कॉमेडी नहीं कर पा रहा, तो जा पत्रकार बन (व्यंग्य)

कहता तो स्वयं को कोमेडियन है, लेकिन अंतर्यामी जनता को अब न इसकी ज़बान पर भरोसा रहा है, न ही नीयत पर । पहले यह हास्य के नाम पर फूहड़ फब्तियाँ कसा करता था । फिर कुछ जोक्स निशाना भटक गए । तब से ही लेने के देने पड़ गए । नीच की नीचता सतह…

पाकिस्तानी क्रिकेटरों की साफ़गोई का कायल होता जा रहा हूँ (व्यंग्य)

विश्व कप में बारह बार हारने के बाद पाकिस्तान को अंततः भारत पर जीत नसीब हुई । छियान्वे से हरे वकार युनूस के घावों पर अब जाकर कुछ मलहम लगा । कसम से जडेजा ने तब इसे बड़ा कस के कूटा था ।  तीस साल बाद मिली इस दुर्लभ खुशी में भी वकार को सबसे…

सड़कें हर काम के लिए हैं (कविता)

जाम करने के लिए हैं,                                  (चक्काजाम) जाम-से-जाम करने के लिए हैं,                            (शराब) दुआ-सलाम करने के लिए हैं, नित्य काम करने के लिए हैं,                            (पाख़ाना)     माहौल बने तो शाही हमाम करने के लिए हैं,                (स्नान) नाटक सरेआम करने के लिए हैं,                           (नुक्कड़ नाटक) चुनावी ऐलान करने के लिए हैं,                            (सभाएं) सारे कायदे हराम करने के…

झाँट पर झंझावात क्यूँ , भाषा पर भारी संस्कार क्यूँ ?

भाषा का कार्य है वस्तुस्थिति का वर्णन करना, और संवाद स्थापित करना । इसपर रह-रहकर नैतिक और राजनैतिक प्रहार होते रहते हैं । भाषा को भ्रष्ट करके न सामाजिक समरसता लाई जा सकती है , न ही शब्दों और विन्यासों को नियंत्रित अथवा प्रतिबंधित करके लोगों को संस्कारित रखा या बनाया जा सकता है ।…

अमूल माचो एवं लक्स कोज़ी – उर्दूवुड की चड्ढियाँ

रश्मिका मंदाना गिनती ही भूल जाती है । तीन से चार तक आने में तीन दशमलव एक-दो-तीन हो जाती है । क्या है कि कमसिन कन्या की नज़र विकी कौशल के कच्छा स्ट्रेप पर पड़कर वहीं अटक गयी है- एकदम संज्ञा शून्य स्थिति । तानसेन को राग टोढ़ी गाता सुनकर मृग समूह जैसे कभी मंत्रमुग्ध…

चप्पलतंत्र से चपलतंत्र तक (व्यंग्य)

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है कि कैकईनन्दन भरत कहीं राजवंशी न होकर एक अफसरशाह मात्र तो न थे ? आखिर एक अधिकारी ही इतना कुशल हो सकता है कि पादुकाराज जैसे नीरस गल्प में प्रजा की आस्था को चौदह बरस तक जगाए रख सके । अजी चौदह की क्या कही , भरत…

रोनी सूरत वाले पाकिस्तान के प्रथम पैरोकार रवीश पाणे को एक हल्का हाथ

रोन्दु रवीश पाणे, बाध्यकारी विरोधाभासी, पाकहितों के स्थायी संरक्षक, एमडीटीवी । सुनो रवीश्वा, ये बात एकदमे नहीं जँचती कि तुम बरसों से एंकर की तनख्वा उठा रहे हो, एसी कमरे में बैठे-बैठे जाने कितनी कुर्सियों की गद्दियाँ फाड़ चुके हो, पर इतना भी ज्ञान नहीं रखते कि भारत सरकार ने तुम्हारे तालिबनी मामूओं को कंधार-परांत…

WHERE DO I GET JUSTICE? (Poem)

You just have to reach any court somehow, All your problems shall instantly vanish.(2) Hire a priest flitting about in a black coat, Peddling his lies around the Premises, To worship the blindfolded goddess of law, And her personifications on earth! (6) All your rights- human, beastly, fundamental- shall be restituted immediately. (8) Perpetrators shall…

करते रहिए TRAY,कोषीश,पृयास – कभी तो ठीक बैठेंगे अक्षर विन्यास

(अरे सुनो, भाषाई शुचिता के ठेकेदारों – हमें ब्याहकरण से बैर नहीं, पर स्पेलिङ्ग तेरी अब खैर नहीं। जो कुछ लिखा है जानभूझ कर लिखा है, टाइपो नहीं है । समझ में आ जाए तो ठीक है, वरना समझना कोई मुलभुत ज़रूरी नहीं है) हे अत्याचारिणी इंग्रेज़ी ! बचपन से सुनता आ रहा हूँ कि…

दिन में अमिश रहता हूँ, रात को रवीश हो जाता हूँ

रो-जर फेडरर को हार और जीत पर फूट-फूट कर रोते देखा है। स्वयं बाबा ने भी सदन में आँसू बहाये हैं। वधु की विदाई के समय बहुत से वरों के नेत्र सजल होते देखे हैं । सेकंड वेव ने ऐसा विध्वंस मचाया कि प्रधान जी की आँखेँ भी डबडबा गईं । लेकिन रोना-रोना तो रवीश…

मोबाइल नर नारायण : मोबाइल हाथ में लेकर एकला चलो रे !

चलते पंखे की आवाज़ आपको बीतते हुए समय का एहसास कराती है । घड़ी की सुइयों को रेंगते देखकर मन में गिंडोले सरकने लगते हैं । बहता हुआ नल अगर मटके या बाल्टी को भर रहा है तो समृद्धि का , पर अगर फिजूल पानी खर्च हो रहा है तो बरबादी का भाव देता है…