What makes the Pathan sneeze? 

Deepika Padukone plays Shanya D’Costa, a Christian girl, in Pathan. That is to perhaps to justify her roaming around in bikinis, desperately thrusting and gyrating her body in crassest possible manner, faking coital convulsions, being grabbed and thrown around by the Pathan as if she is ‘unaccompanied baggage’ or ‘street trash’. This is typical Bollywood…

जाति का जंजाल – ज पर आ की मात्रा, त पर चढ़ी छोटी इ (चौपाल)

शाम के चाय अड्डे पर दोस्तों के संग जाति पर संवाद किया । फिर कहीं प्रीतिभोज पर जाना पड़ा तो वहाँ भी जाति का ही भोग लगाया । पिछड़े व्यंजन में लगा था मिर्च का छौंका । अगड़ा वाला घृत और शक्करमयी – उसे फिर भी थाली में आने का अनिवार्य आमंत्रण चाहिए । शयन…

उलझा पाकिस्तान – बाजवा रुके या जाए ? इमरान को भला कौन क्या समझाये?

इमरान खान को गोली लगी कि गोलियां, ठीक से कहा नहीं जा सकता । चली थीं चार, पहले बताया गया लगीं हैं दो – दोनों पाँव में एक-एक, फिर किसी ने बतलाया तीन, और अब सरकारी हवाले से एक ही गोली लगने की बात मानी जा रही है । अब हक़ीक़ी आज़ादी लॉन्ग मार्च के…

BLOCK

Getting stuck is a ‘state of mind’. Words do not desert a writer, ideas and guts do. Stream of consciousness never dries up. The nib might get broken or blunted.  Paper might begin soaking up ink. The bottle can leak, ink can become colourless. What gets flashed in the mind might not take shape on…

The Akwasi Addo Alfred Kwarteng level of Economic Mismanagement

Liz Truss, who might not outlast a lettuce, has let Akwasi Addo Alfred Kwarteng take the fall after the two of them had made Britain the laughing stocks across the world with their mini-Budget. Although the name carries the aura and grace befitting the high office of the Chancellor of the Exchequer and the Second…

हाय, मैं आहत हो गया ! (कविता)

हाय, मैं आहत हो गया, क्यूँ ली तुमने जम्हाई, क्यूँ मुस्काए मुझको देखकर, क्यूँ पलकें ही झपकाईं, क्यूँ झटका देकर ग्रीवा को, माथे से लटें सरकाईं, हाय, मैं आहत हो गया, तुमको लाज भला नहीं आई ! इतना कम था क्या, जो फिर ले बैठे अंगड़ाई, ऊंचे हाथ खेञ्च कर पीछे, पृष्ठ बढ़ा अल्हड़ता से…

कोई बड़ी बात नहीं है

चार बच्चों का बाप होकर बढ़ती जनसंख्या का रोना रोना कोई बड़ी बात नहीं है । केवल अपने आप को भरमाना भर है कि बच्चे भले आपके हों, पर आप उनके बाप नहीं भी हो सकते हैं । खासकर तब जबकि आप संसद परिसर में उपस्थित हों । चाहिए थोड़ा-सी कल्पना शक्ति, और बेहिचक दोगलापन…

समाचार पत्रों में अंतर्निहित हास्य

समाचार पत्रों को पलटिये, वे सामान्य जीवन और आम आदमी को सदैव ट्रोल करते मिलेंगे । वे सही मायनों में हास्य का पुलिंदा हैं । वैसे राजनीति और अपराध, जो अखबारों के दो प्रमुख स्तम्भ हैं, उनसे जुड़ी खबरों में हास्य, व्यंग्य, कटाक्ष, लांछन, उलाहने, तमाशा और निर्लज्जता अंतर्निहित हैं । इस कारण अधिकांश शीर्षकों…

Is this the Promised Free Speech? (Poem)

My tongue is wrapped around a prickly pole, Is this the Free Speech the Framers promised? Look up, there must be some law to book me, I know I can’t get away if you wish to put me behind bars, locked up for good. Someone gets offended every single time I speak on matters, temporal…

कौन है वह निरा मूर्ख जो भारत को एक राष्ट्र नहीं मानता ?

अणुभाष अपने करों में संभालते ही यह चिरयुवा नायक स्वनामधान्य विद्वान हो जाता है । संवाद करते-करते कभी सनातन पर प्रवचन देने लगता है, तो कभी संविधान का भाष्य बताने लगता है । कभी तो विद्रोही स्वरूप धरकर जनक्रांति की चेतावनी देने लगता है, तो कभी शब्दानुशासन भंग करके उनकी नयी व्याख्याएँ करने लगता है…