गिरते हुए फूल (कविता)

माना शाख पर सजे हुए तुम अतिशय सुंदर दिखते हो,

कितने गर्व से मदमस्त होकर लेकिन धरा पर गिरते हो,

हँसकर खिलना, शान से गिरना,

गिर जाने पर भी खूब महकना,

ये हमसे तो ना हो पाता है,

कोई जाने लगता है अपना तो,

हमको रोना आता है .

साँसों के रहते तो हम भी जी ही लेते हैं इठलाकर,

पर सांसें उखड़ने लगती हैं तब बहुत ही ज्यादा घबराकर,

कभी छिपकर आँसू, ऊंचा क्रंदन,

कभी हाथ जोड़कर ईशवंदन,

यह हमसे कहाँ हो पाता है,

भले देख पुष्प को गिरते हौले से,

श्रद्धा भाव उमड़ कर आता है .


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