कॉमरेड कन्नन को नमस्ते करो !

 

सेक्रेड गेम्स में गुरुजी बताते हैं कि कलयुग की कालिमा सृष्टि पर पूरी तरह से छा चुकी है और अगर सतयुग के समाज की पुनर्स्थापना करनी है तो सबको बलिदान देना होगा । जिहाद,जलवायु परिवर्तन और जनसंख्या विस्फोट से झूझ रही इस दुनिया में प्रतिपल कहीं न कहीं ,किसी न किसी पर अस्तित्व का संकट मंडरा रहा होता है – पर इस भीड़ में अलग वही दिखेगा जो अपनी सबसे प्रिय वस्तु का त्याग करने का दुस्साहस कर सकता हो । न मैं कन्नन गोपीनाथन से कभी मिला हूँ , न ही उसके किसी मित्र को ही जानता हूँ । जो भी जानकारी है वह मीडिया और सोशल मीडिया के जरिये ही है । आईएएस से उसके त्यागपत्र का समाचार पढ़ा तो बस इतना ही समझ पाया कि हो न हो कन्नन की अंतरात्मा पर कलयुग का बोझ इतना भारी हो गया होगा कि उसे सिस्टम में डूबने का सा एहसास होने लगा होगा । शायद इसीलिए वह इस जंजाल से निकल कर भाग लिया । कहते हैं शीर्षस्थ सरकारी नौकरी पाना कठिन है ,उसका छूट पाना बहुत मुश्किल और उसे लात मार कर निकल जाना कदाचित असंभव !

 

कन्नन का कहना है कि उसने सैद्धान्तिक आधार पर नौकरी छोडने का निर्णय लिया है । उसे कश्मीर के विशेष दर्जा हटाये जाने से समस्या नहीं है (कहता है यह सरकार का विशेषाधिकार है ), पर कश्मीरियों के फोन और इंटरनेट उपयोग पर लगाए गए एहतियातन , अल्पकालिक प्रतिबंधों से वह आहत है । अपना- अपना नज़रिया है – देश की सरकार और एक प्रचंड बहुमत को कश्मीर में होने वाली राजनैतिक हत्याओं से पीड़ा होती , जबकि इन साहब को लोगों के वाटसेप, फेसबुक और ट्विटर इस्तेमाल न कर पाने का मलाल है । हो सकता है अपने दीर्घ सेवाकाल में वह संवेदनशील इलाकों में  सोशल मीडिया की न्यूसेंस वेल्यु को न समझ पाया हो । या संभव है उसकी नज़र में राइट टू इंटरनेट एक मौलिक अधिकार हो । बहरहाल पिछले बीस दिनों में कश्मीर में कोई जान नहीं गयी है , इसपर कन्नन को कुछ नहीं कहना है ।

 

हो सकता है कि वह कभी कश्मीर न गया हो या उसके बारे में कभी पढ़ा भी न हो (ज़रूरी नहीं यूपीएससी निकालने वाले को दुनिया भर का ज्ञान हो ) । पैंतीस साल से घाटी युद्ध का मैदान बनी हुई है ।  वहाँ की मिट्टी लहू से लथपथ है । कुछ कट्टरपंथियों के आज़ादी हासिल करके इस्लामिक गणतन्त्र की स्थापना करने  या फिर पाकिस्तान में कश्मीर का विलय करवाने के मंसूबों पर भारत सरकार ने केवल बीस दिन पहले ही हमेशा के लिए पानी फेरा है । ऐसा नहीं है वहाँ एक अरसे से आपातकाल (कन्नन के शब्दों में )लगा हुआ है । पिछली घटनाओं के अनुभव से सबक लेकर चौकन्ना प्रशासन अगर फूँक-फूँक कर कदम रख रहा है तो इसमे क्या गलत है ? बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद पहले हफ्ते में पचास लोग मारे गए थे । पत्थरबाजों ने पिछले तीन सालों से श्रीनगर , अनंतनाग , कुलगाम और बारामूला को सर पर उठाया हुआ है । सेना और जिहादियों के  बीच होने वाली  मुठभेड़ों के दौरान कई बार भीड़ ने खलल डालकर उन्हे बचाने की कोशिश की है ।जिहादियों के जनाज़ों में हुजूम लगते हैं । यह सारा मोबिलाइज़ेशन सोशल मीडिया के जरिये ही होता है,यहाँ तक की युवाओं को फुसलाने –बरगलाने का खेल भी । बुरहान वानी सोशल मीडिया स्टार था ।  इसके अलावा यह दुष्प्रचार और फेक न्यूज़ फैलाने का अद्वितीय माध्यम भी है ।पर कन्नन साहब को भारत का यमन बनना स्वीकार्य नहीं !

