उदासी का राजकुमार या जली-कटी का होलसेल विक्रेता

कल एक बूढ़ी लाश के अंतिम संस्कार में सम्मिलित हुआ । पोस्ट-कोरोना युग में अब मौत इत्यादि पर अधिक नाटक-नौटंकी नहीं होता । विदाई समारोहों की आदत सी पड़ गयी है । फिर यह जाने वाला तो अपने पीछे अधिक नौहागर भी नहीं छोड़ गया । ऐसे में उठावने से लेकर शवदाह तक कई मर्तबा रवीश ‘क्रंदन’ कुमार का स्मरण हुआ । यही सोचा कि वह शोक सभा में मौजूद होता तो क्या कहता, कैसी शक्ल बनाता, सामाजिक टीका-टिप्पणियाँ करता और वह वहाँ नहीं है तो क्यूँ नहीं है, और यह भी कि उसे वास्तव में कहाँ होना चाहिए इत्यादि । इन सब बातों पर पहले तो मैंने स्वयं ही बहुत मनन-चिंतन किया, उसके उपरांत अन्य शोकातुरों का मन हल्का करने के उद्देश्य से उनसे भी यह चर्चा छेड़ी । सभी का मत समान था – चूंकि मरने वाला गरीब नहीं था, इसलिए रोन्दु कुमार अपना रोल ठीक से निभा नहीं पाता, तभी नहीं पहुंचा । गरीबी का अपना एक मार्केट है, उसके सौदागर चिन्हित हैं । वैसे भी हिन्दू रीति-संस्कारों को रवीश्वा झेल नहीं पाता, और संभव है झल्ला जाता । ठीक ही हुआ नहीं पहुंचा ।

शव को आम की लकड़ियों में रखकर जलाया गया । इन लकड़ियों से किसी गरीब का चूल्हा फूंका जा सकता था । गनीमत रही कि लकड़ियाँ चन्दन की नहीं थीं , वरना उनसे लिपटे रहने वाले निहत्ते भुजंग भी जल कर राख़ हो जाते, कम से कम बेघर तो हो ही जाते । मुट्ठी भर शोक संतप्त परिजनों का विलाप भी उससे सहन न होता । यमन और यूक्रेन में इतने निरीह नागरिक मारे गए तब तो इनमें से किसी की रुलाई नहीं फूटी थी ! दस किलोमीटर चली शवयात्रा अगर पैदल हुई होती तो पाणे को कोरोना काल का मजदूर पलायन याद आ गया होता, और उस पर वह जमकर हिनहिनाता ।  पर मोक्ष रथ मंगाया गया था और पार्थिव शरीर को उस पर ठेल दिया गया । तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं । जाने वाला धुआँ उड़ाता, पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता और सरकार को तेल के नाम पर मोटा टैक्स चुकाता हुआ रवाना हुआ । क्या खूब सोचा होगा किसी अरबी ने – घर के अहाते में गड्ढा करके, उसी में दफन कर दो । न ताबूत की ज़रूरत, न तेल का उपभोग । खाद बन जाओ, मिट्टी में मिल जाओ और समाज के काम आओ । एक तरह से स्वयं ही धरती माँ बन जाओ । जो अरबी घर के अहातों में सदियों से दफ़न हो रहे हैं, वह आने वाली पुश्तों के लिए तेल बनकर निकलेंगे । इसे कहते हैं स्वार्थहीन सस्टेनेबल लिविंग ।

पिण्ड दान पर तो रवीश एकदम सिकुड़ ही जाता । आटे का हाय ऐसा दुरुपयोग ! मुझे यकीन है कि ऐसे में वह मिस्र के शासकों की अंतिम यात्रा हेतु पिरामिडों में शव के साथ रखे जाने वाले सोने एवं अन्य कीमती सामानों का हवाला देता । सती का ज़िक्र भी शायद कर ही देता । कोई भूखा ही न रहे अगर सारे पिण्ड दानों में खपत होने वाले समस्त आटे की रोटियाँ बना कर गरीबों में बाँट दी जाएँ । सवाल है रवीश बाबू कि रोटियाँ बेलेगा कौन और सेकेगा कौन? और रोटियाँ बन भी जातीं, तो तुम्हें उनपर घी भी लगाना होता ।

वैसे मुर्दा शरीर पर घी का लेप भी लगाया गया था । दाम देखे हैं किसी ने ? ऐसा खर्चीला मरण! इससे तो जीवन ही भला, सज़ा तो मिलती ही रहती है । किसी ने अंग-दान के संदर्भ में जानना चाहा । बताया गया कि मृतक ने ऐसी किसी इच्छा का इज़हार कभी नहीं किया था । इस पर तो क्रंदन कुमार की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया अवश्य आती ।  किसी ने फूल चुनने का समय और तारीख भी अवश्य बताए होते । राख़ होकर भी नदियों के जल को प्रदूषित करने की चाह ! खाक होकर मिट्टी होना क्या बुरा था ? हर मोड़ पर समाज और पर्यावरण का ह्रास !

मृत्यु भोज इत्यादि पर तो समाज सुधारक ही इतना लिख-बोल गए हैं कि रवीश्वा को विरोध जताने के लिए शब्द नहीं गढ़ने पड़ते । किसी भी मौत के लिए मो. की ज़िम्मेदारी तो फिक्स हो ही सकती है । सवाल तो कम से कम पूछे जा ही सकते हैं । मो जी से तो यह पूछ ही लेता कि आपके भक्त तो आपको सर्वेसर्वा बताकर पेश करते हैं, फिर जाने वाले को आप बचा क्यूँ नहीं पाये । मो साहेब के नाम पर हत्या हुई तो तब रवीश कुछ न पूछता । साहेब को छूट है पूरी !

एक सुझाव लेकिन जो पाणे का बाप भी न दे पाता , वह है वोट रिफ़ंड का । मरने वाला भोग-उपभोग करके मृत्यु योग को प्राप्त हो चुका है । उसके कर्मफल का हिसाब चित्रगुप्त के सामने होगा । अंतिम टैक्स रिटर्न भी पीछे वालों को जमा करना ही होगा । संपत्ति का बंटवारा भली-प्रकार होगा । पर उसके वोट का क्या ? उसने एक सरकार चुनी थी । जीवन लीला समाप्त होने के साथ ही वह जम्हूरियत का वोटर नहीं रहा । अब देश और समाज कैसे चलाये जाते हैं, उसमें उसकी कोई दिलचस्पी नहीं रही । अतः उसका मत केंसल कर दिया जाना चाहिए । पर इसका कोई प्रावधान नहीं है । क्या मृत्युशैय्या पर इस तरह का डिक्लेरेशन लिया जा सकता है ? रवीश अगर वहाँ होता तो यह अवश्य पूछ पाता । एक-एक वोट से ही वोटिंग मशीन भरती है । फासीवाद की नींव को इसी तरह खोखला किया जा सकता है । कोई चुनाव फैसला अंतिम नहीं होता । लोग मरते रहते हैं । वोट घटते रहते हैं । लगातार घटते वोट का ब्योरा दिखा-दिखाकर आप चुनावी दंगल जैसे फूहड़ प्रोग्राम भी करते रह सकते हो । अंत में सारा खेल तो टीआरपी का ही है ।

मरने वाले के हिसाब से टीआरपी पर भी असर पड़ जाता है क्या ? माफ कीजिएगा, इतना दूर की नहीं सोच पाया । रवीश सोच कर बता देगा ।  


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