कवितायें लिख और चंबल में डाल (कविता)

कवितायें लिखते रहने से न कहीं क्रांति होगी न ही दूर किसी भटके हुए की भ्रांतियाँ होंगी कहाँ किसी ब्रह्मज्ञानी के विचार कभी बदलेंगे न ही पापियों, दुष्टों के अत्याचार कहीं घटेंगे   हाँ , दूर अवश्य  होगी मेरी बेरोजगारी हो चाहे निकासी ज़रूरी संभव है उदर में भरी गैस की थोड़ी कम हो जाए…

ओ पत्तलकार ! (कविता)

( यह कविता उनको संबोधित करती जो देश की बदनामी के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं ) जलती लाशें देख चेहरे पर इतनी लाली क्यूँ है आँखें मौत का मंज़र देख कर भी मतवाली क्यूँ हैं प्राणवायु पड़ गयी कम   चहुंओर फैला है ग़म फिर भी तेरी चहक में ये कव्वाली…

फूलों पर फिसले हुए (कविता)

फूलों पर फिसले हुए, पत्तियों के प्रति उदासीन, क्या ही मतलबी शौकीन ! रंगीनियत पर कुर्बान, चकाचौंध पर हलकान, गए-गुजरे लंपट आशिकों से ! (6) किसी ने कह दिया, वाह क्या रंग है ! क्या भीनी-भीनी गंध है ! भिनभिनाते भौरों से प्रेरित, मचलती तितलियों से मदोनमत्त, कसीधे पढ़ते रहे फूलों की शान में ।12।…

कोई चुनाव शेष न रह जाएँ (कविता)

देखना , देश में कोई चुनाव शेष न रह जाएँ हमारे प्रचार माध्यम दो पल सुस्ताने न पाएँ ऐसी कोई रैली न रहे जिसका आयोजन न हो कोई रोड़ शो ऐसा जिसमे जन-अभिवादन न हो कोई कोना, कोई बूथ जहां हम पहुँच न सकें कोई वार्ड, कोई सीट जिसपर हम लड़ न सकें  (6) देखना,…

सिसकी पर लगा कर साइलेंसर (कविता)

सिसकी पर लगा कर साइलेंसर, हिचकियाँ भगा हाजमोला निगल, चाय की चुस्की खेञ्च कर लंबी, गरदन मटकाती अगल-बगल, आँखें मिचका, पलकें झपका, होठों को दबा दर्द पी गयी, बही कश्ती नहीं आंसुओं में मगर, हया के दरिया में डूब गयी ।8।   इश्क़ की इंतेहा फरमाइश पर, थोड़ी-सी ज़ोर आजमाइश कर, बाहों में फना वह…

तुरतातुरत भरो बिजली का बिल (कविता)

बिजली का बिल माने शैतान का फरमान ! भरे बिना मुमकिन नहीं शायर का गुज़ारा, ख्याल आयें भी तो पन्नों पर उतारूँ कैसे? रूह मेरी रोशन है पर कमरे में है अंधेरा छाया ।4।    रात भर जेहन में दबा कर रखा महफूज समझकर, मतले का हमने कश्मीरी पुलाव बना डाला, बिजली का बिल ही…

हम जिये जा रहे हैं (कविता)

विचार कहीं ले जा रहे हैं, शब्द अटक नहीं पा रहे हैं; उद्गार हिन्दी में हैं पनप रहे, निकल उर्दू में पा रहे हैं; देना तो जवाब है हमको, पूछे सवाल हम जा रहे हैं; जब मौका खुल कर कहने का है, बात को और उलझा रहे हैं; कविता फसी है दिलोदिमाग के बीच, ज़ोर…

धार्मिक कौवे बनाम पादरी (कविता)

एक कौवे को लगा बताने, पादरी उसकी लाचारी का हाल, तू हाँ कर दे,बना दूँ कोयल, हो जाओ सब मालामाल, रखा क्या है धर्म में तेरे, वही जाति- जी का जंजाल,   कांव-कांव कर मचा दिया इतने में कौवे ने कोलाहल ।4।   दूर दराज से उड़ते-उड़ते आ पहुंची पूरी जमात- “जान अकेला तुम क्या…

सर्दी-गर्मी-बरसात से परेशान (कविता)

सर्दी हो, चाहे गर्मी हो या हो रही बरसात, क्यूँ आलस छोड़ूँ, घर से निकलूँ, समझ न आए बात, हर दिन, हर ऋतु, हर माहौल से कुछ-कुछ है शिकायत, बाहर निकलूँ, चैन छिन जाए, बिगड़ी हुई है आदत, नित्यकर्म की निश्चितता में बसता है सुकूँ, क्यूँ शयन-व्यसन और भोजन हेतु बाहर जाकर तरसूँ ?  (6)…

बीस-इक्कीस (कविता)

जिस वर्ष अवगुंठन अनिवार्य हुआ, जिस वर्ष छुआछूत पुनः स्वीकार्य हुआ, जिस वर्ष काढ़ा-योग शिरोधार्य हुआ, जिस वर्ष सूक्ष्म शत्रु दुर्निवार्य हुआ, जिस वर्ष अभिमानी प्रवासी उपकार्य हुआ, जिस वर्ष हर नीम-हकीम औषधाचार्य हुआ, जिस वर्ष हर मानव उपचार्य हुआ, जिस वर्ष जीवित रहना भी सफल कार्य हुआ ;                        (8) इस क्रुद्ध वर्ष को भी…

घोषणापत्र-21 (कविता)

जिस प्याले पर नाम लिखा हो मेरा, वह प्याला मुझको प्रत्येक मिले; अमृत-गरल जो भी हो प्राप्य मेरा, उतना भर मुझको अवश्य मिले ।4। जिस छाले को पलना ही हो मुझपर, वह टिके नहीं लंबा, जल्दी आकर निकले; लड़ना पड़े दुनिया से भी लड़ लेंगे, पर एक बार उससे भी आँख लड़े।8। तेरे दर्शन हों…

रुका-रुका सा, रूखा-रूखा सा (कविता)

शब्द लिखते-लिखते पन्ने भरने को आते हैं, पर वाक्य बनते-बनते अर्थहीन हो जाते हैं । जितने बड़े हों बुल-बुले पानी बन जाते हैं, ऊंचे-ऊंचे पर्वतों पर बर्फ बन जम जाते हैं।4।   बात कहते-कहते वह प्रवचन दे जाते हैं, ज्ञान झरते-झरते यूंही दर्शन लिख जाते हैं। भीड़ जुटते-जुटते ऐसे ही पंथ बन जाते हैं, महात्मा…