कौन डरा हुआ है ? वह क्यूँ डरा हुआ है ?

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कौन डरा हुआ है ? कोई भी क्यूँ डरा हुआ है ? डराने वाली कोई घटना घटी है क्या ?

क्या आजकल आधी रात को खुफिया पुलिस विरोधियों के दरवाजों पर दस्तक देकर उन्हे उठा ले जाती है ? क्या देश में आपातकाल लगा हुआ है ?

 

क्या देश में विपक्ष के लिए कोई जगह नहीं बची है ? उद्धव ठाकरे ने क्या सरेआम देश की रुलिङ्ग पार्टी को पीठ में छूरा नहीं घोंप दिया ? फिर क्या ठाकरे पर क्या पहाड़ टूट पड़ा ? शरद पवार ने महाराष्ट्र में बीजेपी के साथ सरकार बनाने से क्या खुलकर मना नहीं कर दिया ? पवार के खिलाफ चल रही प्रवर्तन निर्देशालय की जांच के बावजूद भी ? पंजाब , राजस्थान, एमपी , छतीसगढ़ में क्या काँग्रेस की सरकारें किसी तरह की परेशानी में हैं ? क्या कोई उन्हे काम करने से रोक रहा है ? या फण्ड्स के लिए तड़पा रहा है ?

 

अजी छोड़िए, डरते होंगे कुछ लाला-उद्योगपति खुलकर बोलने से ,वरना किसी को कुछ फर्क नहीं पड़ता जांच अजेंसियों से । हाँ इस देश में अधिक पैसेवाले कुछ ज्यादा ही स्वार्थी और भ्रष्ट हैं, तो ज़ाहिर है किसी भी सरकार के खिलाफ , किसी भी युग में वे बोलने से कतराते आए हैं । लेकिन अगर विचार हैं तो रखो , विचार हैं ही नहीं तो उन्हे न रख पाने का प्रचार करके क्या साबित करने की कवायद है ?

 

क्या दलाल पत्रकार डरे हुए हैं  ? रविश को क्या कोई रोक रहा है या रोक सकता है  ? या फिर पुण्य प्रसून , प्रणय रॉय , निधि ,राजदीप ,अजीत अंजुम और अभिसार को किसी ने धमकाया है ? जब हर कोई सोशल मीडिया और न्यूज़ पोर्टल्स पर अपनी दुकान चला ही रहा है , तो डरकर चुप कौन हुआ है ? एनडीटीवी , प्रिंट, क्विंट , कारवां – सब धड़ल्ले से न सिर्फ हक़ीक़त , बल्कि अपना अजेंडा भी अनवरत परोस रहे हैं ।

 

राजीव धवन ने खुलकर बोल दिया कि दंगा सिर्फ हिन्दू भड़काते हैं । विशाल दड्लानी ने रंजन गोगोई को सरेआम अपशब्द कह डाले । अधीर रंजन चौधरी ने पीएम को घुसपैठिया कह दिया । किसकी ज़बान पर लगाम लगी है ? न ओवेसी चुप है , न सुब्रमण्यम स्वामी । न संजय राऊत चुप है , न जिग्नेश मेवानी ।  शहला रशीद ट्वीट करते नहीं थकती , हार्दिक पटेल पटेलों के लिए आरक्षण मांगने से संकोच नहीं करता । कन्नन गोपीनाथन सरकार के विरुद्ध टिवीटर युद्ध छेड़े हुए है । इनमे से हर कोई चिल्ला-चिल्ला कर ,छाती ठोक कर कहता है कि सरकार उसे डरा नहीं सकती, दबा नहीं सकती । फिर चुप कौन है ? किसको दबाया जा रहा है ? और वह दब क्यूँ रहा है ?

