आर्टिकल 15 – सरनेम भुलाने होंगे अगर जो मुर्दे जगाने हैं

 

जाति है कि न जाती है , न कभी जाएगी । बाबासाहेब कबके चले गए जाति को नेस्तनाबूद करने की ललकार देकर, पर तब का यह पागल हाथी आज निरामिष डाइनोसॉर का रूप धारण कर चुका है । गांधी समझते थे कि समाज को इस लगे हुए कीड़े द्वारा दी जाने वाली पीड़ा में आनंद आता है , इसलिए उन्होने इसके विनाश की बात ही नहीं की , बस सुधार पर बल दिया । जाति हमारे हर एहसास में है – उस खाने में जिसे हम खाते हैं या नहीं खाते , उस नज़र में जिससे हम अन्य हिंदुओं को देखते हैं या नहीं देखना चाहते , उस पानी में जिसे हम अधिकार से पीते हैं या बिना अधिकार के नहीं पी सकते और उन रिश्तों में जो हम बनाते हैं या नहीं बनाना चाहते । इससे पूर्णतया निजात पाना फिलहाल संभव नहीं लगता , पर इतनी लाग-लपेट ज़रूर रखना चाहिए कि अब से नाम के पीछे सरनेम का सस्ता स्टीकर चिपकाना बंद कर दें ।

 

आखिर आयुष्मान को खुराना , कुमुद को मिश्रा और अनुभव को सिन्हा की बैसाखियाँ क्यूँ चाहिए ? माना कि मुकेश का अंबानी  , ज्योतिरादित्य का सिंधिया और रणबीर का कपूर के बगैर काम नहीं चल सकता , पर इतनी कुर्बानी हमे देनी होगी अगर समाज को आगे ले जाना है तो । सरनेम अगर उपजाति और गोत्र हमेशा नहीं भी बता पाते , तो भी जातिसूचक तो अधिकांश केस में होते ही हैं । भला कौन नहीं जानता कि मिश्रा-शुक्ल-पाण्डेय हैं तो ब्राह्मण होंगे , और गुप्ता-गोयल-बंसल हैं तो बनिया ? कुछ पुछल्ले तो अपने पीछे पूरी एक अक्षौहिणी सेना खड़ी होने का भी अंदेशा देते हैं – मसलन झा ,मीणा, यादव, चौटाला, गुज्जर और अन्य । आपका पूरा नाम सीधे-सीधे शब्दों में बिना पन्नों का सीवी है । नौकरी या कॉलेज में हैं तो कोटा के लाभार्थी हैं या नहीं , और हैं तो किस कोटा के , यह सभी जानकारी सरनेम साझा कर देता है । जानने में दिलचस्पी हर हिंदुस्तानी की है – आईआईटी से हो या जएनयू से ।

 

कुछ काइयाँ नाम ऐसे होते हैं जो पूरी पहचान बताते-बताते कुछ छुपा ले जाते हैं । जाति का व्यसन रखने वालों को अमुक कुमार, फलाना सिंह , ढिमकाना चन्द्र या चंद्रा जैसे नामों से बेहद चिढ़ है । बातों-बातों में जो ये खुद अगर न बताएं या फिर कोई रेफरेंस या हिंट न दें , तो बेशर्म होकर व्यसनियों को जाति और उपजाति पूछनी ही पड़ जाती है । यह सब जाने बिना आधुनिक भारतीय का निर्वहन संभव नहीं है । हर नाम को सामाजिक सीढ़ी में एक जगह देनी है ,उसमे जाति की महती उपादेयता है । वैसे कुछ महामना जो सरनेम हटाने का कृत्य पहले ही कर चुके हैं , वह इन व्यसनियों को तगड़ी गोची देते हैं- अब कौन जाने यह विश्वनाथ क्या जात है , और शशांक क्या बला है ? फिर कुछ –एक सरनेम तो फेंकोलोजी में चैम्पियन हैं- शशांक का एटम , अखिलेश का परमाणु ,रवीद्र का लॉं ,राजू का कमांडो आदि ।

 

यह भी सही है कि सरनेम हर उत्कंठा शांत नहीं कर सकता । अब यह भी एक वाजिब सवाल है कि आप कौन से ब्राह्मण हैं – कन्याकुब्ज, सरजुपारिन,मिथिला,सनाढ्य,गौड़ या कोई और ? जब तक यह न पता चल जाये कि कौन से गोत्र के मीणा या यादव हैं , बात कैसे आगे बढ़े ? दलित कहने से काम नहीं चलता – जाटव , मूसहर,पासवान और निषाध में भी तो एका नहीं । फिर किसी ने  कह दिया कि सिन्हा या श्रीवास्तव ,यानि कायस्थ हैं , तो यह कौन बताएगा कि हाईरार्की में आप कहाँ खड़े हैं ? इसका एक अजीब जवाब खैर अनुभव सिन्हा ने फिल्म मे खुद ही दिया है कि कायस्थ डिफ़्रेंट हैं, वह चार वर्णों में ही नहीं आते !

