करते रहिए TRAY,कोषीश,पृयास – कभी तो ठीक बैठेंगे अक्षर विन्यास

(अरे सुनो, भाषाई शुचिता के ठेकेदारों – हमें ब्याहकरण से बैर नहीं, पर स्पेलिङ्ग तेरी अब खैर नहीं। जो कुछ लिखा है जानभूझ कर लिखा है, टाइपो नहीं है । समझ में आ जाए तो ठीक है, वरना समझना कोई मुलभुत ज़रूरी नहीं है) हे अत्याचारिणी इंग्रेज़ी ! बचपन से सुनता आ रहा हूँ कि…

दिन में अमिश रहता हूँ, रात को रवीश हो जाता हूँ

रो-जर फेडरर को हार और जीत पर फूट-फूट कर रोते देखा है। स्वयं बाबा ने भी सदन में आँसू बहाये हैं। वधु की विदाई के समय बहुत से वरों के नेत्र सजल होते देखे हैं । सेकंड वेव ने ऐसा विध्वंस मचाया कि प्रधान जी की आँखेँ भी डबडबा गईं । लेकिन रोना-रोना तो रवीश…

मोबाइल नर नारायण : मोबाइल हाथ में लेकर एकला चलो रे !

चलते पंखे की आवाज़ आपको बीतते हुए समय का एहसास कराती है । घड़ी की सुइयों को रेंगते देखकर मन में गिंडोले सरकने लगते हैं । बहता हुआ नल अगर मटके या बाल्टी को भर रहा है तो समृद्धि का , पर अगर फिजूल पानी खर्च हो रहा है तो बरबादी का भाव देता है…

In Defence of the Demigod

An unconditional apology by an officer would always be seen as an admission of guilt. Hence, some excuse or justification must always be added to it. An unconditional statement on a subordinate’s action would be construed as censure by the superiors or the Service Association. Hence reprimand the one in the dock, but also endorse…

छप्पन फाड़ के ऑक्सिजन ही ऑक्सिजन

देश के कोने-कोने में दिन-प्रतिदिन जितने ऑक्सिजन प्लांट बनाए जाने की घोषणा हो रही है , उसको देखकर लगता है भारत में एक दिन ऐसा भी आयेगा जब प्यार मांगोगे तो ऑक्सिजन मिलेगी, रोटी मांगोगे तो साथ में तरकारी की जगह  ऑक्सिजन और अगर गलती से किसी ने खीर मांग ली तो उसे जबरन ऑक्सिजन…

लॉकडाऊन में शादियाँ का महात्म्य

देश के कई शहरों में लॉकडाऊन लगा हुआ है । घर से निकलना, बाज़ार करना, व्यापार चलाना, भीड़ जमा करना – सब पर अंकुश है । फल-सब्जी-दूध भी समयानुसार मिल रहे हैं । रातों का कर्फ़्यू लागू है । ज़िंदगी और मौत में धागे भर का फरक बचा है । ऐसे में आज मोहल्ले मे…

CHEW IT PROPERLY

Most people bluff in front of the camera. Some stutter, a few speak shameless lies. Beware of crooks paying undeserving encomiums. Those offering platitudes are unbearable bores. Anyone making big, vague promises must be a socialist snake. For me, the proof of sincerity and transparency is in a man’s (or a woman’s) use of ‘Chew’…

भारत में लोकतन्त्र नहीं है क्यूंकी मुझे अब भी सुना जाता है (व्यंग्य)

भारत में लोकतन्त्र नहीं है । आपके ख्यालों में होगा, पर भारत में लोकतन्त्र नहीं है ।मेरा नाम आँधी भले हो पर, मैं आँधी नहीं हूँ। ग और ध भले हों मेरे नाम में पर मैं धागा भी नहीं हूँ । पर अगर आपके ख्यालों में भी भारत ही है तो थोड़ा गौर से देखिये…

वोक अफसरों को गुस्सा आता है तो ज्वालामुखी फटता है

जीवन में कभी मानस नहीं बाँची, हाथ में वाल्मीकि रामायण नहीं उठाई, अट्ठारह पुराणों के नाम नहीं गिना सकते, उपनिषद लिखा जाता है या उपनिशद- नहीं जानते, षडदर्शन को सिविल सेवा परीक्षा का प्रोबेबल टू-मार्कर जानकर रटा, तीर्थयात्रा जाना पड़ा तो उसे ट्रेकिंग बताया, महीनों से मंदिर में नहीं घुसे हैं, हवन का ह नहीं…

एक्ज़िट पोल का खुल गवा पोल (एक कविता)

भीड़ तो जुटी थी पर भोट नहीं दिया, कहीं ऐसा तो नहीं कोई झोल कर दिया? इतनी हवा भर दी   (पॉलिटिकल फूटबाल में ) कि सेल्फ-गोल हुई गवा, नहीं कोई ई.भी.एम का चक्कर, एक्ज़िट पोल का पोल खुल गवा ! (8) अब कौन समझाई बुतरु को, कौन बताई सच, बिना नतीजे टीभी चैनल कर…

खबरों का भटकना , टीवी स्क्रीन का चीखना

खबरों का चरित्र है चलना, और अनवरत चलते ही रहना । कहाँ, कब पहुँचेंगी, किस तक और किस रूप में – हर खबर खुद अपनी किस्मत ले कर आती है । ऐसे में बहुत सी अपनी राह से भटक जाती हैं और कई को बरगला कर भटका दिया जाता है- ये सब पत्रकारिता के खेल…