 

वैसे एक अधिकारी से इतनी समझ रखने की उम्मीद करना बेमानी होगा । यह भी हो सकता है कि UT काडर का यह अधिकारी नए बने केंद्र-शासित प्रदेशों – जम्मू कश्मीर और लद्दाख में पोस्टिंग न करना चाहता हो । ऐसे में मोरल हाई ग्राउंड लेकर तिलांजलि देना अच्छा सौदा है । जो भी हो , फैसला लेने की हिम्मत दिखने के लिए कानन की दाद तो देनी ही पड़ेगी । उसके सिद्धान्त से चाहे नहीं , पर उसकी चुल्ल से बहुत से सर्विङ्ग अफसर ज़रूर सरोकार रखते हैं । बहुतों के मन में ईर्ष्या का संचार भी हुआ होगा । भतेरे उसपर छींटाकशी भी करेंगे , कर रहे हैं । पर यह उसका अधिकार है । अगर राजनैतिक महत्वकांक्षा के चलते भी कोई ऐसा फैसला ले रहा है तो उसको सलाम है । क्यूंकी नौकरी असलियत में सिर्फ एक फंदा है , चाहे कितना भी शाही और आरामदायक ही क्यूँ न हो । बदलाव या क्रांति नौकरशाही रहते नहीं लायी जा सकती – न सामाजिक, न खुद के जीवन में ।

 

 

आला अफसरों ने कन्नन पर दुराचरण के कुछ आरोप लगाकर उसे  एक चार्जशीट थमाई हुई है । कुछ आरोप तो जघन्य किस्म के हैं । जैसे एक यह कि वह अपनी पोस्टिंग (दादर और नगर हवेली) से छुट्टी लेकर बाढ़ राहत कार्यों में हाथ बटाने हेतु केरल चला गया और वापस आ कर रिपोर्ट जमा नहीं की (कह तो रहा हूँ नौकरी कुत्ते का पट्टा है) । इससे भी संगीन आरोप यह है कि मग़रूर कन्नन ने अपने क्षेत्र में किए गए कार्यों को रेखांकित करते हुए प्रधान मंत्री अवार्ड के लिए आवेदन नहीं किया (जो कि बॉस के कहने पर उसने बाद में कर भी दिया )।  सालाना रिपोर्ट में बॉस ने उसे केवल 9.95/10 अंक दिये , और अगस्त में ही सज़ा के तौर पर कुछ अतिरिक्त कार्यभार भी सौंपा दिया । यह सब इस अफसर की काम के प्रति उदासीनता , अवज्ञा की भावना और दुराचार को सार्वजनिक करता है ।परम जानकारों का कहना है कि कन्नन ने इसी डर से  नौकरी छोड़ी है ।

 

वैसे शाह फैजल ने भी नौकरी छोड़ी थी ,पर उसके पास कश्मीर का बना-बनाया प्लेटफॉर्म (कश्मीर) था राजनीति करने के लिए । वह हार्वर्ड से उच्च शिक्षा भी हासिल कर चुका था । छतीसगढ़ काडर के आईएएस ओ पी चौधरी ने भी नौकरी से त्यागपत्र बीजेपी की तरफ से विधान सभा का टिकट मिलने पर ही दिया था । अधिकतर अफसर सेवानिवृत्ति के आसपास ही अलविदा कहकर राजनीति का दामन थामने का साहस कर पाते हैं । पर कानन का फैसला थोड़ा हट के है । न अभी केरल में चुनाव हैं , न ही उसने कोई पार्टी जॉइन की है । लोकसभा चुनाव भी अभी हालिया सम्पन्न हुए हैं । ऐसे में अपनी आवाज़ वापस हासिल करने ले लिए नौकरी को त्याग देने का उसका दावा सर्वथा खोखला कहकर खारिज नहीं किया जा सकता । कन्नन पर नज़र रखिए – ए मेन विथ नो प्लान इस ए लंबी रेस का घोडा ।

 

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