रुका-रुका सा, रूखा-रूखा सा (कविता)

शब्द लिखते-लिखते पन्ने भरने को आते हैं,

पर वाक्य बनते-बनते अर्थहीन हो जाते हैं ।

जितने बड़े हों बुल-बुले पानी बन जाते हैं,

ऊंचे-ऊंचे पर्वतों पर बर्फ बन जम जाते हैं।4।  

बात कहते-कहते वह प्रवचन दे जाते हैं,

ज्ञान झरते-झरते यूंही दर्शन लिख जाते हैं।

भीड़ जुटते-जुटते ऐसे ही पंथ बन जाते हैं,

महात्मा धीरे-धीरे भगवान बन पुजाते हैं ।8।

रेंग-रेंगकर सुइयां बुरा हाल बतलाती हैं,

टंगी-टंगी दीवाल पर घड़ी काल बन जाती है।

दौड़-दाड़ कर कल्पना चाहे जहां पहुँच जाती हो,

लौट-लाटकर वापस घुड़साल चली आती है।12।

भले काज करते-करते जीवन निकल जाते हैं ,

जूते घिस-घिस कर भी सज्जन फसे रह जाते हैं।

धक-धक करते काले हृदय ज्यूंही बंद हो जाते हैं,

क्रिया-कर्म से पहले ही स्वर्गवासी कहलाते हैं।16।

सूखा-सूखा खून ब्याहता की मांग बन जाता है,

बुझी-बुझी क्रांति से मिलने प्रवासी लौट कर आता है।

पल-दो पल का बस मिलन फिर साथ बिछुड़ जाता है,

हाँफता-हाँफता मजदूर जब रेलगाड़ी चढ़ जाता है ।20।

रिसता-रिसता इश्क़ रिश्ते को रेगिस्तान बना देता हैं,

आशिक आँसू बहा-बहाकर सैलाब बुला लेता है ।  

उजड़े-उजड़े प्यार का फिर तालाब बन जाता है ,

रुके-रुके पानी में मछ्ली का हिसाब लग जाता है ।24।


#प्रवासी #आस्तित्विकसंकट #रेगिस्तान #काल

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