फिल्म शूल में मनोज वाजपेयी – काहे का समर,कौन से प्रताप, किधर का सिंह?

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(सिनेमा नहीं देखे हैं तो नहीं बुझाएगा । फिर सवाल यह उठता है कि नहीं देखे हैं तो क्यूँ नहीं? सिनेमा देखते ही नहीं हैं , या फिर कुछ कुछ होता है और नोटिंग हिल से ज्यादा वास्तविकता झिलती नहीं!)

इतना धारदार किरदार नहीं देखा । मानो ज़िंदगी के पत्थरों पर घिस-घिस कर पैना हुआ हो।

ऐसा मग़रूर फौजदार नहीं देखा । वर्दी की ऐसी अकड़ कि सागौन भी शरमा जाये।

सच के समुद्र में इतना ऊंचा ज्वार नहीं देखा। चूंकि अमावस की रात थी अमंगल होना ही था ।

ईमानदारी का ऐसा अहंकार नहीं देखा । इतना ताप कि लोहा पिघला दे । मजाल है कोई एसआई समर प्रताप सिंह से एक क्षण को एक इंच भी झुकने, दबने या पीछे हटने के लिए कह दे ।

 

पर भेजे में भुस भरा था समर प्रताप के । अन्यथा सात-आठ साल कि नौकरी में इतना समझ जाता कि अन्याय के विरोध में स्वर बुलंद करना और कार्यवाही करना महत्वपूर्ण अवश्य है, पर यह विरोध त्वरित ही हो, ऐसा नितांत आवश्यक नहीं है । मनुष्य और पशु में यह एक बड़ा फर्क है – हम अपनी प्रतिक्रिया का वेग,स्थान और समय निर्धारित कर सकते हैं, रणनीति बना सकते हैं । पशु इस मामले में लाचार है। क्षुधा शांत करने के लिए तो घात लगाकर शिकार कर सकता है पर बदले की जो कार्यवाही उसे करनी है वह तभी करनी है जब मामला गरम हो । बाद में संभव है वह भूल ही जाये, उतना गुस्सा न आए या फिर मौका न लगे !

समर प्रताप सच्चा है ,कानून की लकीर नापता है, ईमानदार है और बेहद झुझारू है । पर उसके जीवन को निर्देशित करता है उसका गुस्सा । प्रेशर कूकर से रिस रही वाष्प की तरह गुस्से का इज़हार भतेरे करते हैं, समर ज्वालामुखी की तरह फटता था और उसमे से लावे का प्रवाह होता था । जो कुछ सामने आया, सब स्वाहा। कई मायनों में गॉडफादर के ज्येष्ठ पुत्र सनी कोरलियोन जैसा।

यहाँ सवाल उठता है कि समर के इस विस्फोटक क्रोध के पीछे क्या उसके ईमान था अहंकार था ?

ईमानदारी आखिर क्या है उसका स्वरूप क्या होता है ?

क्या महज सामाजिक व्यवहार है ?

या अहम का पोषाहार है ?

बस नीति है ,या धर्म का आधार है ? हमारे दर्शन में ईमानदारी को और वृहद तौर पर धर्म से जोड़कर देखा जाता है । समर का धर्म एक पुलिस इंस्पेक्टर के तौर पर क्या था , एक पिता,पति और आम आदमी के नाते क्या था ? धर्म की व्याख्या और उसका निर्धारण इतना सुगम नहीं है पर इतना कहा जा सकता है कि ईमान अविभाज्य, अमिश्रित, नित्य और सनातन है । क्या इसे स्विच ऑन , स्विच ऑफ किया जा सकता है ? क्या ईमान पर हुई चोट का उपचार , या होने की संभावना का निराकरण तुरंत ही हो सकता है ? क्या समर अपने गुस्से को नियंत्रित या स्थगित नहीं कर सकता था? क्या सच,ईमान और गुस्से को सस्पेंडेड एनेमेशन में रखा जा सकता है , या फिर बर्फ की सिल्ली पर ?

कचौड़ी-मिठाई की दुकान में चार-पाँच गुंडे जमा थे जो पहले से ही समर के खिलाफ भरे बैठे थे और वह यह बात भली प्रकार जानता था । वह जब अपनी बिटिया सोनू सिंह के साथ वहाँ पहुंचा तो बच्चू यादव के इन टट्टुओं- लल्लन सिंह, लालजी, सुधीर बिनोद,गोपालजी आदि- ने उसे उकसाने के उद्देश्य से उसकी बेटी और मेहरारू के बारे में माल-मावा-मलाई सरीखी भद्दी टिप्पणियाँ चालू कर दीं। समर को पता था ये कौन हैं,किस दर्जे के लोग हैं, क्या चाहते हैं और किस हद तक गिर सकते हैं । उसके साथ सोनू सिंह थी ,उसकी छोटी सी बच्ची,उसका संसार! पर उसने क्या किया? निम्नतर श्रेणी के बेमतलब तानों-फब्तियों से उत्तेजित होकर बच्ची को गोद से उतारा और वहीं गुत्थमगुत्था हो गया उन गुंडों से। शूकरशाला में लोटिएगा तो कीचड़ में सन जायिएगा, मुरदाघर में जाईयेगा तो लाशें ही पाइएगा।

