रवीश – रिक्शाचालक संवाद

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एक दिन रवीश कुमार पाण्डेय भटक रहे थे कालीघाट की संकरी गलियों में । चूंकि माँ के दर्शन करने के लिए निकले थे , इसलिए न हाथ में माइक था , न साथ में कैमरामेन । पर एक पत्रकार , और उससे भी गया गुज़रा एक महत्वकांक्षी लेखक, रस्मों-अदाएगी के लिए सदैव प्रस्तुत रहता है । हर पुराना घर , सूखे माछ के पकने की बास ,गंदगी के ढेर, बीड़ियाँ फूंकते पीली टेक्सियों के ड्राइवर, बुहारे लगाती बंगाली भाभियाँ – फिज़ा साहित्यिक संभावनाओं से सराबोर थी । एसी कार को छोडकर सड़क पर चल रहे रवीश की सांसें फूल रही थी, उमस के चलते माथे पर हल्का पसीना था और उनके गंदले-सफ़ेद बाल माथे पर गिर आए थे । थोड़े से शारीरिक उन्माद और बहुत सी मानसिक व्यथा से ग्रसित होकर रवीश सृजन की दहलीज़ पर खड़े थे । कुछ बदलाव चाहने और लाने के फेर में वह वैसे भी सदैव ही फसे रहते हैं ।

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तभी रवीश ने सवारी की तलाश में सड़क के किनारे खड़े दो हाथ-रिक्शा वालों को देखा । जहां तक उन्हे अंदाज़ा था, राज्य सरकार ने हाथ-रिक्शे बंद कर उनके चालकों को बेटरी द्वारा संचालित रिक्शे मुहैया करने का वायदा किया था । अब इन दो दुबले-पतले दरिद्र नारायणों को देखकर वह द्रवित हो उठे । संभावनाएं अवसर बनकर कुलांचे मारने लगीं ।एक रिपोर्टर को स्टोरी करने की चुल्ल मची , एक लेखक को मटिरियल इकट्ठा होने की आस बंधी ,एक समाजवादी के अंदर संभ्रांत वर्ग के लिए नफरत जागी और रवीश कुमार को नैराश्य और विरक्ति ने घेर लिया ।

 

हाथ-रिक्शा वालों के पास जाकर एक से बोले – “राम-राम , सुस्ता रहे हैं ?” “बाबू ,सवारी की राह देखत रहिन । सुस्ताने का बकत नाहीं । कहे आप को छोड़ दें कहीं ?”

 

रवीश इस सवाल के लिए तैयार नहीं थे । उनके नज़रिये में शोषण के लिए खुद को प्रस्तुत करता शोषित भी समस्या का एक हिस्सा है । शोषण करने वाला तो खैर अक्षम्य है ही ।  रिक्शे वाले द्वारा एकदम से सौदे की बात कर देने पर थोड़ा फिसले , फिर खुद को संभालकार बोले-

“नहीं भाई, हम तो आपके रिक्शे में नहीं बैठ पाएंगे । कोई आदमी हमको खींचे या हमारा भार उठाए ,हमको यह तनिक भी गवारा नहीं । पर आपसे बतियाने का बड़ा मन है” ।

“तब मन लगाते रहिए । पर बातें किसी और के साथ कीजियेगा । यहाँ खड़े रहेंगे तो हमें सवारी नहीं मिलेगा, क्या है कि यह सोच कर कि आप ही रिक्शा किराया कर लिए हैं । ”

“ देखिये मैं आपसे आपके जीवन ,परिवार ,दिनचर्या और खर्चा-पानी के बारे में बातचीत करना चाहता हूँ । बदले में आप चाहें तो समय के हिसाब से थोड़े पैसे भी दे सकता हूँ । एक घंटे के पाँच सौ रुपये ठीक रहेंगे ? ”

 

इतना कहकर रवीश ने अपनी एक जेब से छोटा सा टेप-रेकार्डर और दूसरी से पाँच सौ का नोट निकाल लिया । रिक्शा खेंचने वाला एक मेहनतकश इंसान था । बातें के एवज़ में पैसा कमाने की बात उसे कुछ नागवार लगी । फिर यह आशंका भी हुई कि इतना पैसा देने वाला ज़रूर कोई-न-कोई डिमांड या बखेड़ा भी खड़ा कर सकता है । हो सकता है हाथ-रिक्शों के खिलाफ किताब या अखबार में आग उगल दे  तो आगे काम मिलना ही बंद हो जाए ।

 

“साहब , बकर करने का तो पैसा हम लेंगे नहीं । हमारे जैसों को खून –पसीना बहाकर कमाया गया पैसा ही पचता है । आप चलिये आपको छोड़ देते हैं जहां जाना है । जितना देना है दीजिएगा । रास्ते में थोड़ी बात-चीत भी हो जाएगी । ”

 

रवीश पेशोपेश में थे । रिक्शे पर बैठने को ज़मीर गवारा नहीं था ,पर चालक की वस्तुस्थिति जानने की उत्सुकता भी थी । लेकिन चिंता यह भी थी कि अगर किसी ने पहचान कर फोटो खेञ्च लिया और अपलोड कर दिया , तो सोशल मीडिया पर बहुत किरकिरी हो सकती है । सच बात तो यह थी कि रवीश थके हुए थे और कहीं न कहीं सैर करने का उनका भी मन था ।

 

तो स्वयं को कुछ गोची देकर रवीश चढ़ ही बैठे रेवती राम के रिक्शे पर । रेवती राम ने खैनी निकाल कर हथेली पर रखी,उसे ठोका और फिर फांक लिया । फिर बूढ़ी, गली हड्डियाँ और चमकती ,पतली पसलियाँ रवीश ,उनकी पढ़ाई और वामपंथ के टूटे हुए अरमानों का बोझ उठाते हुए सरपट सरकने लगीं । चलते रिक्शे में रवीश को हवा लगने लगी ,हवा में गंदले बाल उड़ने लगे । तलब हुई तो जेब से सिगरेट निकाल कर जला ली । एक लंबा कश खींचकर आखिर ने अपना पहला सवाल पूछ ही डाला  –“कौन जात हो भाई” ?

 

आक थू की पिचकारी छोड़ते हुए रेवती राम ने कडक कर जवाब दिया – “कामगार हैं साहब , पर वामपंथी कभी नहीं होंगे ” ।

 

 

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