पुंजापति, पुंजनम….पुं पुं के खेल में क्या बजेगी इसकी पुंगी?

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अभी तक तो पुंजापति पूरी तरह से पचा नहीं था , ऊपर से पुंजनम की ओवरडोज़ हो गयी । तभी तो कल बहुत उल्टी की । आदमी को उम्र और स्वास्थ्य देखकर भोजन, और बुद्धि के हिसाब से ज्ञान इकट्ठा करना चाहिए । औंकता इंसान घृणा या उपहास का नहीं, दया का पात्र होता है ।

बुद्धि दिमाग में रहती है । और दिमाग क्या है ?

जैसे पेट एक घड़ा है, वैसे ही दिमाग भी एक घड़ा है ।

घड़ा अगर पूरा भर गया, तो छलकेगा । पेट मे अगर भोजन ज्यादा भर गया तो बाहर निकलेगा – सीधे निकला तो टट्टी, और उल्टे निकला तो उल्टी । दिमाग में अगर ज्ञान बहुत ठुसा गया तो निकलेगा – प्रवचन बन के, या भाषण बनके ।

जैसे नफरत से अगर दिल भर गया, तो नफरत छलकेगी ।

दिल क्या है ?

दिल एक घड़ा है । दिल तो बल्कि मिट्टी का घड़ा है । पेट मांसपेशियों का घड़ा है । दिमाग के घड़े को हम खोपड़ी कहते हैं ।

ये सब शास्त्रों में लिखा है । मैंने पढ़ा है । मुझे लगा मुझे पढ़ना चाहिए । मेरी उत्सुकता का घड़ा भर गया । भर गया तो छलका । इसलिए मैंने कहा नहीं भैया, अब तो पढ़ना पड़ेगा । तो मैंने पढ़ा और पाया कि हर फितरत का अपना एक घड़ा होता है । भरता रहता है, भरता रहता है । जब भर जाता है, तो छलकता है ।

आपको मेरी बातों पर गुस्सा आ रहा होगा । आजकल इस देश में लोगों को गुस्सा बहुत आता है। मैं जानता हूँ आ रहा है । आप मुझे जूतों से मार सकते हैं , मेरी हतया कर सकते हैं । मुझे पता है यह आपका दोष नहीं है, आपकी सब्र का घड़ा भर गया है । आप कहोगे क्या ये पागल हो गया है ? आप समझ सकते हो मुझे पागल, मुझे कोई फरक नहीं पड़ता । मेरी शर्म का घड़ा अभी भरा नहीं है । मैंने भरने ही नहीं दिया । मैं बहुत बुद्धिमान हूँ । उस घड़े में मैंने छेद कर रखा है । मेरे सारे घड़ों में छेद है ।

और बड़े- बड़े छेद हैं । आप मुझमे अंगुली कर सकते हो, चाहे तो मुट्ठी भी कर सकते हो । मर्ज़ी है आपकी ।आखिर शौक है आपका । पर फिर भी मेरे घड़े नहीं भर सकते । भरने ही नहीं दूंगा । मैं अपनी शर्म के घड़े को भरने ही नहीं दूंगा । ये मेरा आपसे वायदा है । और शर्म है क्या? शर्म घड़ा भी है , और उनका एक हथियार भी, जिससे मैं नहीं डरता । जो पावर में बैठे हैं वो मेरी जान ले सकते हैं , ले लें, भले ले लें, पर मैं शर्म नहीं महसूस करूंगा ।

ऐसे ही, महंगाई भी उनका एक हथियार है । पर उसका घड़ा भर चुका है । आप सहन कर रहे हो, लेकिन जानते हो कि भर गया है । आप झेल रहे हो क्यूंकी आप सांप्रदायिकता में उलझे हो । आपके घड़ों में जहर भरा जा रहा है । सांप्रदायिकता का घड़ा अभी पूरा नहीं भरा है । भरेगा, वह भी भरेगा, हर घड़ा भरता है, पर अभी नहीं भरा है । हमें लंबी लड़ाई लड़नी है । इसके लिए हम सभी को, आपको ,मुझे – चाहे जितने पुंजनम लेने पड़ें, हम लेंगे । जैसे विष्णु ने लिए – राम, कृष्ण, बुद्ध । वैसे तो मैं अवतारवाद को नहीं मानता, अवसरवाद को मानता हूँ, इसलिए पुंजनम को भी नहीं मानता, लेकिन फिर भी जनम तो लूँगा । लूँगा, क्यूंकी मेरे चूतियापे का घड़ा अभी भरा नहीं है । छेद में अंगुली डाली हुई है , पर जब उसे नाक में या कान में या पृष्ठ में डालने का मन करता है, निकाल लेता हूँ । घड़ा फिर खाली हो जाता है । बस इसी चक्कर में पुंजनम लेते रहना पड़ेगा, वैसे मेरा बिलीफ तो नहीं है ।


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