अमरवीर हैं , शहीद कहकर मत काम चलाओ

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जिन बीस शूरवीरों ने लद्दाख में अपने प्राणों की आहूति दी है, वे तेलुगू भाषा में अमरवीरुडु कहलाएंगे । हिन्दी और संस्कृत में उनके लिए आदरसूचक हुतात्मा का प्रयोग होगा जिसका अभिप्राय उस व्यक्ति से होता है जिसने किसी अच्छे कार्य में अपने आप को हवन कर दिया हो । वीरगति को प्राप्त हुए सैनिकों को आत्मबलिदानी भी कहा जा सकता है । इन्होने अपनी आहूति राष्ट्रयज्ञ में मानव कल्याण हेतु दी है । बांग्ला में परहित या जनहित में प्राण त्याग देने को आत्मोत्सर्ग कहा जाता है , और प्राण त्यागने वाले को आत्मोत्सर्गकारी । मलयालम में ऐसे महान प्राण त्याग के लिए वीरमृत्यु का प्रयोग होता है । इनमे से किसी भी शब्द का विशेष पंथ या भगवान से लेना देना नहीं है । इसको अधिक से अधिक मानव के अपने धर्म अर्थात कर्तव्य निर्वहन से जोड़ कर देखा जा सकता है ।

 

हमारी भाषाओं में ऐसे अनेकानेक उपयुक्त शब्दों के होते हुए भी हम भारतीय और हिंदीभाषी अपने अमरवीरों को शहीद कह कर क्यूँ काम चला लेते हैं ? इसी तरह अङ्ग्रेज़ी में martyr का प्रयोग भी सर्वथा अनुचित है । शहीद एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ होता है गवाह । शहादत का तात्पर्य गवाही से है । इस्लाम (किसी भी अन्य पंथ की नहीं) की खिदमत में अपनी कुर्बानी देने वाले को इसलिए शहीद कहा जाता है क्यूंकी ऐसा करके वह दीन के प्रति अपने सच्चे ईमान की गवाही देता है । Martyr शब्द भी इसी तरह पंथ(क्रिश्चियानिटी) के खातिर प्राण गंवा देने वाले के लिए ही प्रयोग में आता रहा है । दोनों ही शब्दों का राष्ट्र, मानवता या मानव कल्याण से लेना देना नहीं है । वे आज भी विशुद्ध पंथिक शब्द हैं । अङ्ग्रेज़ी-भाषी देशों में भले ही martyr शब्द का प्रयोग कभी-कभार व्यापक संदर्भ में किया जाता हो , लेकिन अमरीकी और अंग्रेज़ सेनाएँ तक अपने मारे गए सैनिकों के लिए इसके अधिकाधिक इस्तेमाल से बचती हैं । Killed in action , Loss of life और death तक को martyr/martyrdom पर तरजीह दी जाती है ।

 

पर हमारी अधकचरी,मिलावटी हिन्दी (हिंदुस्तानी कहना ज्यादा उचित होगा, हिन्दी तो नेहरू-गांधी ने रहने न दी) पर गांधी द्वारा स्थापित हिंदुस्तानी प्रचार सभा (1942) का बहुत प्रभाव रहा है। इस संस्था ने अनावश्यक तौर पर हिन्दी में उर्दू,फारसी और अरबी शब्दों के प्रयोग की वकालत की , जबकि संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं में बहुत से सटीक पर्याय अस्तित्व में थे और हैं । समस्या मात्र हमारे द्वारा शहीद शब्द के प्रयोग किए जाने में ही नहीं है । इस्लामिक जानकार और अरबी/उर्दू भाषाविद भी राष्ट्र और समाज के लिए प्राण न्योछावर करने वालों के लिए शहीद के प्रयोग से नाखुश रहते है । कश्मीर में मारे जाने वाले उग्रवादी भी कईयों की नज़र में शहीद हैं , ऐसे में उन्हे मारते हुए वीरगति प्राप्त करने वाले भारतीय सैनिकों को भी शहीद कह देना भाषा के आलसीपने और फूहड़पने को दर्शाता है । गुरु गोबिन्द सिंह के चार साहिबज़ादों की शहादत की बात करना बहुत ही अप्रिय लगता है । जो गुरु साहब और बंदा बहादुर के साथ जंग करते ,सिखों पर ज़ुल्म करते मारे गए वो भी शहीद , और जिनको मार दिया, वो भी ? पंजाबी में शहीद के अलावा कोई और शब्द है ही नहीं ? इस उपेक्षा की स्थिति को बदलना होगा ।

 

ऐसा प्रचारित किया जाता है मानो हिन्दी में उचित शब्दों और अभिव्यक्ति के अभाव के चलते ही मध्य एशिया के शब्दों को शामिल करना पड़ा है । संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के अलावा अन्य बोलियों और प्रादेशिक भाषाओं में भी देश के लिए अपना सर्वस्व लूटाने वालों के लिए उपर्युक्त विभिन्न शब्द हैं । इस तरह के दुष्प्रचार ने ही हिन्दी का बेड़ा गर्क किया है ।

 

वीरगति प्राप्त हुए भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि देती है अमर जवान ज्योति । परम वीर , महा वीर और वीर चक्रों से भारत अपने शूरवीरों को अलंकृत करते हैं । ऐसे में भाषायी और भावाई तर्कों के आधार पर हमें उन्हें ‘अमरवीर’ कहना चाहिए , जिन्हे हम त्रुटिपूर्वक शहीद कह कर काम चला लेते हैं ।

भारत के सहसत्रों अमरवीरों को श्रद्धांजलि देते हुए मैं इस अपील को यहीं समाप्त करता हूँ ।

 

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