बीस-इक्कीस (कविता)

जिस वर्ष अवगुंठन अनिवार्य हुआ, जिस वर्ष छुआछूत पुनः स्वीकार्य हुआ, जिस वर्ष काढ़ा-योग शिरोधार्य हुआ, जिस वर्ष सूक्ष्म शत्रु दुर्निवार्य हुआ, जिस वर्ष अभिमानी प्रवासी उपकार्य हुआ, जिस वर्ष हर नीम-हकीम औषधाचार्य हुआ, जिस वर्ष हर मानव उपचार्य हुआ, जिस वर्ष जीवित रहना भी सफल कार्य हुआ ;                        (8) इस क्रुद्ध वर्ष को भी…

घोषणापत्र-21 (कविता)

जिस प्याले पर नाम लिखा हो मेरा, वह प्याला मुझको प्रत्येक मिले; अमृत-गरल जो भी हो प्राप्य मेरा, उतना भर मुझको अवश्य मिले ।4। जिस छाले को पलना ही हो मुझपर, वह टिके नहीं लंबा, जल्दी आकर निकले; लड़ना पड़े दुनिया से भी लड़ लेंगे, पर एक बार उससे भी आँख लड़े।8। तेरे दर्शन हों…

रुका-रुका सा, रूखा-रूखा सा (कविता)

शब्द लिखते-लिखते पन्ने भरने को आते हैं, पर वाक्य बनते-बनते अर्थहीन हो जाते हैं । जितने बड़े हों बुल-बुले पानी बन जाते हैं, ऊंचे-ऊंचे पर्वतों पर बर्फ बन जम जाते हैं।4।   बात कहते-कहते वह प्रवचन दे जाते हैं, ज्ञान झरते-झरते यूंही दर्शन लिख जाते हैं। भीड़ जुटते-जुटते ऐसे ही पंथ बन जाते हैं, महात्मा…

इतना न पुकारो इक्कीस को, कि….(कविता)

इतना न पुकारो इक्कीस को, जाता हुआ बीस अकड़ जाए, इतनी न पालो उम्मीदें , नवागंतुक आते-आते ठिठक जाए।2। मत दोष मढ़ो यूं साल पर सारा, घड़ी नहीं बिदक जाए, हैं दोनों (20-21) समय ही –एक प्रवृत्ति, महाठगबंधन न बन जाए।4। खिंच न जाए ये दिसंबर ,जनवरी स्थगित न हो जाए, जंच जाये समय को…

सुबह की बिदकी कविता (कविता)

कविता काफ़ूर हो गयी है, चूंकि आज देर से उठा ! फुर्सत फुर्र हो गयी है, क्यूँ देर से उठा ! चिड़ियाँ भी उड़ गईं हैं, छत पर चुग्गा नहीं पड़ा, आज क्या लफड़ा हुआ, क्या अलार्म नहीं बजा?   (8) अब आँख खुली है तो जमाने का बोझ है मुझ पर, दो पल का चैन…

लील्यो ताही मधुर फल जानु (कविता)

मैंने अग्नि का धधकता गोला निगल लिया है, उसकी लपटें- पेट में पड़ीं बिन पची शंकाओं को, गुर्दों से ताकती-झाँकती लाचार बनाती झिझक को, आंतों को जकड़ कर बैठे अनमने आलस्य को, जिगरे से पल-पल सवाल करती चिकनी,तेली शर्म को धू-धू कर जला के भस्म कर देंगी ।6।   कभी जमने को आया मेरा लहू…

धुंध हुई धुआँसा (कविता)

आँख गलती से भी लड़ जाती थी तो समझते थे प्यार, राह मे खड़ी जो दिख गई समझो कर रही इंतज़ार, कभी धुंधला सा दिखता था तो कुहरा ही होता था, जो चमकता था अंधेरे में उसका चेहरा ही होता था, ये कमबख्त ऐसा पर्दा ढक देता था कुहासा, मज़ाल कि आशिक दिल को दिख…

सबका सूर्य पृथक (कविता)

सूर्य क्या है ? वैज्ञानिकों बताते धधकती गैसों का गोला- परमाणु विलय का फल, अनंत ऊर्जा का स्रोत ।4। वैदिक ऋषियों का सर्वस्व- सर्व प्रेरक, सर्व प्रकाशक, सर्व प्रवर्तक, सर्व कल्याणकारी, जन्मदाता, पालक, जगत की आत्मा ।8। न कहीं भूमि, न कोई ठोस आधार, न किया जा सके हस्तगत, न पग धरे जा सकें जिस…

26/11 : राष्ट्रीय शर्म की बरसी आपको बहुत, बहुत मुबारक (कविता)

चोरकट मार गया तमाचा, बेवजह, सरेआम, जिहाद, दंगा, चिल्ल-पौं, फैलाते रहने का काम, आदतन आततायी, वह हिंसक पंथ का अनुयायी, था ताड़ना का अधिकारी, पर वोट पड़ गए आत्मसम्मान पर भारी ।4। बन हिमालय सह गए हम पैशाचिक आघात, चर्चाओं के चक्रव्युह में फस गया प्रतिघात, अपने दुश्मनों की बनाई हमने एक फेहरिस्त, इस नपुंसकता…

फुदकती, चहकती ज़िंदगी (कविता)

फुदकती ज़िंदगी, चहकती ज़िंदगी, मुट्ठी बंद भी कर लूँ, तो रेत सी रिसती ज़िंदगी ।4। कहाँ टहलने को आतुर, क्या बताने को बेचैन, जितनी डोर खींचूँ, उतनी ढील लेती ज़िंदगी ।8। दोपहर को रंगीन शाम की आस, काली रात को उजली सुबह का सहारा, जितना घड़ी टालूँ, वक्त का एहसास कराती ज़िंदगी ।12। जब लिखना…

एक्ज़िट पोल का खुल गवा पोल (एक कविता)

भीड़ तो जुटी थी पर भोट नहीं दिया, कहीं ऐसा तो नहीं कोई झोल कर दिया? इतनी हवा भर दी   (पॉलिटिकल फूटबाल में ) कि सेल्फ-गोल हुई गवा, नहीं कोई ई.भी.एम का चक्कर, एक्ज़िट पोल का पोल खुल गवा ! (8) अब कौन समझाई बुतरु को, कौन बताई सच, बिना नतीजे टीभी चैनल कर…

धिम्मी करे बलवाई की रंगाई, बाकी को पढ़ाये कानून

बीती रात शहर में जमकर बलवा हुआ, आज सुबह से सेकुलरवाद की मीठी बयार चल रही है ।2।   गयी रात उनके हाथों में हथियार थे, आज ज़ुबान पर गांधी और देश का संविधान है ।4। कल पूछ रहे थे किसकी है यह दुकान? बहुत इतरा कर जता रहे थे -किसी के बाप का नहीं…