विधायक विलाप – पचास करोड़ का फटका,होटल लॉबी से गिरा तो व्हिप में अटका

डेमोक्रेसी स्टॉक एक्सचेंज पर कल हमारा प्रति नग रेट पचास खोखे के आसपास चल रहा था  । आज बाज़ार में पड़ताल करोगे तो सफ़ेद कुर्ता-पैजामा पहने और गांधी टोपी सिर पर टाँगे पचासों विधायक मिल जाएंगे- अनबिके, अतृप्त । रेट सिर्फ गिरा ही नहीं , दो कौड़ी का भी नहीं रहा । कल तक टीवी में एक-एक विधायक का नाम चल रहा था – ये जाधव, वो मुंडे, ये उस जिले का शिंदे, वो पारुलकर का लड़का पारुलकर । आज हर कोई बस रह गया है एक सौ बासठ में से एक । सबसे बड़े दल के एक सौ पाँच के तो न कल लेनदार थे ,न आज हैं  । पर बेचारे कुछ निर्दलीय मूल्यविहीन सा महसूस कर रहे हैं । और खैर अगाढ़ी वाले तीन दलों के विधायकों का तो हाल मत ही पूछो ।

 

सरकारें आती हैं,जाती हैं । कल एक गिर गयी, आज दूसरी शपथ ले लेगी । जो आयी है वह अपनी पार्टी की है , अपने समर्थन के बूते ही आई है , पर जो गयी है उसको भी अगर समर्थन दे दिये होते तो वह भी अपनी ही हो जाती । कल एक अवसर उत्पन्न हुआ था – मार्केट बूम पर शेयर कैश कराने का , लाइफ लॉन्ग की ज़रूरतें पूरी कर लेने का , सदैव घी के दिये जलाने का घी जुगाड़ लेने का । पर आज का दिन है तारे भुला कर जमीन पर नज़र गड़ाने का और खुद रसातल में धंस जाने का ,क्यूंकी अब एक-एक एमएलए के वोट का कोई महत्व नहीं रहा है  । स्थिर सरकार जो बन गयी है ।

 

ज़मीन की कीमत एक बार लग जाए तो हाथ भले न आए , हवा कभी नहीं होती । लेकिन वेश्याओं की रेट के मायने तभी हैं जब सौदा पक्का हो जाए और नोट हाथ बादल लें । राजनैतिक दल ज़मीन हैं , विधायक वेश्यास्वरूप । सौदा हुआ नहीं , माल बिका नहीं , पचास खोखा सिर्फ कयास बन कर रह गया । सुना था ‘मोटे आसामियों’ की टोलियाँ घूम रही हैं होटल, होटल- मोटी अटेचियाँ हाथ में लिए । जब भी पर्दों और पत्तों की सरसराहट हुई या दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी, लगा ‘मोटे आसामी’ आ पहुंचे हैं भाग्योदय करने । पर वे निरे नाकाम चूतिये साबित हुए – या तो उन्हे चौकीदारों ने होटलों के बाहर से ही चलता कर दिया , या फिर वे सारा पैसा हमे ऑफर करने की बजाय खुद ही भगोस गए । घने बादल भी हुए, मौसम की चेतावनी भी थी , पर रुपयों की बारिश नहीं हुई …….

 

जहां तक मुझे याद है ये चौकीदारों और ‘मोटे लोगों’ की जमात तो एक ही थी ? तब क्या कन्फ़्यूसन हुआ है  ! कैसे इन्होने उन्हे हमसे मिलने से रोक दिया ?चौकीदार से एक बहुत मशहूर नारा भी याद आया  – न खाऊँगा , न खाने दूंगा । इसे कहते हैं बगल में राम, और मुंह में छूरी । खैर भाड़ में जाएँ ये चौकीदार और मोटा-भाई लोग  – कमसकम पवार-ठाकरे टीम ने हमें एक महीने तक  रिज़ॉर्ट और होटलों में तो ऐश कारवाई । एक महीने की मौज आज खत्म, और साथ ही खत्म उम्मीदें बड़ा हाथ मारने की !

 

पचास करोड़ के सफ़ेद हाथी अब हम कहीं के नहीं रहे । तीन-चार परिवार और आठ-दस अन्य बड़े नेता इकट्ठा होकर अब सारे राज्य की गज़क-रेवड़ी चाटने में व्यस्त हो जाएँगे । मंत्रिपद कुल 30-40 ही तो हैं ! इनकी जो झूठन बचेगी , वो इनके गुर्गे उड़ा जाएँगे । अब विधायक होने के नाते हम एक स्तर से नीचे भी नहीं गिर सकते । हा शोक ! अब हमें व्हिप के आदेशानुसार चलना होगा , पार्टी लाइन ही सब कुछ है ।  यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट ने आज के प्रस्तावित फ्लोर टेस्ट के लिए गुप्त मतदान पर भी रोक लगा दी थी , जैसे राज्य सभा चुनाव में अब सीक्रेट बैलट नहीं होता । अवसर शायद उस पल ही हमसे छिटक गया ।

 

विधायकी तो खैर हम अब भी करेंगे । जो एक झटके में बैठे-बिठाये मिल रहा था उसके लिए अब हमे पाँच साल जूतियाँ घिसनी होंगी । इनवेस्टमेंट रीकवरी तो कैसे भी करनी ही है । रेगुलर कट-काट छोड़-कर भी बाढ़, सूखा, तबादले, निर्माण कार्य आदि तो होते ही रहेंगे । वैसे अभी भी आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि साल – दो साल में पुनः हमारी कीमत पचास-साठ खोखा पहुँच सकती है, इंतज़ार बस अगले राजनैतिक संकट का है ।

 

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