कॉमेडी नहीं कर पा रहा, तो जा पत्रकार बन (व्यंग्य)

कहता तो स्वयं को कोमेडियन है, लेकिन अंतर्यामी जनता को अब न इसकी ज़बान पर भरोसा रहा है, न ही नीयत पर । पहले यह हास्य के नाम पर फूहड़ फब्तियाँ कसा करता था । फिर कुछ जोक्स निशाना भटक गए । तब से ही लेने के देने पड़ गए । नीच की नीचता सतह पर आ गयी । अब कायनात उसके साथ कॉमेडी कर रही है । मज़ेदार बात यह है कि यह कुदरती हास्य और व्यंग्य न इस छिछोरे को समझ में आ रहा है, न ही उसे रास ही । भौंडा होता तो भली प्रकार आ जाता । नैसर्गिक है, अतः सुंदर है – इस पर आनंद ले पाना इस सड़कछाप हँसोड़े के बूते के बाहर की बात लगती है ।

हास्य की दुकान खोल कर बैठे इस खुर्दरा व्यापारी को समझना चाहिए कि बिकवाली-लिवाली तो बाज़ार पर निर्भर है । दुकान के न चलने का भांडा प्रशासन या प्रधान के सिर पर क्यूँ फोड़ना ? दूसरे के देवी-देवताओं पर टीका-टिप्पणियाँ कर के तुमने ग्राहक तो बिदका दिये, अब फर्जी नेरेटिव परोस कर सिंपेथि कबाड़ रहे हो । वैसे अपने समाज, मजहब, पैगंबर और प्रभु पर इस करामाती ने आज तक कोई ज्ञान नहीं बघारा है । रश्दी और तस्लीमा नसरीन कोई नहीं बनना चाहता । कुछ लोगों को इस जोक-जिहादी में विदूषक दिखता है, मुझे ऐसे दयालुओं में विभीषण नज़र आता है ।  

कुछ लोग इसे आजीविका का प्रश्न बता रहे हैं । पर क्या कॉमेडी ही जीवनयापन का एकमात्र जरिया है ? क्या खेती, मजूरी या भटफोड़ी करके घर नहीं चलाया जा सकता ? कुछ भी चालू बकवास परोस देना तो हास्य नहीं है । माना जो स्वयं को कोमेडियन कह दे कोमेडियन ही होगा । जैसे खुद को प्रैस/पत्रकार कह देने भर से काम चल जाता है । पत्रकार को कोई सुने न सुने, पढ़े न पढ़े, उसकी रोज़ी पर असर नहीं पड़ता । कोमेडियन को तो शो चाहिए, श्रोता चाहिए, रेस्पान्स चाहिए और तालियों की गड़गड़ाहट भी ।

वैसे बारह शो मिले और फिर रद्द हुए हैं पिछले दो महीनों में । छ-छ सौ टिकट भी बिके होंगे , दावा तो कुछ ऐसा ही है । हालांकि पाँच सौ – हज़ार कोई बड़ी संख्या नहीं होती , इतने तो हर शहर में वामी-कामी-लिब्रांडू-वोक-जिहादी ही हो जाते हैं । इसमे धिम्मीगण की संख्या भी जोड़ लें । और कुछ नहीं तो फूफा-फूफी-चाचा-चाची-मामू-मामी वगैरह ही बहुत होंगे । नहीं तो अपने टिकट खुद खरीद ले तो भी क्या ग़म है – नेट्फ़्लिक्स, प्राइम या हॉटस्टार पर शो तो मिल ही जाएगा । आज के युग में नीच, धृष्ट और पतित की लोकप्रियता को दबाया नहीं जा सकता । पर इसका अभिप्राय यह नहीं कि उसे खुल्ला छोड़ दिया जाये मनमरज़ी करने के लिए । फर्जी मत और सोच को ललकारते रहना आवश्यक है । वरना दोहराते-दोहराते झूठ और बकवास ही इतिहास के तौर पर दर्ज़ कर ली जाती है ।

मैंने इस चूज़े का एक विडियो देखा है । उसमें बताया है कि इसे बचपन में ही गोधरा की बर्निंग ट्रेन में कुछ ह्यूमर दीख गया था । कार्टून शो की तरह । मजहाबियों को कार्टून शब्द अपनी वोकेबुलरी से निकाल देना चाहिए, वरना ये स्वयं तो दरिंदगी पर उतर आते हैं, और बाकी लोग whataboutery पर । उस विडियो में मैंने इसे कहते सुना कि ज़िंदा जला दिया, बुरा हुआ, पर मरने के बाद तो जलाते ही हैं । तो ठीक है मियां, तेरा कॉमेडी करियर अब बर्निंग झांट है । इसमें ह्यूमर ढूंढ । आग बुझ जाये तो दफना देना ।  मरने के बाद तो दफना ही देते हैं ना ?

वह बार-बार कहता है ‘मैंने वह चुटकुला कहा ही नहीं’ ।  ये भी क्या खूब रही । कह देता तो वह चुटकुला नहीं रह जाता, और तू खुद को कलाकार नहीं कह पाता । हे निराश कलाकार ! तूने एक दोयम दर्जे का व्यंग्य कसा, जिसके जवाब में ज़िंदगी तुझपर डार्क ह्यूमर उड़ेल रही है । सब इतने भाग्यशाली नहीं होते । हर किसी का नाम किसी ऐसे चुट्कुले के लिए मशहूर नहीं हो जाता जो वह कह न सका हो । तू इस नाम को भुना , जा पत्रकार बन जा । राणा अयुब के पास इंटर्ण्शिप कर । कोमेडियन कहते-कहते स्वयं को मजहबी तो कहने ही लगा है , जल्द ही खुलासा-पत्रकार भी हो जाएगा । संभव है इस्लामोफोबिया पर तेरे लेख न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंग्टन पोस्ट और बीबीसी में पढ़ने को मिलें । एनडीटीवी पर तू अभी से स्टार है । सोच समझकर जोक-जिहाद में उतरा है , तो पूरी शिद्दत से लड़ । वैसे तू ठीक ही जा रहा है- आऊट्रेज़ मेन्यूफेक्चरिंग में दक्षता हासिल कर ही रहा है । सब कुछ करना मेरे कोमेडियन, पर उन्माद में अपनों के कार्टून न बना देना ।

वो ज्यादा हो जाएगा । और हमें तो तेरे जैसे कोमेडियन ही ज़रूरत है, अपनों को जगाने के लिए ।


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