पिता का घर (कविता)

डेढ़ साल बाद खुला पिता के घर का ताला, बंद पड़ा था, सामान और स्मृतियों को सहेजे हुए, हम बंदी थे दो हज़ार मील दूर हालातों के कारावास में, जीवन चल तो रहा था, किराए के मकान में दिन काट रहे थे, नौकरी में व्यस्त एवं कोरोना से बचकर, अक्सर सोचते थे पिताजी के चित्र…

डंडे को प्रणाम है, डंडा ही समाधान है (कविता)

(डंडे से अभिप्राय दंड/punishment/कानूनी दंड से भी है और हाथ में पकड़े जाने वाले डंडे से भी) जो बैठ कर के सड़कों पर जो चीख-चीख गलियों में स्वतंत्रता का दंभ भर अभिव्यक्ति के नाम पर चरा रहे हैं बुज्जियाँ उड़ा रहे हैं धज्जियां कानून की, समाज की प्रधान की, विधान की शासन के सम्मान की…

ये संकरा रास्ता (कविता)

कहीं से कहीं ले जाताये संकरा रास्ताटहला कर फिर वहीं ले आताये संकरा रास्ताकिसी महल केकिसी हरम मेंकौन सी पटरानी केकिसी किस नौकरानी केराज़ छिपाता कभी बतलाताये संकरा रास्ता (10) —————————– दिनभर सोता रात जागताराजा साहब की राह ताकताआहट लेता आहें सुनताखुसफुस करता बातें बुनतासमय संग किलकारी भरतानवागंतुक का अभिनंदन करताकोई कक्ष जब क्रंदन करतामंगल…

कवितायें लिख और चंबल में डाल (कविता)

कवितायें लिखते रहने से न कहीं क्रांति होगी न ही दूर किसी भटके हुए की भ्रांतियाँ होंगी कहाँ किसी ब्रह्मज्ञानी के विचार कभी बदलेंगे न ही पापियों, दुष्टों के अत्याचार कहीं घटेंगे   हाँ , दूर अवश्य  होगी मेरी बेरोजगारी हो चाहे निकासी ज़रूरी संभव है उदर में भरी गैस की थोड़ी कम हो जाए…

ओ पत्तलकार ! (कविता)

( यह कविता उनको संबोधित करती जो देश की बदनामी के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं ) जलती लाशें देख चेहरे पर इतनी लाली क्यूँ है आँखें मौत का मंज़र देख कर भी मतवाली क्यूँ हैं प्राणवायु पड़ गयी कम   चहुंओर फैला है ग़म फिर भी तेरी चहक में ये कव्वाली…

फूलों पर फिसले हुए (कविता)

फूलों पर फिसले हुए, पत्तियों के प्रति उदासीन, क्या ही मतलबी शौकीन ! रंगीनियत पर कुर्बान, चकाचौंध पर हलकान, गए-गुजरे लंपट आशिकों से ! (6) किसी ने कह दिया, वाह क्या रंग है ! क्या भीनी-भीनी गंध है ! भिनभिनाते भौरों से प्रेरित, मचलती तितलियों से मदोनमत्त, कसीधे पढ़ते रहे फूलों की शान में ।12।…

कोई चुनाव शेष न रह जाएँ (कविता)

देखना , देश में कोई चुनाव शेष न रह जाएँ हमारे प्रचार माध्यम दो पल सुस्ताने न पाएँ ऐसी कोई रैली न रहे जिसका आयोजन न हो कोई रोड़ शो ऐसा जिसमे जन-अभिवादन न हो कोई कोना, कोई बूथ जहां हम पहुँच न सकें कोई वार्ड, कोई सीट जिसपर हम लड़ न सकें  (6) देखना,…

सिसकी पर लगा कर साइलेंसर (कविता)

सिसकी पर लगा कर साइलेंसर, हिचकियाँ भगा हाजमोला निगल, चाय की चुस्की खेञ्च कर लंबी, गरदन मटकाती अगल-बगल, आँखें मिचका, पलकें झपका, होठों को दबा दर्द पी गयी, बही कश्ती नहीं आंसुओं में मगर, हया के दरिया में डूब गयी ।8।   इश्क़ की इंतेहा फरमाइश पर, थोड़ी-सी ज़ोर आजमाइश कर, बाहों में फना वह…

तुरतातुरत भरो बिजली का बिल (कविता)

बिजली का बिल माने शैतान का फरमान ! भरे बिना मुमकिन नहीं शायर का गुज़ारा, ख्याल आयें भी तो पन्नों पर उतारूँ कैसे? रूह मेरी रोशन है पर कमरे में है अंधेरा छाया ।4।    रात भर जेहन में दबा कर रखा महफूज समझकर, मतले का हमने कश्मीरी पुलाव बना डाला, बिजली का बिल ही…

हम जिये जा रहे हैं (कविता)

विचार कहीं ले जा रहे हैं, शब्द अटक नहीं पा रहे हैं; उद्गार हिन्दी में हैं पनप रहे, निकल उर्दू में पा रहे हैं; देना तो जवाब है हमको, पूछे सवाल हम जा रहे हैं; जब मौका खुल कर कहने का है, बात को और उलझा रहे हैं; कविता फसी है दिलोदिमाग के बीच, ज़ोर…

धार्मिक कौवे बनाम पादरी (कविता)

एक कौवे को लगा बताने, पादरी उसकी लाचारी का हाल, तू हाँ कर दे,बना दूँ कोयल, हो जाओ सब मालामाल, रखा क्या है धर्म में तेरे, वही जाति- जी का जंजाल,   कांव-कांव कर मचा दिया इतने में कौवे ने कोलाहल ।4।   दूर दराज से उड़ते-उड़ते आ पहुंची पूरी जमात- “जान अकेला तुम क्या…