मैं भी परशुराम (कविता)

एक हाथ में फरसा मेरे, दूसरे में वेद हो, शोषण होते देख मुझको परशुराम-सा क्रोध हो, आततायी को अनुशासित करना मेरा नित्य कर्म, सनातन की सेवा ही हो अब से मेरा परम धर्म ।4। कर सकूँ बेधड़क होकर गोवंश तस्करों का संघार, काँप जाएं सहस्त्रार्जुन-संतति सुनकर मेरी सिंह दहाड़, राम को भी टोक सकने का…

चौंकते रहो ! (कविता)

हर अवरोध पर चौंकना भले हमारी आदत बन गई हो, पर हमारा डीएनए नहीं बनना चाहिए, चुनौती सामने खड़ी है- स्पष्ट, चमकती हुई, प्रश्नवाचक बन कर, हमारा जवाब मांगती, हमें चेताती, चौकन्ना करती, छतों पर, खड़ी है– पत्थर लिए हाथों में, बोतलों में पेट्रोल भरे, (117 रुपए लीटर वाला वही महंगा पेट्रोल, जो तुमको न…

मैं हूँ क्या? मैं क्या हूँ ? (कविता)

मैं हूँ क्या ? और मैं क्या हूँ ? क्या हैं एक ही प्रश्न के दो रूप, अथवा दो भिन्न दार्शनिक पहेलियाँ? तर्क-वितर्क की नूरा कुश्ती, हिन्दी भाषा की अकड़ या लचीलापन, केवल वाक्य विन्यास की बाल-सुलभ क्रीडा, या मस्तिष्क में लगा कोई परजीवी कीड़ा? अब क्या शब्दों के अनुक्रम पर भी संदेह करूँ? बेहतर…

क्यूँ श्रम करे व्यर्थ जब हरामीपन चल जाए (कविता)

कचरा स्वाहा कर दिया उसने उठाने के बजाए, क्यूँ श्रम करे व्यर्थ जब हरामीपन चल जाए, झुके, सोरे, अरे कितनी बार उठाए! कमर बेचारे की हाय बार-बार कराहे, गंदगी ढोकर शहर से बाहर ले जाये, कूड़े के पहाड़ पर कितना और कूड़ा गिराए? दुर्गंध से बेचारे की नाक सड़-सड़ जाये, इससे बेहतर है थोड़ी शानपट्टी…

हम सिनेमा भी देखें तो सांप्रदायिक (कविता)

कल तक हम वोट देकर, मनपसंद सरकार चुनकर धर्मांध थे, आज हम एक सिनेमा देखकर ही सांप्रदायिक हो गए, हमारे पूजा-पाठ-मंदिरों से तो सदैव समस्या रही है, कल को ऐसा न हो कि हमारा होना ही तुम्हें खटकने लगे , और सिनेमा क्या है, वह हमारी नपुंसकता का दस्तावेज़ है, काँपते हाथों से आँसू छिपाकर…

न लड़ा, न जीता कोई चुनाव, फिर क्यूँ धरती पर नहीं पड़ रहे पाँव (कविता)

मैं नहीं जीता किसी चुनाव में, फिर भी हृदय गौरान्वित है, न कद बढ़ा, न पद मिला, फिर मन क्यूँ इतना आल्हादित है? तेरा भी क्या नुकसान हुआ, क्या दांव चला जो हार गया, बहुत मुंह चढ़ा कर बैठा है, आखिर क्यूँ इतना उद्वेलित है? बिना वजह की खुशी है प्यारे, आज जम कर फोडूंगा…

नाम की बात (कविता)

सवारी पहुँचती है अभी भी मुग़ल सराय ही, ट्रेन भले दीन दयाल जंक्शन में जा टिकती हो, ग़ुलामी बसती है हमारी ज़बान में, आदतों में, कोई क्या करे जब पूँछ न होते हुए भी टेढ़ी हो । 4।   बिरयानी की आज़ादी है भाग्यनगर में पकने में, हम नेतराम कचौड़ी को इलाहाबाद से छुड़ाकर लाये…

क्यूँ बनने दूँ ? (कविता)

जल रही अंगुलियों को, ठिठुर रही पगलियों को, सिगड़ी में न झोंक दूँ ? खून को बर्फ क्यूँ बनने दूँ ? (3) बढ़ रही चरबी को, मुटिया रही चमड़ी को, कसाई को न बेच दूँ ? वजन का बोझ क्यूँ लदने दूँ? (6) बहला रहे लफ्जों में, फुसला रहे ख्यालों में, एक कटार न खोंस…

लिखने के सिवाय (कविता)

लिखने के सिवाय, जब बचा नहीं उपाय, तब लगे लिखने !   (3) लिखते हुए खो गए, संज्ञा शून्य हो गए, कैसे लिख दें ?  (6) लिखने के अलावा, लगे जीवन ही छलावा, अब क्या लिख दें ? (9) लिखना था, लिख लिया, अमृत-विष पी लिया, चल, अब निकलें?  (12) #लेखन #लेखनी #लेखक #writing #existence #existentialcrisis

कलकत्ता की आखिरी शाम (कविता)

(लिखी अगस्त की उस शाम जिसकी अगली सुबह भोपाल निकलना था) भीगी-भीगी फुहारें गिरती-रुकती पुकारें भूले-बिसरे दिन इस शहर के जो अब छूट रहा है । ठंडी-ठंडी मानसूनी हवा चीरती मेरे हृदय को दस्तक देती स्मरण कराती उस रिश्ते को जो अब टूट रहा है । हल्की बारिश में क्या गीला, क्या सूखा छत पर…

दीप भर नहीं हूँ (कविता)

दीप भर नहीं हूँ केवल ज्योत हूँ मैं धर्म की प्रकाश में ही निहित मेरे सनातन का मर्म भी   (4) प्रज्ज्वलित हूँ आदि से   मैं पूर्वजों की संपदा प्रयास कर न बुझा सका मुझे कोई भी आक्रांता (8) अपनी ही धरा पर युगों से संघर्षरत   कोटि-कोटि आहुतियों से जीवन ये सिंचित रहा…

मैं फोड़ूँ तो चलता है (कविता)

खबरदार रोका जो मुझे,पटाखे फोड़ता गर दिख जाऊँ,जीता है मेरा पाकिस्तान,कमबख्त दिवाली थोड़ी है, काफ़िर लाख दें जलालतें,दो दलीलें मेरे वकील बन तुम,था करवा चौथ भी तो,पड़ोसी शौहर से कम थोड़ी है, कोई न टोके, पूछे न कुछ,लोकशाही को जिंदा रखना,तीस बरस में आया मौका,दिवाली तो हर बरस है मनना, तुम छोड़ो हो धुआँ-धुआँ,मैं करूँ…