ये ससुरा पड़ोसी!

वो पाँव धरे बैठा है छाती पर हमारी,

हमसे उलाहनों में भी नाम उसका लिया नहीं जाता,

इतनी अदब तो ब्याहता अपने ससुर की नहीं रखती,

ये कौन सा रिश्ता हम चुप होकर निभा रहे हैं? (4)

उसके रेवड़ियाँ बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया,

हरजाई की बेवफ़ाई का सबको इशारों में बता दिया,

दारोगा अपना डंडा घुमाता कभी तो आयेगा,

इस चढ़े हुए बैरी को हूल देकर भगाएगा ! (8)

इस दौरान बिहार में चुनाव करवा लेंगे,

मित्रों से फौरी सौदे कर आयुधघर भरवा लेंगे,  

तब तक दारोगा की पोस्टिंग भी कनफर्म हो जाएगी,

जो अगर बदली हो गया (बिडेन आ गया) तो भद पिट जाएगी।12।

ये कमीना ससुर तो लगता है घेरा बढ़ा रहा है,

छोटू देवरों को रोज़-रोज़ भड़का रहा है,  

अबकी सर्दियाँ लगता है सबको कड़काके जाएंगी,

तुरता तुरत खरीदीं पोशाकें ज़रूर काम में आएँगी।16।

बिना धारक का नाम लिखे भुगतान नहीं होगा,

बाउंस होने वाले चेकों से समस्या का निदान नहीं होगा,

कभी न कभी आवाम को हिसाब देना ही होगा,

अपनी ज़मीन खाली करानी है तो लड़ना ही होगा ।20।


#thatwhocannotbenamed

#neighbourwithnoname

#nonamesplease

#noname

2 Comments Add yours

  1. Vijay Kant Dubey says:

    Abhinav Babu! Don’t force the poet to write a poem. Poetry flows from the heart of the poet; while collecting words from his fertile word bank to reach directly to the soul of the reader, only when he is in himself.

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    1. abpunch says:

      sir this is a matter of perception…jab andar kuch sulagta hai tabhi panne par chadhta hai

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