कोई बड़ी बात नहीं है

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चार बच्चों का बाप होकर बढ़ती जनसंख्या का रोना रोना कोई बड़ी बात नहीं है । केवल अपने आप को भरमाना भर है कि बच्चे भले आपके हों, पर आप उनके बाप नहीं भी हो सकते हैं । खासकर तब जबकि आप संसद परिसर में उपस्थित हों । चाहिए थोड़ा-सी कल्पना शक्ति, और बेहिचक दोगलापन । इस व्यवस्था में अगर सफल होना है, तो यह सब गुण तो वैसे भी आपमें होने ही चाहिए ।

अगर ऐसा करने के लिए मोटे पैसे मिल रहे हों तो नंगे होकर तस्वीरें खिंचवाना कोई बड़ी बात नहीं है । मैगज़ीन हो या पार्टी, फिल्म हो या बाथरूम – अंतर ही क्या है ? मियां-बीबी राज़ी, छापने वाला पाजी- तो तुमको क्या है जी ? नहीं सुहाता है तो मत खरीदो मैगज़ीन, बहिष्कार करो नंगे की फिल्मों का । वैसे भी कौनसा खरीदते ही हो पत्रिकाएँ – खरीदते तो सबकी बिकने की नौबत तो नहीं होती । कौन सा उसकी फिल्म देखने जाते ही हो ? जा रहे होते तो बॉलीवुड की स्थिति इतनी दयनीय थोड़े ही होती ।

आराम की तलब लगना कोई बड़ी बात नहीं है । पर इतने पोचे प्रदर्शन के बाद, और बिना किसी वजह के छुट्टियाँ अपलाय कर देना थोड़ा अजीब है । बहुत देर क्रीज़ पर भी टिके भी, जो कोई खास थकान का अनुभव करें । वैसे टीम निरर्थक मैच पर मैच खेले जा रही है । क्रिकेट की अधिकता से दर्शक तक उकता गए हैं, खिलाड़ी आखिर कितना खेलेगा ? जब आप फॉर्म में नहीं होते हो, गेंदबाजों के सामने एकदम खुल चुके हो, ज़्यादातर समय ड्रेसिंग रूम में गुज़ार रहे हो, तो समय ऐसे भी स्लो-मो में ही कटता है ।  सोशल मीडिया और टीवी को तो बंद कर दिया जायेगा, बीबी को कैसे समझाया जाए – ओब्वियस है, छुट्टी लेकर ।

हर हफ्ते एक-दो बार विदेश जाना कोई बड़ी बात नहीं है । बस जेब में पैसा होना चाहिए, और सिर पर किसी तरह की ज़िम्मेदारी और जवाबदेही नहीं बनती हो  – तब कोई भी कितनी बार भी यहाँ से वहाँ, और वहाँ से यहाँ, हो सकता है । जाने वाले को सीनाजोरी भी आनी चाहिए – स्वयं की यात्राओं को निजी बताकर कोई सफाई नहीं देनी है, अन्य कोई भले कामवश भी बाहर जाये तो उसपर पैसा उड़ाने और सैर-सपाटे करने के आरोप मढ़ देने हैं । इसपर भौंकने के लिए स्वामिभक्त कुत्तों की फौज भी जमा होना चाहिए ।

लिखे हुए दो वाक्यों को पढ़ने में तीन बार अटक जाना कोई बड़ी बात नहीं है । अगर आपके माँ-बाप दोनों ही सीएम रहे हों और आपकी स्कूलिंग भी शानदार रही हो, तब तो पढ़ते-पढ़ते अटकने को आपकी अदा ही माना जाएगा । हाँ लेकिन अगर आपके जैसे गवार-बाय-चोईस भी महामहिमों को गूंगी गुड़िया टाइप के अपशब्द बोलने लगें, तब लोगों को आपके तुतलाने और अनाप-शनाप बकने पर आपका मखौल उड़ाने से कोई नहीं रोक सकता ।

दो बूस्टर लगवाने के बाद भी कोरोना ग्रस्त हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है । लेकिन उसके बाद भी अगर आप टीकाकरण को हर मर्ज का इलाज़ बता कर वेक्सीन सेल्समेन बन रहे हैं, तब आपकी नीयत पर शक होना लाज़मी है ।

माफी मांगना कोई बड़ी बात नहीं है । पर स्वयं थूक कर चाटने के बाद भी बाकी क्षमाप्रार्थियों पर छींटाकाशी जारी रखना अनुपम निर्लज्जता की श्रेणी में आयेगा । ‘सब चोर हैं जी’ से ‘मैं chew हूँ’ तक का सफर जो तय कर चुका हो उसे इतिहासपुरुषों की आलोचना से बचना चाहिए ।

पाकिस्तानी पत्रकारों से मिलना, उन्हें घर बुलाना कोई बड़ी बात नहीं है । पर ऐसा करके छुपाना, और सामने वाले के खुलासे पर अनर्गल सफ़ाइयाँ पेश करना थोड़ा अजीब है । उसपर भी हर मुद्दे, हर प्रश्न को बस ‘कौम संकट में है’ के नज़रिये से देख्नना बीमारी का परिचायक है ।

पाकिस्तान, लंका, बांग्लादेश से प्रेम होना कोई बड़ी बात नहीं है । मजहबी या भाषाई लगाव के चलते ऐसा संभव है । पर हिंदुस्तान से लातें पड़ने पर भी इन महान देशों में जाकर न बसना समझ नहीं आता । गांधी ने एक बार अंग्रेजों से कहा था – “For heaven’s sake quit. Leave the country to God, or anarchy. But go.” जो भारत में न सुरक्शित महसूस करते हैं, और जिन्हें लगता है पड़ोसी ज्यादा सुखी हैं, उन्हें स्वतः चले जाना चाहिए ।

इक्कीस करोड़ कैश पकड़े जाना कोई बड़ी बात नहीं है । हाँ, चार फोन किए जाने के बावजूद एक भी न उठाया जाना बुरा है । बेचारे चोर को कितने अकेलेपन का एहसास हुआ होगा ।

बुड्ढा हो जा जवान, तफ़्तीश के लिए महानिदेशालय बुलाया जाना कोई बड़ी बात नहीं है । ऐसे ‘सर तन से जुदा’ के माहौल में कुछ भी कहना, सुनना या लिखना खतरे से खाली नहीं है ।

करोड़ों लंबित मुकदमों को अपनी छाती पर धरकर भी दुनिया भर का ज्ञान पेलते जाना कोई बड़ी बात नहीं है , बस आपमें खानदानी आत्मविश्वास होना चाहिए । कोई आपका क्या बिगाड़ सकता है?

क्या बड़ा है, क्या छोटा- ये हमसे न पूछो ! ‘सर तन से जुदा’ तक कोई बड़ी बात नहीं है, जैसे मंदिरों का तोड़े जाना कोई त्रासदी नहीं थी । न गाय का मांस खाना ही बड़ी बात है, न गाय को मारने वाले को मार देना । कोई कितना गिर सकता है, और जनता कितने नीचे से उसे फिर उठा सकती है – बड़ा और छोटा इसी पर निर्भर करता है । एक जंतर फिर भी है – खानदानी के लिए कुछ भी बहुत बड़ा नहीं होता, आम आदमी कुछ भी कर दे, छोटेपन से ऊपर नहीं उठ सकता ।

पर यह भी कोई बड़ी बात नहीं है ।


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