भाषाई फुलझड़ी : धुलेलकर की हिंदुस्तानी के नाम पर संविधान सभा में धमाचौकड़ी

संबिधान सभा की दूसरी बैठक, तिथि 10 दिसंबर, 1946 सेक्षंस एवं कमेटी के मसले पर सदन में गरमागरम बहस चल रही थी । एक तरफ थे कृपलानी तथा जयकर, दूसरी तरफ लामबंद थे सुरेश चन्द्र बनर्जी , श्यामप्रसाद मुखर्जी, टंडन, केएम मुंशी और हरनाम सिंह । पंडित नेहरू कृपलानी को संघर्ष विराम का इशारा करके…

न लड़ा, न जीता कोई चुनाव, फिर क्यूँ धरती पर नहीं पड़ रहे पाँव (कविता)

मैं नहीं जीता किसी चुनाव में, फिर भी हृदय गौरान्वित है, न कद बढ़ा, न पद मिला, फिर मन क्यूँ इतना आल्हादित है? तेरा भी क्या नुकसान हुआ, क्या दांव चला जो हार गया, बहुत मुंह चढ़ा कर बैठा है, आखिर क्यूँ इतना उद्वेलित है? बिना वजह की खुशी है प्यारे, आज जम कर फोडूंगा…

चप्पलतंत्र से चपलतंत्र तक (व्यंग्य)

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है कि कैकईनन्दन भरत कहीं राजवंशी न होकर एक अफसरशाह मात्र तो न थे ? आखिर एक अधिकारी ही इतना कुशल हो सकता है कि पादुकाराज जैसे नीरस गल्प में प्रजा की आस्था को चौदह बरस तक जगाए रख सके । अजी चौदह की क्या कही , भरत…

फ़ाल्टन्यूज़ ने थूक के चाटा जब यूपी पुलिस ने मारा सच का चांटा

फ़ाल्टन्यूज़ नाम का एक गिरोह फर्जी खबरें बनाने, चलाने और सच के साथ छेदछाड़ कर नेटिज़न्स को बरगालने के काम में रिपब्लिक ऑफ ट्विटर पर अत्यधिक सक्रिय है । इस फ़ाल्टन्यूज़ को चलाने वाले दो वामपंथी दलाल – एक गंजा और किसी चिड़ियाघर से भागा एक भालू- किसी भी खबर में हेराफेरी कर उसे सत्यनिष्ठा…

कोई चुनाव शेष न रह जाएँ (कविता)

देखना , देश में कोई चुनाव शेष न रह जाएँ हमारे प्रचार माध्यम दो पल सुस्ताने न पाएँ ऐसी कोई रैली न रहे जिसका आयोजन न हो कोई रोड़ शो ऐसा जिसमे जन-अभिवादन न हो कोई कोना, कोई बूथ जहां हम पहुँच न सकें कोई वार्ड, कोई सीट जिसपर हम लड़ न सकें  (6) देखना,…

Mobocracy 1920-21 Reprised in 2020-21: Gandhi is No More, but His Words can Guide

During his 1920 train tours, Gandhi discovered India, and more importantly, understood the Indians. The country was in a state of ferment, people were highly expectant, keen to be led and express themselves socially and politically. During and after his visits, Gandhi recorded his observations- “the Congress is a demonstration for the mob. Though organized…

भारत में लोकतन्त्र नहीं है क्यूंकी मुझे अब भी सुना जाता है (व्यंग्य)

भारत में लोकतन्त्र नहीं है । आपके ख्यालों में होगा, पर भारत में लोकतन्त्र नहीं है ।मेरा नाम आँधी भले हो पर, मैं आँधी नहीं हूँ। ग और ध भले हों मेरे नाम में पर मैं धागा भी नहीं हूँ । पर अगर आपके ख्यालों में भी भारत ही है तो थोड़ा गौर से देखिये…

आज वोट है शहर में (कविता)

  नमस्कार बोन्धु-बांधवों, मैं अभिनव पंचोली , आज मतदान दिवस है , इस मौके पर मैं अपनी कविता पढ़ता हूँ – शीर्षक है – आज वोट है शहर में :   आज वोट है शहर में , है बंधा हुआ किसी खूँटे से हर बकरा , कोई पैसे लेकर मोल बिका है , कोई सरेंडर…

Not On this Chief Minister’s Watch

The most endearing trait of the Indian voter is his complete lack of expectations from the elected representatives.His tolerance for their perceived shenanigans is also unmatchable. It is perhaps this innate humility of the common man that shames some politicians into performing token public service and keeps their tomfoolery under check. Netas might bicker on…