 

दस रुपये में हॉस्टल और सुविधाएं मिलती रहे – इस  मांग पर हड़ताल कर रहे जेएनयू के छात्र क्या डरे हुए हैं ? एक महीने से पूरे विश्वविद्यालय में उन्होने हर जगह ताला लगाया हुआ है । पूरे प्रशासन को सिर पर उठाया हुआ है । विवेकानन्द की मूर्ति तक को भंग कर दिया । अगर भय में भी इनमे इतना उग्रवाद बचा हुआ है , तो फिर शायद थोड़ा डंडा और चलना चाहिए ।

 

सवाल यह है कि बकैती करने को जब सब स्वतंत्र हैं तो फिर कौन सहमा हुआ है ?

यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि मैं भारत की महिलाओं की बात नहीं कर रहा हूँ  । सरकार कोई भी हो, महिलाएं किसी भी क्षेत्र, जाति या धर्म से हों , चूंकि असुरक्षित हैं , इसलिए निश्चित तौर पर डरी हुई होंगी । मैं सरकारी नौकरों की बात भी नहीं करता क्यूंकी सोशल मीडिया पर वर्तमान सरकार की नीतियों की आलोचना करना और खुल्लेआम राजनीति करना न उन्हे शोभा देता है , न ही उनका अधिकार है, चाहे मुद्दा आरक्षण का हो , या अर्थव्यवस्था का  । और किसानों के बारे में क्या कहा जाये – वे डरे हुए नहीं, मरे हुए हैं । किसानी आज की तारीख में एक हारा हुआ सौदा है – सरकार रेवड़ियाँ बांटने से ज्यादा उनके लिए कुछ कर भी नहीं सकती ।

और इनके अलावा बचा कौन ?

 

क्या कुछ भूतपूर्व केन्द्रीय और प्रदेशों के मंत्री भयभीत हैं  ? भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते जेल में हैं तो भी उनके समर्थन में हजारों खड़े हैं , और जो मन में आ रहा है लिख-बोल ही रहे हैं – न्यायपालिका के विरुद्ध भी , ईडी के खिलाफ भी ।

ईडी और सीबीआई वैसे भी हर किसी को नहीं लपेट सकती । आयकर  और जीएसटी कोई केला-विभाग नहीं हैं । ईमानदारी साबित करने के लिए कागज हैं तो कोई आपको फसा नहीं सकता । ये बात नौकरी करने वाले भी समझते हैं , और व्यापारी भी । दलाल पत्रकारों को इस सब से फर्क नहीं पड़ता  – एक तो वे भेड़-चाल में चलते हैं , दूसरा आपके और मेरे जितनी बुद्धि उनमे नहीं है और उनकी  नीयत में तो पूरी तरह ही खोट है  , तीसरा न ये सरकारी कामकाज के बारे में जानते हैं , न खेती , न कानून , न अर्थव्यवस्था  , न धर्म  और न ही शोषण के – जानते होते तो पत्रकार नहीं होते , कहीं कुछ ढंग का योगदान दे रहे होते ।

 

बाबर और औरंगजेब को आदर्श मानने वाले थोड़े हताश ज़रूर हैं , पर वे भी डरे हुए क्यूँ हैं, समझना मुश्किल है । वामपंथी इतिहास को नित्य (eternal) समझने वाले निराश अवश्य होंगे , पर डर का तो कोई कारण समझ नहीं आता – किसी की नौकरी तो नहीं जा रही है , किताबों पर तो प्रतिबंध नहीं लग रहा है । गांधी-नेहरू को इंसान नहीं भगवान मानने वाले हो सकता है दुखी हों  ,पर सहमे क्यूँ होंगे,कहना मुश्किल है ? अयोध्या मसले पर कानूनी हार से किसी में पराजय का बोध हो सकता है , पर भय कैसा ? मथुरा-काशी दबा कर बैठे हैं कुछ लोग , फिर कहाँ का और कैसा डर ?

