लील्यो ताही मधुर फल जानु (कविता)

मैंने अग्नि का धधकता गोला निगल लिया है,

उसकी लपटें- पेट में पड़ीं बिन पची शंकाओं को,

गुर्दों से ताकती-झाँकती लाचार बनाती झिझक को,

आंतों को जकड़ कर बैठे अनमने आलस्य को,

जिगरे से पल-पल सवाल करती चिकनी,तेली शर्म को

धू-धू कर जला के भस्म कर देंगी ।6।  

कभी जमने को आया मेरा लहू आज उबल रहा है,

वाष्प बनकर फेफड़ों को कुप्पा कर रहा है,

द्रुत गति से धड़क रहा है मृतप्रायः हृदय भी,

धमनियों में नयी ऊर्जा से दौड़ रहे हैं संकल्प,

बहुत टुचुक-टुचुक सरका ली जीवन की बैलगाड़ी ,

अब स्टीम इंजन बनकर छुक-छुक करता दौडूंगा ।12।

कब से मस्तिष्क में घर करे बैठे थे बदलाव के विचार,

दुरूह स्वप्न जिन्हें वर्षों से देख रहा था पर स्थगित थे,

इस अवरुद्ध जीवन को, बाधित हवन को

वांछित बलिदान की अभिलाषा थी- त्याग और पुरुषार्थ की,

अंततोगत्वा शरीर ही वह एक वाहन है-

जिसे रथ बनाकर रणक्षेत्र में उतारा जा सकता है,

जिसे अस्त्र-शस्त्र बनाकर लड़ा जा सकता है,

जिसे ढाल बनाकर रक्षण भी संभव है,

जिसे आहुति समझकर झौंका जा सकता है,

जिसे प्रसाद समझकर कृतार्थ होकर ग्रहण भी करेंगे,

नष्ट-भ्रष्ट हो गया अगर तो फिर दहन भी करेंगे ।23।


#हनुमान #लील्योताहिमधुरफलजानु

#सूर्य #शरीरहीरथहै

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