क्यूँ श्रम करे व्यर्थ जब हरामीपन चल जाए (कविता)

कचरा स्वाहा कर दिया उसने उठाने के बजाए, क्यूँ श्रम करे व्यर्थ जब हरामीपन चल जाए, झुके, सोरे, अरे कितनी बार उठाए! कमर बेचारे की हाय बार-बार कराहे, गंदगी ढोकर शहर से बाहर ले जाये, कूड़े के पहाड़ पर कितना और कूड़ा गिराए? दुर्गंध से बेचारे की नाक सड़-सड़ जाये, इससे बेहतर है थोड़ी शानपट्टी…

भोजताल (कविता)

संध्या हो गई, उसे तो होना ही था सारी दीप्ति को तुझमें खोना ही था तेरे किनारे जो हम निकल आए टहलने मंद पवन में कामनाओं को मचलना ही था जाते जाते सब रंग गए बिखर जिधर भी देखूं तेरा प्रकाश फैला उधर लहरों को बहना है ऐसे ही रात भर मत्त बादल भटकेंगे कभी…

शांत, अधीर (कविता)

प्रकाश की पहुँच से गहरा पाटभावनाओं-सी शंकित झीलमेहंदी जैसा चढ़ा मौसमआसमां अधीरहवा, तरंगें नदारदसोई शायद मछलियाँ भीउबल उबल जाएभीतर एक ज्वालामुखीये सन्नाटा, ये शांतितब तक हीजब तक प्रेम जीवित हैफिर सिर्फ त्रासदी (12) ———————————————————————————————————————————– #hindipoem #kavita#bhopal#bhojtal #MP