हर सुबह, सुबह जैसी ही होती है(कविता)

हर सुबह, सुबह जैसी ही होती है,

आँखें खुली नहीं तामझाम में फसा देती है ।

संसार भले कहीं बुलाए, न-बुलाये,

यह जीवन में धका ही देती है ।

जागिए चौंक कर या चुंबन-आलिंगन से,

स्वप्न से निकालकर यथार्थ पर गिरा देती है ।

संकल्प लिवा देती है नाना-प्रकार के,

साँझ तक के सहस्त्रों कार्य गिना देती है ।

उलाहने देना भी एक अदा है उसकी,

मेरी अपूर्णता का संज्ञान करवा देती है ।  

चेताती है, बताती-स्मरण भी कराती है,

उत्तरदायित्व के बोझ तले दबा देती है ।

धवल पृष्ठ होती है हर एक सुबह,

हाथों में एक कलम थमा देती है ।  

जा लिख ले जो लिखना है भाग्य में,

संभावनाओं के बांध बना देती है ।


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  1. Anonymous says:

    Very nice

    Like

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