कैसे डूब गया दिनकर दक्षिण के दूर दिशांचाल में ?

जिन दिनकर को समस्त भारतवर्ष ने राष्ट्रवादी चेतना एवं वीर रस के प्रखरतम राष्ट्रकवि के रूप मे जाना, उन्हीं रामधारी सिंह को जीवन के अंतिम वर्षों में विरक्ति-सी हो गयी थी । उनका आखिरी समय बहुत अवसाद में कटा । मद्रास में बीती अपनी अंतिम संध्या पर दिनकर ने डायरी में लिखा- “सब कुछ पाकर…

Manoranjan Byapari’s There’s Gunpowder in the Air – On an Attempted Jailbreak

The doyen of Bangla literature, Mahashweta Devi, once hailed a rickshaw-puller who was engrossed in reading a book. Reluctantly, he agreed to drop Didi home. During the ride, he pleasantly surprised the ‘vidushi’  by asking the meaning of the word जिजीविषा. From that moment began the literary career of Manoranjan Byapari, whom Didi asked to…

दूर हटो – हम सबकी कहानियों पर तुम्हारा कोई कॉपीराइट नहीं !

ओ दुमका वाले नीलोत्पल मृणाल भैया ! ओ एस्पिरेंट्स के लेखक दीपेश सुमित्र जगदीश जी ! दूर हटो, साला ई सिविल सेवा की तैयारी करने वालों की कहानियों के कॉपीराइट्स से । अब सिविल की तैयारी के लिए अगर कोई कहीं जाएगा है तो दिल्ली ही न जाएगा । आईआईटी के लिए तो फिर भी…

SL Bhyrappa’s Gruhabhanga (गृहभंग) – The Tale of a Woman’s Struggle against Poverty & Plague in pre-Independence Mysore

Bhyrappa’s semi-autographical masterpiece, Gruhabhanga, was published in 1970. In scope of its tragedy, and depth of the characters, the novel is perhaps unsurpassed in modern Indian literature. Gruhabhanga is the story of the heroic struggle of a woman, Nanjamma, who refused to give up in face of adversity and apathy. She battled against poverty, epidemic,…