हाय, मैं आहत हो गया ! (कविता)

हाय, मैं आहत हो गया, क्यूँ ली तुमने जम्हाई, क्यूँ मुस्काए मुझको देखकर, क्यूँ पलकें ही झपकाईं, क्यूँ झटका देकर ग्रीवा को, माथे से लटें सरकाईं, हाय, मैं आहत हो गया, तुमको लाज भला नहीं आई ! इतना कम था क्या, जो फिर ले बैठे अंगड़ाई, ऊंचे हाथ खेञ्च कर पीछे, पृष्ठ बढ़ा अल्हड़ता से…

कोई बड़ी बात नहीं है

चार बच्चों का बाप होकर बढ़ती जनसंख्या का रोना रोना कोई बड़ी बात नहीं है । केवल अपने आप को भरमाना भर है कि बच्चे भले आपके हों, पर आप उनके बाप नहीं भी हो सकते हैं । खासकर तब जबकि आप संसद परिसर में उपस्थित हों । चाहिए थोड़ा-सी कल्पना शक्ति, और बेहिचक दोगलापन…

समाचार पत्रों में अंतर्निहित हास्य

समाचार पत्रों को पलटिये, वे सामान्य जीवन और आम आदमी को सदैव ट्रोल करते मिलेंगे । वे सही मायनों में हास्य का पुलिंदा हैं । वैसे राजनीति और अपराध, जो अखबारों के दो प्रमुख स्तम्भ हैं, उनसे जुड़ी खबरों में हास्य, व्यंग्य, कटाक्ष, लांछन, उलाहने, तमाशा और निर्लज्जता अंतर्निहित हैं । इस कारण अधिकांश शीर्षकों…

Is this the Promised Free Speech? (Poem)

My tongue is wrapped around a prickly pole, Is this the Free Speech the Framers promised? Look up, there must be some law to book me, I know I can’t get away if you wish to put me behind bars, locked up for good. Someone gets offended every single time I speak on matters, temporal…

कौन है वह निरा मूर्ख जो भारत को एक राष्ट्र नहीं मानता ?

अणुभाष अपने करों में संभालते ही यह चिरयुवा नायक स्वनामधान्य विद्वान हो जाता है । संवाद करते-करते कभी सनातन पर प्रवचन देने लगता है, तो कभी संविधान का भाष्य बताने लगता है । कभी तो विद्रोही स्वरूप धरकर जनक्रांति की चेतावनी देने लगता है, तो कभी शब्दानुशासन भंग करके उनकी नयी व्याख्याएँ करने लगता है…

Nation OR A Union of States – No Country for the Deluded Genius!

“India is merely a geographical expression,” Winston Churchill once said in exasperation. “It is no more a single country than the Equator.” The founder of Singapore, Lee Kuan Yew, also once echoed that sentiment, arguing that “India is not a real country. Instead it is thirty-two separate nations that happen to be arrayed along the…

आम नेताजी का भाषण (व्यंग्य धन फोकट चेक)

“किसी ने पूछा कि जी आप कह रहे हो कि दिल्ली में जनरेटर की दुकानें बंद हो गईं, तो क्या वो दुकानदार बेरोजगार हो गए ? क्या वो झक मार रहे हैं ? मैंने बताया नहीं जनाब वो आजकल सपने खरीद रहे हैं, और झूठ बेच रहे हैं । बढ़िया धंधा है ! अपने-अपने शहरों…

भाषाई फुलझड़ी : धुलेलकर की हिंदुस्तानी के नाम पर संविधान सभा में धमाचौकड़ी

संबिधान सभा की दूसरी बैठक, तिथि 10 दिसंबर, 1946 सेक्षंस एवं कमेटी के मसले पर सदन में गरमागरम बहस चल रही थी । एक तरफ थे कृपलानी तथा जयकर, दूसरी तरफ लामबंद थे सुरेश चन्द्र बनर्जी , श्यामप्रसाद मुखर्जी, टंडन, केएम मुंशी और हरनाम सिंह । पंडित नेहरू कृपलानी को संघर्ष विराम का इशारा करके…

न लड़ा, न जीता कोई चुनाव, फिर क्यूँ धरती पर नहीं पड़ रहे पाँव (कविता)

मैं नहीं जीता किसी चुनाव में, फिर भी हृदय गौरान्वित है, न कद बढ़ा, न पद मिला, फिर मन क्यूँ इतना आल्हादित है? तेरा भी क्या नुकसान हुआ, क्या दांव चला जो हार गया, बहुत मुंह चढ़ा कर बैठा है, आखिर क्यूँ इतना उद्वेलित है? बिना वजह की खुशी है प्यारे, आज जम कर फोडूंगा…