‘पाकिस्तान भेज दूंगा’ के असली मायने

 

 

‘पाकिस्तान होकर आता हूँ’ हिंदुस्तान में एक बहुत ही साधारण और हर किसी के द्वारा समझा जा सकने वाला वाक्यांश है । इसे सुनकर कोई गलती से भी ये नहीं समझेगा कि आप कराची या लाहौर जा कर मेरठ लौट आने की बात फरमा रहे हैं । जाहिर है कि आपका गंतव्य पाखाना है और उद्देश्य है विष्ठा की निकासी । फिर सवाल यह उठता है कि जब अपनी मर्ज़ी से किसी को पाकिस्तान जाने में समस्या नहीं है , बल्कि जाना एक ज़रूरत है,  तो फिर जबरन भेज दिये जाने की गीदड़ भभकी पर इतना होहल्ला क्यूँ मच जाता है ? क्या इसलिए कि हम लोग आज भी शौचालयों को सड़ा हुआ ,बदबूदार और अपवित्र स्थान मानते हैं ?

 

दंगा क्षेत्र का मुआयना कर रहे मेरठ के एसपी और अन्य पुलिसवालों को देखकर कुछ मनचले / असामाजिक तत्त्वों ने ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ के नारे लगाए बताए । एसपी साहब ने तैश में आकर उनको जमकर फटकार लगाई (पिटाई नहीं ) और पाकिस्तान भेजने की धमकी भी दे डाली । अब इसी पर बवाल मचा हुआ है , जो समझ से परे है । जो लोग पाकिस्तान के जयकारे लगा रहे हैं , ज़िंदाबाद कर रहे हैं , उन्हें पाकिस्तान भेज देना तो जैसे मुंह मांगी मुराद पूरी कर  देने के बराबर है । इतना पसंद है पाकिस्तान तो वहाँ जाने में क्या हर्ज है । टिकट मिलेगा ,भत्ता मिलेगा , एसपी साहब आपको भतीजे मान कर भेज रहे हैं, फिर क्या दिक्कत है ?   पसंद न आए तो वापस भी आ सकते हैं । एसपी साहब ने कहाँ कहा कि हमेशा के लिए पाकिस्तान भेज देंगे  । अरे चले आना वापस , अगर दिल न लगे साजना ….या वहाँ के वाशिंदे तुम्हें मोहाजिर कह कर पुकारें और खराब बर्ताव करें ।

 

सवाल यह भी उठता है कि एसपी ने हुड़दंगियों को  पाकिस्तान  भेजने की ही बात क्यूँ की ? सऊदी भेज सकते थे हज पर , थाईलेंड जन्नत की सैर पर , या फिर कालापानी, जहां नेहरू-गांधी को कभी नहीं रखा गया पर तिलक-सावरकर को भेजा गया था । एसपी के अनुसार उपद्रवी ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ के ही नारे लगा रहे थे , तो मुमकिन है दबाव के वक्त साहब को भी पाकिस्तान ही सूझा हो  ! नारे अगर ‘नेपाल ज़िंदाबाद’ के लगते , तो नेपाल भेज देते । फिर मुद्दा यह भी है कि नारे पाकिस्तान की ही शान में क्यूँ लगे ? क्या पाकिस्तान मेरठ के इन लौंडों का मुल्क है , या ननिहाल ? जन्मभूमि है, कर्मभूमि या फिर पुण्यभूमि है  ? या बस हँस के लिया हुआ ‘प्रोमिस्ड लेंड’ ?

 

वैसे हम दोनों ही देशों के लोगों की सोच हिंदुस्तान-पाकिस्तान में द्विभाजित है, और हम पूरी तरह से एक दूसरे के जुनून में पागल हैं ।  एसपी सिटी का अभिप्राय रहा होगा कि मैं तुम हुल्लड़बाजों को अपने इलाके में नहीं रहने दूँगा । अब ज़ाहिर है एक भारतीय पुलिस सेवा का अधिकारी सिर्फ मेरठ को तो अपना इलाका समझेगा नहीं ! उसके लिए पूरा भारत ही उसके अधिकार-क्षेत्र , या कहें अकड़-क्षत्र में आता होगा । तो फिर जब किसी को भारत से निकाल कर फेंकेंगे, तो उसे पाकिस्तान ही भेजना पड़ेगा ।

 

दरअसल पूरी घटना में हर लेवेल पर मसखरी और कटाक्ष का भी मिश्रण है । सड़कों-गलियों की खाक छानने वाले यह बखूबी समझते हैं । एसी कमरों में बैठकर टीका-टिप्पणी करने वालों के लिए थोड़ा मुश्किल है । हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हमेशा ही मीठी तकरार चलती रही  है । पुलिस इस नोंकझोंक के रिश्ते में एक थोड़ा सा पक्षपाती रेफरी है । मुसलमान पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाकर अपनी शक्ति का एहसास ज़रूर दिलाते हैं , जिसके दम पर उन्होने हँस के पाकिस्तान ले लिया था, पर साथ ही अपनी आज की कमजोर स्थिति को भाँपते हुए वैकल्पिक व्यवस्था का एलान भी कर देते हैं ।  ऐतिहासिक भूल और हार को याद दिलाये जाने पर  हिन्दू चिढ़ ज़रूर जाते हैं , पर मुस्लिम बंधुओं से वहीं जाने या भेज देने को कहकर वह आज के हिंदुस्तान पर अपना एकाअधिकार जताने की कवायद करते हैं । इस सुझाव से नाराज़ हो कर मुसलमान कहीं न कहीं ये भी कबूल कर लेते हैं कि पाकिस्तान , उनका प्रोमिस्ड लेंड, एक थका-हुआ सौदा साबित हुआ है । वहाँ जाने को कहना एक तरह की बेइज्जती के तौर पर लिया जाता है । इस पूरे वाद-संवाद में गंभीर कोई नहीं है , यह एक ऐसी बकचोदी है जो घर-घर में होती है । हमारे लोक-संवाद में पाकिस्तान पर्याय बन चुका है ससुराल, जेल, पाखाना और मुंह मांगी मुराद का ….इसे इतना बढ़ा-चढ़ा कर लेने की ज़रूरत नहीं है ।

 

 

 

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