तुष्टिकरण, तेरे कितने नाम ?

दस-बारह करोड़ का घपला कोई धरतीफाड़ कांड नहीं होता । इतने में तो कुत्ते के गले का पट्टा या काले कौवे की फेन्सी ड्रेस वाली पोशाक भी नहीं आते । जो तुम्हें लगता हो आते हैं तो खरीद कर पहन लो । क्या गलत  कहा है दिल्ली उच्च न्यायालय ने ? पेट्रोल इतना महंगा हो चुका है कि इतने में गाड़ी की टंकी भी फुल नहीं करा सकते । दस-बारह लिब्रांडु अगर डिनर करने बाहर चले जाएँ, तो इतना तो खर्चा-पानी हो ही जाता है । रसूखदार लोग इतना भर कीप द चेंज कह के टिप में सरका देते हैं । पत्रकारों की मंडी छोड़िए , इतने में तो सोनागाछी या हीरा मंडी में भी ठीक से सौदा नहीं हो पाता । बड़े-बड़े देशों में ऐसे छोटे-मोटे घोटाले आए दिन होते रहते हैं । इस तरह अठन्नी-चवन्नी गिनने बैठेंगे तो बन लिए हम 2022 तक पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था । वैसे भी अल्पसंखयक समुदाय का फ़र्स्ट राइट ओवर रिसोर्सेज माना गया है, तो ज़ाहिर है थोड़ी-बहुत लूट भी स्वीकार्य होनी चाहिए । भले वो कोविड राहत फंड में से हो या फिर ज़कात कलेक्शन में से । और कहाँ ईडी को ईतना व्यस्त कर रखा है । इतने की तो सिलाई भी नहीं होगी जितने का कोट पेंट फाट जाएगा !

फिर विदेश जाना एक मौलिक अधिकार भी है । जाने ही नहीं दिया जाएगा तो बेचारी लौट के कैसे आ सकेगी । अपनी नेकनीयत साबित करने का मौका मिलना भी एक मौलिक अधिकार है । लिब्रांडु ब्रीड के लिए विदेश आते-जाते रहना ज़रूरी है । जैसे अदालतों में ग्रीष्म और शीत ब्रेक की महत्ता है । इससे ब्रांड बनता है, चेंज होता है । आबोहवा बदलती है, अलग दृष्टिकोण पनपता है । कुल मिलकर, सारा खेल एक्सपोजर का है ।

वैसे इस फेक-न्यूज़-आर्टिस्ट को रोकना ही क्यूँ है, इसके पीछे की सोच भी मेरी समझ से तो परे है। इसका तो वन-वे टिकट करा कर सरकार को देना चाहिए । ऐसे फालतू और चिरकुट मानसिकता वाले लोगों की भारतमाता को क्या ही आवश्यकता है ? और यह महिला तो चोट्टी होने के साथ-साथ हलाल सर्टिफाइड भी है । उसकी सोच और समझ, उसके विक्टिम, उसका सच और झूठ, पूरा का पूरा वर्ल्डव्यू – सब कुछ बस इस्लामिक है । जो ऐसा खालिस हलाल-मार्का हो, उसे पासपोर्ट और वीसा की भी क्या आवश्यकता है ? ये बस उसका बड़प्पन है कि सवारियों के साथ ट्रेवल करके अपनी इंसानियत जता रही है । वरना ऐसे पदार्थ को समुद्र मार्ग से निर्यात किया जाता है । काला साबुन याद है, जो अलीबाग में उतरा था ? कभी-कभी ऐसा माल चोरी छिपे आयात भी हो जाता है । जो भी हो, इसे बक्से में बंद कर वेयरहाउस में रखने से भला क्या ही लाभ होगा?

सबसे बड़ी बात तो यह है कि लौट कर नहीं भी आयी तो क्या आपदा आ जाएगी ? बहुत से लोग काम पर निकलते हैं लेकिन लौट कर घर नहीं आ पाते । एक और सही । देश की अर्थव्यवस्था तो नहीं डूब जाएगी ? लंका से तो कोई राणा-राणी फरार नहीं हुए जो उनके इतने बुरे दिन आ गए ! पाकिस्तान की तरह कोई संवैधानिक संकट तो खड़ा नहीं हो जाएगा । नहीं आई तो हाई कोर्ट की मिट्टी पलीद थोड़े ही हो जाएगी । वे लोग भगवान हैं क्या ? आम इंसान के इरादों को साफ और अच्छा मानकर ही अदालत कोई फैसला कर सकती है । हर आरोपित की मासूमियात को मानना पड़ता है जब तक कि आरोप सिद्ध न हो जाएँ ।

और कुछ रोकना ही है तो हिन्दू शोभा यात्राओं को रोकिए । नवरात्रि में एक-दो दिन का अवकाश मांग रहे धार्मिकों को रोकिए । नवरात्रि के नाम पर नो पावरकट्स और रेगुलर पानी सप्लाई मांग रहे भक्तों को रोकिए ।  चूंकि कई राज्यों में पूरे नवरात्रि सप्ताह के लिए कर्मचारियों को दो घंटे का स्पेशल अवकाश दिया गया है, भले वे व्रत –पूजा कर रहे हों या नहीं, इसलिए बाकियों को दो घंटे अतिरिक्त काम करना चाहिए । भाईचारा ऐसे ही बढ़ता है । मेरी छुट्टी पे तुम जाओ, तुम्हारा काम मैं करूँ । तुम त्योहार मनाओ, मैं रिपोर्टें भेजूँ । हिंदुओं का यह तुष्टीकरण रोकिए , वरना हम हिन्दू राष्ट्र कहला जाएंगे ।