 

वैसे ‘कौन जात हो भाई’ का नारा देकर मशहूर हुए पत्रकार रवीश कुमार का आभार व्यक्त करना चाहिए । दैनिक जीवन के हर प्रश्न को जाति से जोड़कर उन्होने तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग के सारे मुग़ालते दूर कर दिये । साथ ही साथ अपनी पांडे पूंछ की तिलांजलि देकर एक नायाब उदाहरण भी प्रस्तुत किया है । इसके लिए उन्हे बाकायदा रेमोन मेगसेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया है ।

 

हमारे समाज में भगवानों की भले जाति न हो ,पर संस्कारों, त्योहारों और आचार-विचारों की तो है । अगर जतियों का सर्वनाश संभव नहीं तो भी इनके नाम होने वाले अत्याचार , अनाचार और भ्रष्टाचार से लोहा लेने की ज़रूरत है । अनुच्छेद 14,15 और 17 के साथ कोई खिलवाड़ नहीं हो सकता । छींटाकशी ,छुआछूत, जातिगत हिंसा , पिछड़ों की जमीन पर अतिक्रमण, बलात्कार और वोट बैंक की राजनीति से निजात पानी होगी । हमे ऐसे सामाजिक,प्रशासनिक,आर्थिक और राजनैतिक सिस्टम की हिफाज़त नहीं करनी है जो जाति के नाम पर उत्पीड़न करे या होने दे ।

 

आर्टिकल 15 में  कंटैंट के अलावा पटकथा की कसावट भी जोरदार है । फिल्म का मूड हमेशा डार्क रहता है ,आयुष्मान और उसकी पत्नी के बीच भी सामाजिक व्यवस्था और हमारी उसमे भूमिका को लेकर तनाव है । आयुष्मान ने जिस दर्प और संवेदनशीलता के सम्मिश्रण के साथ एक नए एसपी का रोल निभाया है, उसके लिए उसे एक और नेशनल अवार्ड मिलना तय है । मनोज पहवा और कुमुद मिश्रा के पेरफ़ोर्मेंस बेहद शानदार हैं । सयानी गुप्ता और जीशान अयूब के चरित्र कुछ बेहतर गढ़े जा सकते थे । लेकिन इतनी हिंदुस्तानी फिल्म बनाना अपने आप में एक बहुत बड़ा चेलेंज रहा होगा ।

 

एक और किरदार भी है अदिति का (एसपी साहब कि पत्नी) , जिसे निभाया है ईशा तलवार ने । एसपी स्टीफंस में पढ़ा है , विदेश में भी रहकर आया है और उसे ज्यादा अंदाज़ा नहीं है जातिगत दलदल और गंदगी का । लेकिन उसकी उसकी पत्नी का एक सोशल कोंशंस है और वह उम्मीद करती है कि उसका पति भी अत्याचार के खिलाफ खड़ा होगा और उससे लड़ेगा । एसपी साहब तो शुरुआत में कचरा देखकर भाग निकलने की सोचते हैं , पर हर मोड पर बीबी की ऊमीदों पर खरे न उतर पाने के डर से डटे रहते हैं । ऐसी बीबियाँ नसीब वालों को मिलती हैं जो आपके मॉरल कम्पास को गाइड कर सकें । ऐसे अफसर पति भी कम हैं जिनका अहम उनको गाइड होने दे । अदिति का किरदार एसपी को अड़ने-भिड़ने और खड़े रहने की प्रेरणा देता है और इसे ईशा तलवार ने बखूबी निभाया है ।

 

अगड़े वर्गों के बहुत से लोग फिल्म के विरोध में खड़े हो गए थे । मुझे इसकी कोई वजह नज़र नहीं आई । जो दिखाया गया है वह सामाजिक सच्चाई है । आज भी संभव है यू पी के किसी मंदिर में दलितों का प्रवेश वर्जित हो । किसी समाज को उसकी औकात बताने के लिए उसकी लड़कियों के बलात्कार आज भी होते हैं ,जैसे उन्नाव  में हुआ है ।फर्जी केस डालना , एफ आई आर न लिखना , पोस्टमारटम में गड़बड़ी ,दबाव डालकर गलत लोगों से इक़बालिया जुर्म करवाना , कर्मचारी की जाति पर फब्तियाँ कसना और एक दूसरे को परस्पर जतियों का एहसास दिलाते रहना – यह सब कुछ हिंदुस्तान के दैनिक जीवन का हिस्सा हैं । नहीं होना चाहिए , पर हैं  , और तब तक रहेंगे जब तक जाति के जहर से प्रतिपल ,हर मोड पर लोहा नहीं लिया जाता रहेगा ।

2 Comments Add yours

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