिन पची शंकाओं को, गुर्दों से ताकती-झाँकती लाचार बनाती झिझक को, आंतों को जकड़ कर बैठे अनमने आलस्य को, जिगरे से पल-पल सवाल करती चिकनी,तेली शर्म को धू-धू कर जला के भस्म कर देंगी ।6।   कभी जमने को आया मेरा लहू…

धुंध हुई धुआँसा (कविता)

आँख गलती से भी लड़ जाती थी तो समझते थे प्यार, राह मे खड़ी जो दिख गई समझो कर रही इंतज़ार, कभी धुंधला सा दिखता था तो कुहरा ही होता था, जो चमकता था अंधेरे में उसका चेहरा ही होता था, ये कमबख्त ऐसा पर्दा ढक देता था कुहासा, मज़ाल कि आशिक दिल को दिख…