फ़ेमिली मेन भाग 2 पर टीका-टिप्पणी : धृति बेटी तू जिहादीमर्दिनी, तेरी जय हो !

यह सिरीज़ वयस्क दर्शकों के लिए है और इसमे कहानी के समर्थन में अंतरंग दृश्यों सहित कटुवचन, अपशब्द और परिपक्व सामग्री शामिल है । फेमिली मेन की शुरुआत में ये दंभपूर्ण घोषणा मुझे बहुत थोथी जान पड़ी । मेरी इस ब्लॉगपोस्ट के लिए भी इस चेतावनी को लागू मानें।

वैसे छूटते ही यह स्पष्ट कर देता हूँ कि फेमिली मेन सीजन दो में कोई तन-बदन फड़का देने वाला अंतरंग दृश्य नहीं है । एक बच्ची के दो छोटे-छोटे लिप्स पैक हैं, पर वे बहुत ही क्यूट तरीखे से फिल्माए गए हैं । एक-दो सीन में राजी उर्फ समान्था को असहाय जान कर बस में छेड़ रहे एक हरामी के हाथ कुछ ज्यादा ही लिबर्टी लेते हैं, लेकिन तब राजी उसकी जो पूजा करती है, वह देखकर आनंद ही आ जाता है । उसका रंगीनमिजाज बॉस भी उसकी कमजोरी का लाभ उठाकर यौन उत्पीड़न का प्रयास करता है , लेकिन काट दिया जाता है । शुचि अर्थात प्रियमणि तो अपने वर से ऊबी, और प्रेमी से असहज दिखाई गयी है। उसके कहीं अंतरंग होने का सवाल ही नहीं था ।

शो में कटुवचन और अपशब्द की भी कोई खास बहुतायत नहीं है । श्रीकांत और जेके के संवादों में प्रयुक्त होने वाले अपशब्द कटुवचन की नहीं, बल्कि मित्रवत मधुरवाणी की श्रेणी में आएंगे । उनको सुनकर आप उत्तर भारत के दो रेण्ड्म मित्रों के रूटीन संवाद का रसास्वादन कर सकते हैं । वैसे भी आज के अर्बन समाज में शराब, सिगरेट, माँबहन, भोंडस, बैंड जो, माचो, ले लो, दे दो, डाल दो, फाड़ दो , फट गयी, गांड, गंडक, चूत, चूतिया, लवड़े आदि आम प्रचलन में शामिल हैं। एकदम वैसे ही जैसे लोल, फोमो, आरओएफ़एल, एक्सओएक्सओ इत्यादि।  लौंडे-लफाड़ी एक बार को भीड़ और माहौल देखकर भाषा को सेंसर कर भी लें , पर युवतियों को इनसब से कोई सरोकार नहीं । उनका मानना रहा है कि जिह्वा का अनुशासन उन्हें बंदी और कमजोर बनाए रखने के लिए है, अतः जी भर-भरकर दो किलो-किलो गालियां, उड़ाओ धुआँ और मचकाओ पेग पर पेग । ऐसा कर के पेत्रीआर्की की जड़ें खोदी जा सकती है और स्त्रीवाद को मजबूत किया जा सकता है । ये अलग बात है कि इस सिरीज़ में कोई महिला गाली-गलौज करती नहीं दिखती ।  बाजपेई महाराज के रहते ज़रूरत भी नहीं लगी ।

मनोज बाजपेई तो दरअसल गाली-वाली नहीं देते, अपशब्द और कटुवचन की माँ-बहन बाँचते हैं । किसी प्रयोगवादी कवि से कभी लिखा गया था कि खबरदार ! कोई बैंडजो मुझे कुत्ता न कहे, बस वो कह दें तो दो टांगों पर खड़ा हो कर मेमना बन मिमियाता रहूँ ! इस लाइन का सिरीज़ से कोई लेना-देना नहीं है, बस यूं समझ लीजिये कि वह चूतिया प्रयोगवदी कवि मैं ही हूँ । लिखा गया तो मुझसे मिटाने को न हुआ । तीन आदमी- मरहूम इरफान भाई, नवाज़ और उन सबसे ऊपर मनोज सर – ये अगर पर्दे पर पधारें, और किसी-न-किसी की माँ-बहन न तौलें , तो लानत है ऐसी स्क्रिप्ट और डाइरेक्शन पर । टोटल भेस्ट ऑफ टाइम ! हँसना-बोलना-सुंदर दिखना तो कोई भी बोलिवुडिया कर लेगा , चूमाचाटी चाहिए तो हाशमी को लेलो और चोदमपट्टी का ज़माना अब चला गया । तो फिर बचा क्या ? बचा पंकज त्रिपाठी, जो अगर गाली दे तो लगता है पता नहीं क्या अभिप्राय होगा महोदय के अप्रिय शब्दबाण प्रक्षेपित करने की पीछे।

