बंसल सर : जिस गणित के गुरु ने पढ़ाया हास्य-विनोद

मास्टर गणित के थे ,

पढ़ाई लेकिन ज़िंदगी  ।

गणित , और कोई भी अन्य विषय, कितना विनोदपूर्ण हो सकता है, यह विनोद जी ही नहीं समझाते तो समझाता कौन ? लेखक, पत्रकार या कोमेडियन होते तो भी बम्पर हिट रहते, पर फिर कोटा नगरी का कायाकल्प नहीं हो पाता ।

सत्रह से उन्नीस साल के जवानों में बहुत गर्मी होती है । महत्वकांक्षा के साथ-साथ असफलता का डर और और विपरीत लिंग के प्रति अत्यधिक आकर्षण – ये तीन भाव बहुत प्रगाढ़ता के साथ हिलोरे मार रहे होते हैं । अहम बहुत भारी होता है।  तैयारी कर रहा युवा स्वयं को बहुत गंभीरता से लेता है । आत्मविश्वास से सराबोर, मोर बनने को आतुर और किसी भी तरह के हास-परिहास को लेकर बहुत सचेत होते हैं इस अवस्था के छात्र- छात्राएं ! ऐसे में हमारी मुलाक़ात हुई एक ऐसे लिविंग लेजेंड से जिसने न सिर्फ हमारी और शालीनता की, बल्कि स्वयं की भी धज्जियां उड़ाने में कभी कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी ।

वीके बंसल एक नाम भर नहीं हैं , एक सोच है । इस सोच को त्रिकोणमिती, बीजगणित या आईआईटी जेईई के संकीर्ण दायरे में रखकर नहीं समझा जा सकता । हाँ ठीक है , महान शिक्षक थे – टेबल पर पढ़ने वाले सत्रह छात्रों के कुछ आखिरी बेचों मैं भी था । मसाला खाते हुए कभी कुल्ला करते हुए, उल्टे हाथ में हरे रंग का ढीला सा मच्छरमार पकड़े हुए वह कुछ ऐसे पढ़ाते थे लगता था मानो समय रुक गया है । पर्म्यूटेशन और प्रोबेबिलिटी जैसे टेढ़े विषय पढ़ाते समय उन्होने ऐसा समा बांध दिया था जैसे किसी थ्रिलर फिल्म की पटकथा सुना रहे हों । न उसके पहले, न ही कभी बाद में  इतनी तल्लीनता से चार-पाँच घंटे कुछ पढ़ पाये या देखा ही ।  लेकिन इसके बाद भी बंसल साहब को मैं प्रायः स्मरण करता हूँ, लेकिन उनके लेक्चर्स या डीपीपी/शीट डिसकशन के लिए नहीं, बल्कि उनके गप्पे लड़ाने और उलाहने देने के अंदाज़ के लिए ।

बंसल सर से पिछले बीस वर्षों में न मिल पाना , और उनका इस वर्ष अकस्मात चले जाना, ये दोनों ही तथ्य उनके ‘चूतिया हो क्या’ बोलने के लहजे को फीका नहीं कर सकते । आधे ‘च’ में हल्का सा ‘ह’ और पूरा सा ‘ऊ’ लगता था, त में थोड़ा सा ‘थ’ पड़ता था और ‘या’ लंबा खिंचता था । जब गुस्से में होते थे तो ‘चूतिया’ थूकते थे, जब मज़े में रहते तो ‘चूतिया’ का रसास्वादन करते । गप्पे हाँकते समय ‘चूतिया’ सम्बोधन हुआ करता था , और बाकी समय आम इंसान के पर्याय के तौर पर प्रयुक्त होता था । कभी तो केवल इसलिए चूतिया बोल दिया करते थे, क्यूंकी स्टूडेंट्स संज्ञा शून्य होकर एकटक सुन रहे होते थे, और कभी इसलिए क्यूंकी कक्षा का ध्यान भटका हुआ होता था और माहौल नहीं बन पा रहा होता था । एक महान आर्टिस्ट  की तरह सर को भीड़ और उसमे मौजूद हर एक स्टूडेंट से संवाद करना आता था । बोल देते थे, फिर ठहरते थे, हँसते थे, जायजा लेते थे – बच्चे खुश हुए, प्रभावित हुए – डायलॉग सही पड़ा, विथ परफेक्ट एम्फेसिस ! बीस-बाईस साल से उसी लच्छेदार तरीखे से बोलने की कोशिश कर रहा हूँ – पर हर आदमी में नैसर्गिक हुनर नहीं होता । व्यसन लगा है, उन्होने ही लगाया है , इसलिए बोलते हैं , पर ज़्यादातर बार नवाज़उद्दीन की तरह सूखी आवाज़ में, और कभी-कभार इरफान की तरह आँखें निकालकर अधिकार के साथ । लेकिन हमारे चूतिया में वह तंबाकू का रस कभी नहीं टपका जो सर के श्रीमुख से पिच्च होता था । यहाँ यह भी बता दूँ कि इतने दुलार और अधिकार से इस उपाधि से स्वयं को अलंकृत करते मैंने किसी और को नहीं देखा है । “हम तो पैदाइशी चूतिया हैं जो तुम बेवकूफ़ों के साथ सर मार रहे हैं”, “लालू, हमको तो चूतिया बना लोगे, जेईई वालों को कैसे बनाओगे?”, “और हम चूतिये की तरह ताश खेलते रहे और पैसे लौटते रहे”- उन्हें ऐसे बोलते हुए सुन मैं सन्न और प्रसन्न हो जाया करता था – जहां आप पुजाए जा रहे हैं , वहाँ अपने आप को ऐसे झाड़ देना – ये दार्शनिक विकास का एक अलग ही स्तर है । स्वयं को हद से अधिक गंभीरता से न लेना और शब्दों की कारीगरी – ये दो सिद्धियाँ वही से प्राप्त हुई हैं । बंसल सर इस मायने में असली गुरु हैं, हम चेले थोड़े ढीले हैं ।  

