नौकरी के अक्षर – संज्ञा, विशेषण, क्रिया या विस्मयादिबोधक ?

इक्कीस अप्रेल को सिविल सेवा दिवस मनाया जाता है । किसी मित्र ने फेसबुक पर एक कविता साझा की, जिसमे विभिन्न सेवाओं के तीन-चार अक्षरों वाले एक्रोनिम, यानि परिवर्णी शब्दों के अधिकारी के नाम से जुड़ जाने, और उनसे उत्पन्न होने वाले दुष्प्रभावों पर प्रकाश डाला गया था । यह लघु कविता मुझे वस्तुस्थिति के बहुत निकट जान पड़ी । इस कविता की प्रासंगिकता सर्वव्यापी और सार्वकालिक है । चूंकि कवि ने तीन-चार अक्षरों की ही बात की है, तो उसके लपेटे में अफसर और विधायक ही आते हैं, दो अक्षर भी हो जाते तो MP, CM एवं PM भी घेरे में आ जाते । बहरहाल कविता की भावना तो उनपर भी लागू होती ही है –

तीन-चार अक्षर लगे हैं

अब तुम्हारे नाम के आगे,

वो अक्षर तुम नहीं हो ।

तुम्हें उन अक्षरों के

अलावा भी

किसी चीज़ के लिए जाना जाये ।

अक्षरों की कुर्सी पर

बैठो तुम ज़रूर

पर

यह अक्षर तुम्हारे सिर पर न बैठ जाएँ ।

प्रतियोगी परीक्षा में उत्तीर्ण हुए नहीं कि आपके मित्र और परिजन, और आप स्वयं भी अपने नाम के आगे इन अक्षरों को जोड़ने लगते हैं । फोन नंबर ऐसे ही सेव किए जाते हैं , अगर पहले से सेव हों तो एडिट हो जाते हैं । परिचय ऐसे ही दिया जाता है- फालना ढिमकाना आईएएस/आईपीएस/ आईआरएस इत्यादि । ट्रेनिंग के बाद नेमप्लेट ऐसे ही बनेगी । विसिटिंग कार्ड बनने के साथ यह सिलसिला और गति पकड़ता है । यह वास्तविकता है, और इसमे अहंकार वाली कोई बात नहीं है । देखा जाये तो फोन की एड्रेस बुक में नाम के साथ अगर सेवा के इनिशियल्स भी लिखे गए हों , तो ढूँढने में आसानी होती है । मैं इन सब सतही बदलावों को ज्यादा महत्व नहीं दे रहा हूँ , पर बूंद-बूंद अहंकार से ही गुरूर का घड़ा भरता है ।  

लेकिन कुछ वर्ष नौकरी करने के उपरांत अगर ये परिवर्णी शब्द व्यक्तिवाचक संज्ञा बनने लगें तो चिंतित हो जाइए । इनका आपके नाम के साथ चिपक जाना दंभ का द्योतक माना जा सकता है । विशेषण तक तो ठीक है – आपकी नौकरी आपकी सामाजिक चेतना और दिनचर्या को तो एक सीमा तक प्रभावित करेगी ही , इसमे कोई संदेह नहीं होना चाहिए । क्रिया भी चलेगी – कर्म तो करना है । अब अगर अरविद आईआरएस हैं तो टेक्सियाएंगे, और अभिषेक आईपीएस हैं तो पुलिसियाएंगे ! लेकिन ये अक्षर कहीं आपके नाम और पहचान का पर्याय न हो जाएँ, आपके अस्तित्व का आदि और अंत न बन जाएँ, इसका ध्यान रखना चाहिए ।

फिल्म अर्धसत्य में एक शानदार संवाद था – हम कुछ होते हैं । नौकरी कुछ होती है । कुछ बरस के बाद हम हमारी नौकरी हो जाते हैं । यह एक भयावह स्थिति है, और इसका आना अवश्यंभावी है क्यूंकी नदी उसी दिशा में बहती है । ज्वार के विपरीत तैर कर यदि हम स्वयं को सहेज सकें तो एक अलग बात है, वरना गंतव्य पर नाम और सेवानाम जुडने ही हैं । कुछ भी करके इन्हें संज्ञा होने से रोकना है, और विस्मयादिबोधक तो एकदम नहीं बनने देना है ।

कविता इस बात पर बल देती है कि हमें किसी और चीज़ के लिए जाना जाये । नौकरी तो तेरा-तुझको-अर्पण वाला बही है , जीवन में उत्थान के लिए चरित्र, सृजन और सामाजिक कार्य अत्यावश्यक हैं । सेवा के अतिरिक्त भी कहीं समय दिया जाये तो पूंजी संचित हो जाएगी । ऐसा न हो कि एक दिन आप और नौकरी पर्याय होकर रह जाएँ, उसके अलावा रिक्तता का अनुभव होने लगे । सेवानिवृत्ति पर कहना पड़े कि मैंने तो सदैव सिर्फ काम ही किया, अब क्या करूँ ? इन तीन-चार अक्षरों के बाद अगर कोष्ठक में R या सेवानिवृत भी लगाना पड़ गया, तब तो बेचारगी हो जाएगी । ऐसे ब्लैकहोल में गिरने से बचने के लिए सतत प्रयासरत रहना होगा । ऐसा कोई एक दिन नहीं आएगा जिस दिन आप इच्छाशक्ति के बूते अनासक्त हो सकेंगे ।


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