हासिल में रण्बिज्या कमरा बंद कर के मंत्री जो को चप्पलों से बजाता है । फ़ेमिली मेन 2 में मनोज जी बोर्ड रूम में अपने डेढ़फुटिए चिरकुट बॉस की टाई खेंचकर उसे झपड़िया देते हैं । ये (धृति का कमबेक) ही सिरीज़ में शामिल परिपक्व सामग्री हैं । बच्चों को वह डेढ़फुटिया सर्कस के बौने-सा मज़ेदार लगा होगा । लेकिन कोई भी वयस्क उस महाचाट आदमी की ठुकाई पर स्वयं के हाथों में खुजली होती महसूस कर गया होगा । बहुत संभावनाओं वाला सीन था – जब कभी कोरोना के बाद कॉर्पोरेट दफ्तर खुलेंगे, तब बहुत से चंपू बॉस ऐसी जूतम-पैजार के शिकार हो सकते हैं ।

फेमिली मेन 2 को लेकिन अगर दो महीने बाद कभी याद किया जाएगा तो बिटिया धृति के ज़बरदस्त प्रतिशोध के लिए । वोकीकरण के प्रभाव में परिवार से बागी होकर लव जिहाद में फसने और फिर उस गर्त से गज्जब का कमबेक मारने की वजह से धृति एक सही रोल मोडेल है  । वोक्स के पास दरअसल शब्द बड़े तगड़े होते हैं – पेत्रीआर्कियल सोसाइटी, केपिटलिस्ट बबून, एक्सप्लोइटेशन, शौविनिस्टिक पिग, मिसोजिनिस्टिक अप्रोच ! किसी भी तीक्ष्ण युवा के, जो इन सब शब्दों को ठीक से प्रोनाउंस करने का माद्दा रखेगा, वॉक हो जाने की संभावना बनती है , सो धृति भी हो गयी । घर में माँ-बाप के रिश्तों में तनाव और धर्म एवं पूजा-पाठ का पूर्ण अभाव – संतान में वामपंथी गांडुगिरि नहीं घुसती तो क्या आरुणि और ध्रुव के संस्कार प्रविष्ट होते ? खैर नऊ-नऊ फ़ेमिनाजी बनी धृति बिटिया को एक चिकने स्टड से मोह हो जाता है । चिकना वैसे होता सलमान है, लड़की फासने के लिए खुद को कल्याण बताता है । उसे बाईक पर यहाँ-वहाँ घुमाता है और मोहब्बत के पाठ पढ़ाता है ।

ऐसे ही प्रेम वह कुतिया है जो हमेशा काटने को होती है , पर अगर आप एकतरफा या फरेब वाले प्रेम पड़ गए तो ज़िंदगी झंड होना निश्चित है । हालांकि धृति, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है -मन की द्दढ़ता, चित्त की अविचलता, धैर्य, धीरता, धीरज- इतनी भी मूर्ख नहीं है, आखिर वह सयाने कौवे श्रीकांत तिवारी की औलाद है । कल्याण को सलमान बुलाया जाना और उसके घर पर उर्दू में आयतें लिखी होना – ये सब धृति की आँखों के सामने होता है, उसके एंटीना खड़े भी होते हैं, लेकिन बगावत के घोड़े और जवानी का जोश आपको दुस्साहसी बना देते हैं । गड्ढे में कोई भी गिर सकता है, मोहपाश में फस सकता है और जिहाद का शिकार हो सकता है – असली परिपक्वता फसने में नहीं, फसकर बाहर निकलने में है । बचपन, जवानी, अविवाहित, विवाहित, विवाहोत्तर – लव जिहादी के जाल में आप कभी भी अटक सकते हैं , पर डरें नहीं, हौसला रखें । जाल काट देना, या जाल को ही लेकर चल पड़ना हमेशा संभव है । इंद्रियाँ खुली रखकर कमबेक की कोशिश करें । सही समय और हथियार का इंतज़ार करें । धृति से सीख लें । दिमाग ठंडा रखकर वह हथियार उठाती है और सलमान की गार्डन पर इतने कट लगाती है कि लाल मानचित्र बन जाता है । लव जिहादी के फरेब का यही प्रत्युत्तर है – उसे उसकी हूरों के पास भेजने का प्रबंध करो और स्वयं इस रक्तरंजित प्रतिशोध को प्रायश्चित मानकर घर वापसी करो । धर्म क्षमाशील है – बाहें फैला कर आपको अंक में भर लेने को प्रतीक्षारत है ।

धृति , तेरी जय हो ! तू जिहादीमर्दिनी है !  तेरी वीरता एक महान उदाहरण है !

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