 

कश्मीर में चार महीने से शांति है । विशेष दर्जा हटाकर कश्मीर को भारत में सदैव के लिए सम्मिलित कर लिया गया है । थोड़ी अराजकता और असंतोष होना संभव है । इसके चलते हो रही असुविधाओं को विपक्ष और पत्रकार रोज़ रेखांकित कर रहे हैं । सरकार ने कश्मीर में यातायात और संचार पर कुछ रोक लगाई हुई है , जो कि समयबद्ध और कानून के हिसाब से हैं  । कुछ भी छिपाकर नहीं किया जा रहा है । तो फिर कैसा डर ? भारत के मजबूत हो जाने का ? उग्रवाद को झटका लगने का ?

 

सवाल सिर्फ इतना है कि आप या तो जनमत से डरे हुए हैं जो आपके फर्जी नेरेटिव को चुनावों में चलने नहीं देता , और जिसकी काट करने के लिए आप ईवीएम को ही हेक्ड बता देते हैं ;

या फिर आप कुछ चुनिन्दा ट्रोल्स से डरे हुए हैं जो सोशल मीडिया पर आपका विरोध करते हैं । तो करने दो ? क्या फर्क पड़ता है ? आपको  मज़ा भी आता है ध्यानाकर्षण में ! अब रुलिङ्ग पार्टी का आईटी सेल और उनका प्रवक्ता तो आपका विरोध करेगा ही । आप सोचो कि आपको हर कोई सर-आँखों पर बैठा ले , यह हो नहीं सकता । अगर आप अंजान, अदृश्य ट्रोल्स के डर से सदमे में हैं , तो आपका सिर्फ मखौल ही उड़ाया जा सकता है ।

 

अरे देश में लव जिहाद , धर्म परिवर्तन और आठ-दस बच्चे पैदा करने तक की छूट है । ऐसे में भय,भय का राग अलापना राष्ट्र-द्रोह नहीं तो क्या है ? साढ़े पाँच साल हो गए सुनते-सुनते कि भारत में हर कोई डरा हुआ है । वाजिब सवाल उठता है कि कौन है जो इस कदर डरा हुआ है कि न दीखता है और न ही कुछ बोल पाता है ? और आखिर क्या कारण है उसके इस प्रकार डरे रहने के ?

 

अब रही बात उम्मत-अल-मुमिनिन ( विश्वास करने वालों का समुदाय ) तो यह सर्वविदित है वे पूरे विश्व में खुद को भयाक्रांत दिखाते हैं ,पर  किसी न किसी को दबा रहे होते हैं । हर कोई,हर जगह हमारा हक़ मार रहा है – इस मानसिकता से कोई खुद को डरा हुआ भले कहे , पर वास्तव में वही विश्वव्यापी डर का कारण है । वैसे किसी भी समुदाय के लिए तुष्टीकरण के युग का समापन हो जाना बहुत बड़ा झटका है । पर फिर भी कौम के नुमाइंदे हल्लाबोल कर ही रहे हैं । किसने रोका है कुछ भी कहने सुनने से ? सड़कों पर नमाज़ पढ़ो , पुनर्विचार याचिका डालो , कोई रोक कहाँ है ?

 

पर सवालों का कोई जवाब नहीं देगा । हॉरर फिल्म में भूत कहाँ और कब प्रगटेगा करेगा , यही सस्पेंस पटकथा को बांधे रखता है । “सब सहमे हुए हैं” नेरेटिव का मज़ा यही है कि इसका जवाब यह कहकर देने से माना किया जा सकता है कि “सब सहमे हुए हैं” !

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  1. anudhya says:

    शानदार लिखावट, वाकई कौन डरा हुआ है ये जानने का ही विषय है, “लेकिन अगर विचार हैं तो रखो , विचार हैं ही नहीं तो उन्हे न रख पाने का प्रचार करके क्या साबित करने की कवायद है ?”
    उपरोक्त पंक्तिया दमदार, हर एक उस व्यक्ति की विवशता जो कही न कही चुप करा दिया गया या ऐसा कहे की ये विवशता गले में घुट रही है… कहे तो किससे कहे l
    बहुत उम्दा लेखनी

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