जब जेईई की तैयारी कर रहे थे तो जेहन में बंबई या दिल्ली घूमते थे । बीएचयू में एडमिशन इसी परीक्षा के जरिये होता है, यह बंसल साहब ने ही एक दिन क्लास में बताया था । कहते थे -“मैं हर वर्ष महमूर्ख सम्मेलन सुनने जाया करता था। मेरे पास रंगीन वोकेबलरी भी थी, और प्रेक्टिस भी । बीएचयू के गाली कंपीटीशन में दो बार जीता”। मेरी जेईई रेंक इस तरह की आई कि बीएचयू मिलने के आसार बने । काउन्सलिन्ग में जाने से पहले पापा के साथ सर से मिलना हुआ । पापा ने उनको बताया कि बीएचयू में मेकेनिकल अथवा केमिकल मिल सकता है अथवा दिल्ली या कानपुर में एमएससी । आवेश में मेरे मुंह से निकला – “आईआईटी देकर बीएचयू कौन जाता है, वह भी मेक लेकर ?” । “अरे हम खुद गए थे वहाँ मेकेनिकल पढ़ने ,” सर तपाक से बोले । गाली कंपीटीशन में हिस्सा लेने के फेर में मैं भी चला गया (या शायद नियति ने बाबा के पास पहुंचा दिया, और मेक में ही )।  बनारस पहुँचकर जब भी कहीं खोजा और किसी से पूछा कि भैया, अमुक गाली प्रतियोगिता कब और कहाँ आयोजित होगी, तो हर बार एकही जवाब मिला – चूतिया हो क्या? आज मेरे पास कंपीटीशन में जीते तमगे तो नहीं हैं , न ही मैंने सर से मिलकर कभी गाली प्रतियोगिता के होने, न होने का सत्यापन किया ( वे कुछ गप्प लगा ही देते), पर बातें छौंकने और उलाहने देने में मैं खुद को बंसल साहब का असली वंशज मानता हूँ । बाबा विश्वनाथ की कृपा है, बनारस का नशा भी पक्का चढ़ा है ।

“केंचुकी जी, मेरे खड़े हुए वेक्टर को मत छेड़िए।“ सर बोल रहे थे, केंचुकी जी बोर्ड पर लिख रहीं थीं । एक तीर खिंचा हुआ था, उस वेक्टर को मिटने से बचा रहे थे । एक बार एक छात्रा बोर्ड पर लिखे किसी सवाल का हल टीप रही थी । बोर्ड साफ करने का हुक्म हुआ । “सर प्लीज़ , मैं उतार रही हूँ।“ आँखें चमकाते हुए, दाँत निकालकर साहब केंचुकी जी से बड़ी मासूमियत से बोले- “ठहरिए, ठहरिए, आप आराम से उतारिये।“ एक बार चालीस मीटर ऊपर से गिर रहे पानी का गिरने के बाद तापमान 140 डिग्री सेल्सियस बताने पर मुझे और विप्रा जी को साहब ने बाप का पैसा बर्बाद न करते हुए कहीं बर्तन मांझने की सलाह दी थी । “सर अपने दूध की मिठाई लायी हूँ, आप प्लीज़ खाइये।“ ऐसा मौका थोड़ी जाने देते हैं आईटीबीएचयू मेक के चैम्पियन बकैत ! कुछ ज्यादा बोले भी नहीं, बस एक कौर लेकर हंस दिये । छात्रों को अट्टाहास करने का मौका मिल गया । हास्य-व्यंग्य-कटाक्ष में टाइमिंग और एम्फेसिस ही सब कुछ है । हमने धंधे के सिकंदर से सीखा है । मैं मानता हूँ कि आज की तारीख में यह ल्यूड और घटिया लग सकता है , मुक़द्दमा भी हो सकता है , लेकिन उस समय किसी ने ऐसे कभी सोचा नहीं , शायद छात्राओं ने भी नहीं । वैसे छात्राएँ उस समय क्या सोचती रही होंगी, मुझे उसका कोई अंदाज़ा है भी नहीं ।

अपनी इलेक्ट्रोनिक व्हील चेयर पर स्टीफन हॉकिंग की तरह विराजमान वह महान विभूति ज़बरदस्त आत्मविश्वास और उल्लास के साथ गणित पढ़ाया करती थी । लोनी, हाल एंड नाइट, प्रिलेप्को, शांति नारायण, गोरख प्रसाद , दास- मुखर्जी कितने ही गणितज्ञों की किताबें पढ़ी हैं, पर निर्विवादित तौर पर जब गणित के गुरुवर का ज़िक्र होगा, तो दुनिया भर में फैले हुए उनके पढ़ाये हुए हजारों-हज़ार छात्र-छात्राओं के मन मंदिर में विनोद कुमार बंसल सर की ही छवि उभर कर आएगी । ये होती है इम्पेक्ट्फ़ुल लाइफ, ऐसे होते हैं असली इन्फ़्लुएंसर!


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