फिर एक आत्मघात – सवाल,समस्या,कर्म या अकर्म?

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हर मौत का मतलब निकले ये आवश्यक नहीं । हर घटना के पीछे कुछ गहरा कारण हो ये ज़रूरी नहीं । किसी ने आत्मघात कर लिया तो क्यूँ किया? तुम खबर मिलते ही सूइसाइड नोट ढूँढने लगे । खुद को पुलिसवाला,फोरेंसिक एक्सपर्ट,वकील समझकर सुराग तलाशने लगे। कुछ नहीं मिला तो कयास लगाने लगे – अफेयर था क्या? लड़की छोड़ गयी कोई? वो पुरानी मेनेजर जिसने हालिया आत्मघात कर लिया था,कहीं उसके ग़म में तो नहीं? उसने क्यूँ किया था? उधार तो नहीं चढ़ा था?क्या कैरियर उतार पर था? कोई बीमारी तो नहीं थी? ड्रग्स लेता था ? शराबी था?कोई ब्लेकमेल तो नहीं कर रहा था? गे तो नहीं था ?दाऊद का एंगल तो नहीं?हत्या तो नहीं कर दी किसी ने ? दोस्तों का क्या भरोसा? पिता साथ क्यूँ नहीं रहते थे? जैसे जीवितों को बाँट दिया जाति-धर्म में ,जैसे सरकारी फाइलों पर नाम-नंबर लिख दिया ,वैसे ही मृतकों का भी वर्गीकरण किए बिना चैन नहीं है ।

 

पूरे दिन मीडिया पुलिस के हवाले से यही कहता रहा कि ‘प्रथम द्रष्ट्या’ सूइसाइड लगता है, वैसे असलियत क्या है पोस्ट्मॉर्टेम के बाद ही पता चल सकेगा। माने कि…..क्या पता कुछ मसाला निकल ही जाये। टीआरपी का खेल तो इतर है, एंकर-पत्रकारों को स्वयं भी इस मौत को वर्गीकृत करने की जल्दी और ज़रूरत थी । (जैसे हर मौत पर होती है –यह नरसंघार है, वह नहीं; यह राजनैतिक हत्या है, वह नहीं; इसे कोरोना मौत माना जाएगा, उसे किडनी फेलयोर श्रेणी में रखो !)

 

सुशांत युवा था,मेधावी था,सफल था । चौतीस की अवस्था में साठ करोड़ का बेंक बेलेन्स । बॉलीवुड जैसी भाई-भतीजा-बेटा-बेटी-अंकल-पड़ोसी वाली व्यवस्था में एक स्वयंनिर्मित सुपरस्टार जिसने कई हिट फिल्में दी थीं । बचपन से पढ़ाई में तेज़, शौक भी खगोलशास्त्र से जुड़े । पढ़ा-लिखा,शिवभक्त, वेद-शास्त्रों की महत्ता समझने वाला,साहित्य-कला-इतिहास में दखल रखने वाला एक मानवतावादी – ए थिंकिंग एक्टर।

“सब कुछ तो था उसके पास-संभावनाएं, प्रतिभा,अवसर,मुकाम, स्टारडम के कई साल । फिर क्यूँ?फिर क्यूँ?फिर क्यूँ?आखिर क्यूँ?” उसके जाने से दुखी कम, हतप्रभ अधिक । अपनी समझ को अल्प मानकर चुप भी नहीं बैठ  सकते- जो बोलता ही न जाये, वह कैसा भारतीय पत्रकार । पर जवाब दे सकने वाला जा चुका है । संभव है वह कुछ बता भी न पाता । ये बस हो जाता है । कोई भी नाव कभी भी पलट जाती है । आपकी भी ,मेरी भी । आत्मघात करने वालों के सिर पर न पैदायशी सींग होते हैं , न ही अंतिम समय में उग आते हैं। साधारण आदमी है- कुछ फ्लिप हुआ या क्लिक, बस चल दिया । वरना उपचार और संघर्ष चल ही रहा था । भले जीवन जीने और उसका विस्तार करने के लिए मिला हो, भले स्वयं का संरक्षण हमारी ज़िम्मेदारी हो और हमे इस बात का इल्म भी हो , लेकिन नियम-क़ानूनों की अवहेलना करने की लालसा भी एक स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया है । हर दर्शन-धर्म में निषेध है , पर कारण-अकारण लोग अत्महत्या करते ही हैं । कारण पता लग जाये तो समाज को समझ और धीरज प्राप्त हो जाता है । न मिलने की स्थिति में स्वयंघात करने वाले को पलायनवादी, अशक्त या फिर भटका हुआ कह कर अपवाद करार कर देने का चलन रहा है ।

 

आजकल मेंटल हेल्थ पर व्याख्यान देने का शगल है । डिप्रेस्स्ड था, अवसाद से ग्रसित,हेल्प ले रहा था, दवाइयाँ खा रहा था-सारे लक्षण विद्यमान थे- पार्टियों में जाना बंद कर देना , कम या ज्यादा खाना, सोते रहना, उठने की इच्छा न करना ,लापरवाह हो जाना । जानकार बता रहे हैं कि फिल्म इंडस्ट्री में एक ग्रूप उसको नुकसान पहुंचा रहा था । सबको जो अब दिख रहा है, पिछले हफ्ते भी दिखता होगा। पर किसी ने सोचा ही नहीं की ऐसा ज़िंदादिल, इतना सफल युवक पंखे से लटक जाएगा ।

“वह तो ऐसा कर ही नहीं सकता!”

