इतिहास के ताले-तहख़ानों को खुलने दो

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ताले टूटते हैं, तहखाने खुलते हैं, सर्वे होते हैं, विडियोग्राफी होती है, न्यायालयों में साक्ष्य प्रस्तुत किये जाते हैं, वाद- विवाद होता है तभी तो इतिहास करवट लेता है, भगवान जागते हैं और शताब्दियों पूर्व हुए अन्याय का हिसाब- किताब होता है ।

बंद ताला या तहखाना किसी साध का अंत नहीं हो सकता । लगा है तो खुलेगा, खुलने के लिए ही लगा है । चाहे प्रश्न आस्था का हो, अथवा इतिहास का, उत्कंठा किसी न्यायाधीश का निर्णय मानने को बाध्य नहीं है । शोध एक अनवरत प्रक्रिया है – सर्वे, विडियोग्राफी, लेखन और उनपर संवाद-इन्हें अदालती आदेश के द्वारा कैसे रोका जा सकता है? और फिर, अनुसंधान से कैसा डर । सत्य शाश्वत है , उसे तो बाहर आना ही है । न्यायालय भी विवादों के समाधान हेतु ही निर्मित हैं , समय बरबादी का हवाला देकर वहाँ न्यायिक प्रक्रिया को टाला या खारिज नहीं किया जा सकता ।

फिर काल अगर निर्णय ले ही चुका है, तो कानून या तो झुकेगा, या टूटेगा । एक संभावना कानून के कानूनन निरस्त होने अथवा संशोधित होने की भी बनती है । जो भी हो, समय के प्रवाह एवं जनमानस की इच्छा के समक्ष कानून बाधा बनकर सदा के लिए खड़ा नहीं रह सकता ।

भारतीयों ने तो सौहार्द की आशा में अस्त्र-शस्त्र डाल दिये थे और अपने इष्टों को भुला दिया था । चिरनिद्रा में विलीन ये शक्तियाँ अब जागने लगी हैं । पूरी तरह जाग जाएंगी तो मलबे-खंडहर में नहीं रहेंगी, दर्शन देंगी, अपने प्राचीन स्थलों को पुनः अधिकृत करेंगी । जो राम, शिव, देवी अथवा कृष्ण ने अपनी भूमि खाली करवाने का निर्णय ले ही लिया, तो न रेंट कंट्रोल एक्ट लागू होगा, न ही प्लेसेज़ ऑफ वरशिप एक्ट । किरायादार अथवा कब्ज़ाई को उल्टे पैर भागना ही पड़ेगा, और कोई समाधान नहीं दीखता । अमुक वर्ष तक के गैर-कानूनी कब्जे को आप किसी भी कानून के तहत वैध घोषित नहीं कर सकते, यह मान कर चलिये ।   

हिसाब-किताब की भी अपनी महत्ता है । जिनपर उधार चढ़ा है, शताब्दियों से, वह उसे कितनी देर और धरें? भार को उतारने की आकांक्षा रखने वाले को भला कौन रोक सकता है ? हिंसा का युग बीत चुका है । जिनके साथ क्रूरता बरती गयी, वे सदियों पहले पंचतत्व में विलीन हो चुके हैं । अपना लेखा-जोखा वे किसी और संसार में खंगालेंगे । लेकिन उन आस्था केन्द्रों का क्या जिन्हें जबरन हथियाया गया था ? वे इमारतें तो वहीं खड़ी हैं, सारे साक्ष्यों को साथ लिए । कुछेक पृष्ठीय बदलाव कर देने से न स्थापत्य परिवर्तित हुआ है, न ही इतिहास कहीं खो गया है । हठधर्मिता, कानूनी दावपेंच या हिंसा की धमकियों के बूते इन हड़पे हुए देवस्थानों को अब और कब्जे में नहीं रखा जा सकता । समय की पुकार है कि यह हस्तांतरण जितना शीघ्र हो सके, हो जाये । सामाजिक सौहार्द और भाईचारा बनाए रखने हेतु यह अत्यावश्यक है ।

कई दशकों तक वामपंथी इतिहासकर हमें भरमाते रहे । संभव है उन्हें इतिहास बदल डालने का अहंकार भी हुआ हो । प्रत्यक्ष दिख रहे साक्ष्यों और खड़े होकर गवाही दे रहे भग्नावशेषों के बावजूद हम सदियों उदासीन बने रहे । जानते तो थे, परंतु इच्छाशक्ति का अभाव था । धीरे-धीरे इन वामी पिट्ठूओं के कुकृत्यों पर से पर्दा उठ रहा है । आने वाले वर्षों में इन छद्म-इतिहासकारों का कोई नाम लेने वाला नहीं रहेगा ।  

इतिहास इन चंद वामपंथी इतिहासकारों की बपौती नहीं है, किसी न्यायाधीश का समय सच से अधिक मूल्यवान नहीं है और हिंदू आस्था कल्पनिक नहीं है ।  हमारी जो भी मान्यताएँ हैं उनके पीछे इतिहास,  भूगोल, विज्ञान, अर्थशास्त्र कुछ तो अवश्य है । सनातन किसी बाड़े या गुफा में उपजा ज्ञान नहीं है, अनुभव की थाती है, जिसे हमें संजो कर रखना है ।

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2 Comments Add yours

  1. Nitin says:

    बहुत बढ़ियाँ , कसावट से लिखा गया कहीं कुछ भी ढीला नहीं शब्दों का बेहतरीन संयोजन .

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    1. abpunch says:

      धन्यवाद

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