हाय, मैं आहत हो गया ! (कविता)

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हाय, मैं आहत हो गया,

क्यूँ ली तुमने जम्हाई,

क्यूँ मुस्काए मुझको देखकर,

क्यूँ पलकें ही झपकाईं,

क्यूँ झटका देकर ग्रीवा को,

माथे से लटें सरकाईं,

हाय, मैं आहत हो गया,

तुमको लाज भला नहीं आई !

इतना कम था क्या,

जो फिर ले बैठे अंगड़ाई,

ऊंचे हाथ खेञ्च कर पीछे,

पृष्ठ बढ़ा अल्हड़ता से आगे,

क्यूँ जा चढ़ाई प्रत्यंचा,

भीषण धनुष टंकार सुनाई,

हाय, मैं आहत हो गया,

दुहाई है दुहाई ।

तेरा रोना-हँसना,

बोलना, चुप रहना,

कुछ भी करना,

कुछ न करना,

मुझे बींध-सा जाता है,

मैं आहत होने लगता हूँ,

फिर क्रोध उमड़ कर आता है,

सच तो यह है कि यह क्षोभ,

है नपुंसकता का आत्मबोध,

तेरे होने-भर से आहत,

मेरे अस्तित्व में ही कड़वाहट,

मैं हूँ आहत क्यूंकी तू है,

मैं आहत हूँ जब तक मैं हूँ ।


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