खबरों का भटकना , टीवी स्क्रीन का चीखना

खबरों का चरित्र है चलना, और अनवरत चलते ही रहना । कहाँ, कब पहुँचेंगी, किस तक और किस रूप में – हर खबर खुद अपनी किस्मत ले कर आती है । ऐसे में बहुत सी अपनी राह से भटक जाती हैं और कई को बरगला कर भटका दिया जाता है- ये सब पत्रकारिता के खेल का हिस्सा है ।  

 

पर भटकी हुई या भटकाने वाली खबरें चल जाना/चला देना और सुनने वाले को ठोक-पीट कर खबरें चिपका कर उसकी मानसिक स्थिति को ही डावांडोल कर देना बहुत अलग-अलग बातें हैं । दर्शकों को समझदार मानकर बोला गया सच या खेला हुआ स्वांग कला की श्रेणी में आता है । उसे ही थियेटर कहते हैं, कारीगरी या हाथ की सफाई भी कह सकते हैं । पर दर्शकों को  दिमाग से पैदल  और बुरा जायका रखने वाला मानकर परोसी गयी कहानी को सिर्फ दुःस्वप्न माना जा सकता है । उसमे ट्रेजडी ये है की इस बुरे स्वप्न मे जो सुनाई दे रहा है वह है भड़काऊ, लिखा हुआ है फूहड़ और  दिखाई दे रहा है बेहूदा ! जागने पर भी यह सपना टूटता नहीं है , सत्यबोध, शांति और सौहार्द का एहसास कभी होता ही नहीं । टूटती और फटती खबरों की चारों ओर दशहत है । चिल्लाते टीवी एंकर के मुंह से निकला हुआ थूक पब्लिक पर लहू बनकर बरसता है । ये मेरा घर सीरिया का रणक्षेत्र कैसे बन गया ?  

बोलती खबरें अक्सर सच होती हैं, पर किसी की कठपुतली भी बन सकती हैं । चिल्लाती खबरें आपका ध्यानाकर्षित करना चाहती हैं , बिकना चाहती हैं । उन्हें न पल्लू गिराने में परहेज है ,न पैसे लेने में । पर अगर खबरें पर्दा फाड़कर, गाली-गलौच करती जबरन आपके कमरे में प्रविष्ट होना चाहें तो समझ लीजिये मामला पत्रकारिता और व्यापार से बहुत ऊपर जा चुका है । आजकल कुछ खबरनवीज़ फिदायीन बनकर फटने –फोड़ने को तैयार बैठे रहते हैं । चेनल लगाया नहीं की भूम-भड़ाक , सब तहस नहस ! हर कोई अभियोगी , हर तरफ साजिश , दुश्मनों से घिरे हुए टीवी स्टुडियो और आप……मार-धाड़ चिल्ल-पौं करके ही बचना होगा ।

किसी भुलावे में न रहें । ये एंकर-पत्रकार मानसिक रूप से दिवालिया नहीं हुए हैं , बल्कि आपको व्यसनी बनाने  में लगे हैं । एक बार जो दर्शक जंग-ए-मैदान में पहुँच गया , वह वापस कभी पाठशाला या संसद में नहीं बैठ  सकता । लेखन की हत्या पहले ही हो चुकी है ।  जिस तरह पर्दा गरज-बरस रहा है , लगता है वह भी कफन बनकर खबरों पर चढ़ने ही वाला है । ट्विटर से सिर्फ स्लेंडर हो सकता है , फेसबुक का युग अब गया । खबरों का अकाल है, सारे माध्यम डिस्क्रेडिट हो चुके हैं । रविश बनाम अरनब कोई चोईस नहीं मानी जा सकती । एक चीन है , दूसरा अमरीका । एक हर बात पर शंकित , दूसरा हर बात पर पूर्णतया आश्वस्त । एक की हर समय रुलाई फूटने को होती है , दूजा हर समय हवाई हमले की धमकी देता फिरता है  ।  छाती पीटने और ठोकने के बीच में सत्य कहाँ चला गया । एक ज्ञान देने की  जद  में रहता है कि पत्रकार सिर्फ वही बचा है, दूसरे को लगता है कि शूरवीर एक वही है  । जनता की बात कहकर वामपंथी अजेंडा परोसने वाला , और ‘पूछता है भारत’ कहकर अपने पूर्वाग्रही मोरपंख दिखने वाला दोनों ही हमें ‘परम’ बना रहे हैं ।

पूछता है भारत ! किस से पूछता है ? क्या पूछता है ? कौन सा भारत ? क्या ऐसे ज़ोर-ज़ोर से पूछता है मेरा शालीन, सुसंस्कृत भारत ? सुनकर ही लगता है तुम अपना अजेंडा चला रहे हो इन चीप, वलगर हेडलाइन्स के जरिये । गौर कीजिये – “भारत बर्दाश्त नहीं करेगा जो पद्मावती का रोल करे वह नशेड़ी हो !”, “वह नशेड़ी है”, “गेंग्स ऑफ नशापुर”, “माल है क्या?”, “ए भाई, चल गाँजा ला …” इत्यादि । एक तो पद्मावती जायसी का  काल्पनिक किरदार है, कोई महादेवी नहीं । दूसरा पर्दे पर पद्मावती के तौर पर दीपिका ने नशा किया नहीं । तीसरे यह कि नशा करती भी है तो अपनी पर्सनल लाइफ में । और चौथा और सबसे महत्त्वपूर्ण,  नशेड़ी है तो भी व्याभिचारिणी, हत्यारिणी या बाजारू नहीं हो गई । पद्मावती और दीपिका का नशा करना एकदम जुदा बातें हैं । इनको पिरोने का कोई मतलब नहीं ।  शब्दों को कीचड़ में लपेट कर बम की तरह फेंकने से शब्दों की भी गरिमा समाप्त हो गयी है और बम की भी । हर तरफ बस कीचड़ और दुर्गंध फैल गई है ।

रही बात भारत के बर्दाश्त करने की , तो पाकिस्तान की नाफरमनियों और चीन की मक्कारियों तक को थोड़ा लड़कर, थोड़ा अड़कर कबसे झेला ही है । और इन सब बौराए हुए, हो-हल्ला मचा रहे मीडिया चेनलों को और इनकी सस्ती,बाज़ारू हेडलाइन्स को भी । शाहीन बाग को भी झेला और दिल्ली के दंगों को भी । धर्म परिवर्तन को झेल रहे हैं , और भ्रष्टाचार को भी ।  हमारे लिए इतना मत फुदक हे एंकर ! हमारी छाती बहुत चौड़ी और मजबूत है, सब झेल जाएगी ……

कुछ तो प्रयोजन होगा इतना चीखने-चिल्लाने के पीछे? टीआरपी से बढ़कर भी दुनिया में बहुत कुछ है ।  क्या ये कि फटे हुए कान के पर्दे, चकाचौंध हुई आँखें और थकी हुई आत्माएं आजू-बाजू की घटनाओं, जो दैनिक जीवन में प्रासंगिक है, के प्रति उदासीन हो जाती हैं ? सोचना होगा , लेकिन टीवी चेनल बंद करके ही क्यूंकी सिर्फ म्यूट करने से दिमाग नहीं चलेगा ।


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