“ऐसा हो ही नहीं सकता!” लो कर लिया ।

गिंडोले इतना मशगूल हैं मिट्टी से निकलने,सांस लेने और वापस अंदर प्रविष्ट होने में कि शाश्वत सत्य से भी मुंह फेर लेते हैं । आपका कोई चहेता अगर गुहार लगा रहा है तो कृपया उसकी सुन लें । उसकी गतिविधियां अगर थोड़ी शंकामय हैं तो चौकन्ने रहें । अगर आपकी ही मनोदशा आत्मा को इस फेर से मुक्ति देना चाह रही हो , तो आगे बढ़ कर अपने सुहृदयों से बात करें । एक मौका और दें अपने इकोसिस्टम को। अपने घेरे को थोड़ा और विस्तृत कर के देखें । चाहे नए व्यसन ही पाल लें कुछ । पर जब वह अंतिम यात्रा पर निकल ही गया तब न जताएँ कि आप कितने मजबूत घड़े हैं और वह कितनी चिकनी मिट्टी का था ।

 

कल बहुत से ट्वीट पढ़े ।  “अरे हमसे ही बात कर लेता ”, “एक फोन ही दूर थे, भाई”, “खुलना चाहिए था”- अलविदा कहकर तक नहीं गया वो ! वह तुमसे कम संवेदनशील या समझदार नहीं था । पिता, बहनें, जीजा, मित्र, नौकर,डॉक्टर,गाडियाँ,बंगले,पैसा,दिमाग  – सब उसके पास भी थे । उसके सामने उसके जीवन-मरण का प्रश्न था । तुम्हारे सामने उसकी मृत्यु एक पहेली बन कर खड़ी है जिसका हल तुम्हें चाहिए । जो तुमसे नहीं बन पा रहा है तो तुमने उसे दिमागी तौर पर अस्वस्थ बता कर सोल्व कर दिया ।उस पर लगा ठप्पा, तुम हो गए अगली मौत के लिए तैयार ।  निरे मूर्खों और भीरुओं ! पहेली के अबूझ रह जाने का इतना भय?

 

ऐसे दूषित माहौल में अल्बर्ट कामू का वह महान कथन जेहन में आता है – “सम्पूर्ण दर्शन में एक ही शोचनीय समस्या है, वह है आत्महत्या की । आप आगे जीना चाहते हैं या नहीं , यही यक्ष प्रश्न है।” वैसे तो रोज़मर्रा के भौतिक जीवन में आम आदमी के समक्ष ऐसे सवाल विरले ही खड़े होते है , लेकिन सवालों की भी अपनी नियति है । अगर खड़े हुए तो जवाब लेकर ही दम लेंगे । कभी किसी को ये उत्तर मिल जाते हैं ,कभी नहीं । कुछ प्रार्थी इसी तलाश में अनंत में छलांग लगा देते हैं । ऐसे साधक, ऐसे योगी आपके किसी वर्ग में फिट नहीं बैठेंगे । भौतिक संसार,समाज,समृद्धि को लात मार देने वाला आपके लिए भी प्रश्न खड़ा कर चला गया , इसलिए आप उसके इस निर्णय को कलुषित करने का प्रयास अवश्य करेंगे और करते रहे हैं । आपकी यही असलियत है,यही औकात । अंत से इतना भय?लाश क्यूँ दिखा रहे हैं ?यही खबर क्यूँ चला रहे हैं? सच क्यूँ नहीं बता रहे हैं?

 

संभव है सुशांत भी इस अस्तित्व के संकट के समाधान की खोज में ही चला गया हो । तारों-सितारों से अक्सर बातें किया करता था । एक चमकदार सितारा तो वह स्वयं ही था । पर उसकी आकाशगंगा थोड़ी अलग थी । सुशांत अब यथा नाम हो गया है, प्रार्थना है चिरकाल के लिए ऐसा हुआ हो ।

ॐ शांति !

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#albertcamus #suicide #bollywood

 

 

2 Comments Add yours

  1. Swarnima Tiwari says:

    Om shanti🙏🙏

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    1. Sahu says:

      sir, pura padha (yeh bhi sab nhi karte aajkal log), bahut hi sahi baatein likhi aapne, logo ko yeh samjh nhi aata ki koi depression mein hai toh woh aapko ph nhi karega , aap agar uske dost ho toh aapki zimmedari hai ki usko ph karo, milo , baat karo….aadmi chala gaya ab gyan pelne se kya faayda…

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