सोनू सिंह की मौत के लिए जिम्मेदार न बच्चू था न उसके चेले-चपाटे। अंधाधुंध मुक्के,लातें,लाठीयां जब बच्ची का बाप ही भाँज रहा था, तो किसी और को क्या दोष दें ? समर का गुस्सा सोनू को लील गया । सोनू को बहुत नापसंद था, और उसके लिए अबूझ भी था  ‘मेरे पापा का गुस्सा ‘।

कुछ खोने को केवल आपके पास था । पढे-लिखे आप थे । सामने पाँच मुस्टंडे, आप अकेले भी नहीं बल्कि हाथों में है आपका हृदय । पिच देखते, मौसम भाँपते । या तो गेंदबाजों के थकने का इंतज़ार करते , या फिर कमजोर गेंदबाज के सामने आने का । इस सत्र में चाहे रन न बनाते,नाबाद रहने पर ध्यान देते ।  फिर कह कर लेते सालों की , जैसा बाद में शाहिद खान का स्वांग भरके वासेपुर में किया भी । पर आप उस दिन स्लेजिंग से इतना बौरा गए कि लगे हर गेंद पर बल्ला घुमाने ।भाईसाहेब हर कोई सेहवाग नहीं होता । समर प्रताप भले अविजित रह गए ,पर सोनू सिंह रन आउट हो गयी । परिवार हार गया । ऐसे आदमी को बार्डर पर भेजिये । लगता नहीं पुलिस प्रशासन के अधिक काम का था ।

या हो सकता है ऐसा ही आदमी अब काम का रह गया हो ?

क्या समर अपने गुस्से का ग़ुलाम था ? क्या उसे वर्दी की शक्ति पर कुछ ज्यादा ही भरोसा था? क्या उसका अडिग,अटूट आत्मविश्वास और गैर-लचीला रवैया उसके परिवार को भारी पड़ गया? क्या समर एक पैगंबर बनकर आया था मोतिहारी को बच्चूयादव से निजात दिलाने के लिए?

समर जैसा पवित्र,सच्चा इंस्पेक्टर समस्या तो नहीं हो सकता, फिर उसका समाधान ही होगा । उस समस्या का जिसने शासन तंत्र को धनपशुओं और भुजबलों की रखैल बना छोड़ा है । समाधान के साथ समर का एक अन्य नाम क्रांतिसंभव भी हो सकता था । क्लाइमेक्स में बच्चू रूपी राक्षस को उसने विधान सभा के अंदर हौंका-हौंका कर ,दौड़ा-दौड़ा कर स्पीकर की कुर्सी तक खदेड़ा और अंततः उसके रूधिर से संविधान के पन्नों को रंग दिया । अनुराग कश्यप ने इस अतिशयोक्तिपूर्ण उत्कर्ष के माध्यम से आमजन में तेज़ी से समाप्त हो रही उम्मीदों को एक मौका दिया है- जब सब हदें पार हो जाएंगी , तब भी व्यक्तिगत त्याग से क्रांति लाने आ मार्ग तो खुला ही रहेगा । कहाँ हो तारण हार ?

इस टीम को- वाजपेयी, कश्यप, राम गोपाल वर्मा (निर्माता) और ईश्वर निवास (निर्देशक)- सादर नमन करता हूँ । बचपन मे जब फिल्म देखी थी तब दोनों ही सीन –सोनू सिंह की मौत और बच्चू का वध- मुझे कुछ अधिक नाटकीय लगे थे । पर अब मैं उन दोनों ही सीन को यथावत रखना चाहूँगा । कारण यह कि समर का कड़ापा और ईमानदारी , बच्चू का अनाचार और सिस्टम का सम्पूर्ण वेश्याकरण दिखाना ज़रूरी था । शूल आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी 1999 में थी । समर जितना कर्रा कोई और अन्य पुलिसवाला फिर सुनहले पर्दे पर प्रकटा भी नहीं – एसपी अमित कुमार ऑफ गंगाजल ओहदे में सीनियर(आईपीएस) था ,और इसलिए रण कौशल और वाक्चातुर्य में निपुण भी ! उसने अपनी समझबूझ से एक अन्य यादव डॉन (साधू यादव) और उसके साम्राज्य को तहस-नहस किया । पर वह एक अन्य कहानी है , जो किसी और दिन कहेंगे ।

 

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