हर गली, हर मोहल्ले में हिन्दू जुलूस का प्रवेश आवश्यक भी नहीं है । शरीया कानून के हिसाब से कोई गैर-मजहबी दारुल इस्लाम में प्रवेश नहीं कर सकता, और हिमाकत कर घुस ही जाये तो उस पर आसमान से जलते हुए उल्का पिंड गिराए जाने चाहिएं । किसी भी सड़क पर चल निकलना आपका संवैधानिक अधिकार हो सकता है, पर लोक व्यवहार यही कहता है कि सामाजिक सौहार्द की खातिर इस अधिकार को तिलांजलि दी दी जाये । वरना भयाक्रांत होने या अपना रुतबा दिखाने की तलब में अगर आजू-बाजू रहने वाले डरे हुए बाशिंदों ने पथराव और आगजनी की तो यह हमें उनका मानवाधिकार मानना चाहिए । एक जुमला पेश करता हूँ – अपने जुलूस उनकी गलियों में न जाने पाएँ, और उनकी बरातों की भी हम अपने घरों में मेजबानी करें । दूल्हा उनका तो दुल्हन हमारी हो ,इसे ही हमारा सेक्युलरवाद समझें । पूरे धिम्मी हम फिर भी जज़िया चुकाकर ही होंगे , उसके बिना पूर्ण आनंद प्राप्त नहीं होगा !

आईआईटी बोम्बे की रसायन शाखा में पढ़कर भी अगर वह बम बनाना नहीं सीखा तो जाहिर है उसकी पढ़ाई-लिखाई बेकार है । किसी मदरसे में पढ़कर पीओके निकल लिया होता तो आज बम बनाना , पिन निकालना, असला चलाना सब आता होता । तब गोरखनाथ धाम में भीड़ उसे जंगली सूअर समझकर घेरती की हिमाकत न करती । बहुत से हमदर्द बता रहे हैं कि वह तो ज़हनी तौर पर खिसका हुआ है । वह तो होगा ही, उसमें कोई शक बाकी है क्या ! ओला-उबर पकड़ने के लिए भला कौन चीखता-चिल्लाता है? हो सकता है विक्षिप्त आदमी को तलब लगी हो! चिकन कॉरीडोर पर जाम लगाकर भारत के दो हिस्से करने की महत्वकांक्षा पालने वाला शारजील फिर भी बहुत दानिशमंद है । आखिर कंप्यूटर साइंस में स्नातक जो है । दाद देता हूँ उसकी और उसके केंप की कि कभी दिमागी तौर पर खिसके होने का बहाना नहीं बनाया । सेल्फ-रेस्पेक्ट बहुत बड़ी चीज़ है । जिहादी हो या क्रांतिकारी, उसमें वह कूट-कूट कर भरा होना चाहिए । वरना कन्हैया जैसे सरकते, एडजस्ट करते, पलटते – बयान बदलते जातिवादी गिंडोले तो इस जमाने में मौसमी आमों से ज्यादा आम हैं ।  

दस -बारह दिनों में भ्रष्टाचार समाप्त करके दिखा दिया गया है । अब चौबीस घंटे, तीन सौ पैंसठ दिन भ्रामक प्रचार किया जा सकेगा । जैसे लाउडस्पीकर का आविष्कार हिंदुस्तान में अज़ान देने के लिए हुआ था, वैसे ही अखबारों के फ्रंट पेज राजनैतिक इश्तेहारों की खातिर ही छापे जाते हैं । वरना अखबारों में पहले पन्नों की ज़रूरत ही क्या थी ? गल्फ के रेगिस्तानी अमीरात लाउडस्पीकर नाम के शैतान से अनभिज्ञ हैं । वहाँ याद दिलाने के लिए मोरल पुलिस है । हिंदुस्तान में अभी मजहबी दस्तों का समय नहीं आया है । अभी बस जुलूस रोकने, सरहदें खींचने, सड़कें कब्ज़ाने, बुर्का मेनस्ट्रीम करने और कागज़ नहीं दिखाने तक का काम हुआ है । बीच-बीच में सब याद रखा जाएगा कहकर धमकियाँ पेश की जाती हैं । पर जब हम सब याद रखा हुआ हज़ार-बारह सौ साल का , गिनाने लगते हैं , तो उसे इस्लामोफोबिया करार दे दिया जाता है । हमपर बीते कल में फसे होने के आरोप लगते हैं । पर अब हमें फर्क नहीं पड़ता कोई कुछ भी कहे, हम भी फेहरिस्त बना रहे हैं – उन ज़ुल्मों की जो हम पर किए गए थे और किये जा रहे हैं, उन समस्याओं की जो आने वाली हैं, और उन कन्सेशन्स की जो आप, मैं और धिम्मीगण इन्हें दिये जा रहे हैं ।


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