सेक्रेड गेम्स सीज़न 2 – देट नेट्फ्लिक्स हेट्स हिंदूइज़्म इज़ ए फेक्ट

(भाषा अश्लील है , जैसी वेब सिरीज़ में है)

 

 

नेट्फ्लिक्स की सनातनवादियों से कुछ ज्यादा ही सुलगती है । Ghoul में हिन्दू फासीवादी सरकार मुसलमानो पर सख्तियां कर रही थी ।यहाँ तक कि कुरान की प्रतियाँ रखना भी प्रतिबंधित हो गया था ।  Leila में आर्यावर्त बन चुका है जहां अल्पसंख्यक ,विधवाएँ, पिछड़े सब हाशिये पर कर दिये गए हैं । मुसलमानो के बच्चे सरकार ले जा रही है । हसन मिनहाज ने कश्मीर पर जो ज्ञान चोदा है ,उसपर ज्यादा कुछ नहीं कहूँगा । आज़ाद कश्मीर का सपना देख रहे हर वहाबी के अरमानों का कत्ल हुआ है । और अब आया है सेक्रेड गेम्स जिसने दूसरे सीज़न में इस चुटियापे की सारी हदें पार कर दी हैं ।

 

इस बार लपेटे में हैं बचपन से ही गीता का मर्म समझने वाले एक सिद्ध गुरुजी जो कलियुग के फेर में फसी कमीनी दुनिया को पुनः सतयुग में ले जाना चाहते हैं । इसके लिए उनका प्लान है पाकिस्तानी जिहादियों के द्वारा बंबई में परमाणु बम फुड़वा देना, जिसके बाद उन्हे लगता है दुनिया में ऐसा प्रलयचक्र चल उठेगा कि हर कोई एक दूसरे की गांड मार देगा और सृष्टि का सर्वनाश हो जाएगा । कुछ चुनिन्दा चूतिये बचेंगे जो नए सतयुग की स्थापना करेंगे । आप इस दोयम दर्जे की संकल्पना पर हग भी सकते हैं और थूक भी ।

 

गुरुजी के आश्रम में ‘अहम ब्रह्मास्मि’ की तोता रटाई निरंतर चलती रहती है , जैसे Leila में हर कोई हरामी ‘जय आर्यावर्त’ भौंकता रहता था । वैसे ‘मेरी गांड में ब्रह्मांड’ ही शायद इस सीज़न का सबसे प्रभावी डायलोग है । पंकज त्रिपाठी बने हैं गुरुजी जिनके श्रीमुख से हिन्दी-संस्कृत के शब्द उतने ही प्यार से झरते हैं जैसे नवाजूद्दीन के मुंह से चूतिया और भेनचोद । गुरुजी का किरदार ओशो पर आधारित है- हावभाव , संवाद अदाएगी,स्कोप,चूतियापा इत्यादि । ज़ाहिर है माँ शीला पर आधारित एक किरदार भी गढ़ा गया है जिसकी माँ फिलिस्तीनी और बाप यहूदी है और दोनों ने ही लाइफ में उसे भाव नहीं दिया । कल्कि द्वारा ठंडे तौर पर निभाए गए इस किरदार का औचित्य ही है इसके अंतर्द्वंद्व को दर्शाना और सरताज और गायतोंडे के साथ उसका सायकोलोजिकल समानान्तर स्थापित करना । शी इज़ द फलक्रम बिट्वीन रोल –रेवर्सिंग यूसफुल ईडियट्स सरताज एंड गणेश । गुरुजी के आश्रम में बकचोदी के अलावा चुदाई और गोची (ड्रग्स) की प्रचुर  सप्लाई है, लेकिन फुल रंडाप्स का माहौल नहीं बन पाया ।

 

कुलमिलाकर कर इस गांडु चूतिये अनुराग कश्यप को जैसे न तैसे  हिंदुओं के उंगली करनी ही थी, जो इसने बहुत ही छिछोरे तौर पर की है । मुक्काबाज़ में बहुत कोशिश की थी पर ज्यादा भाव नहीं मिला था। सेक्रेड गेम्स के पहले सीज़न में भी लोगों ने ज्यादा लोड नहीं लिया । ट्विटर पर भी भोंसड़ी का बहुत जहर औंकता है । यहाँ ऐसा ताना-बाना बुना है कि ओशो एक साज़िश के तहत छोटा राजन (गणेश),दाऊद (ईसा),आई एस आई , isis और हिजबुल को मोहरा बनाकर गजवा-ए-हिन्द करवाने की सला रहा है । पाकिस्तान और जिहादी बस मोहरा हैं ,राड़ा सारे हिन्दू करवा रहे हैं ! क्या बंकस चूतिया है यार विक्रम चंद्रा भी ! कौन सी गोची पीकर इन मादरचोदों ने ऐसी साजिश गढ़ डाली ?

 

साला ये हरामी कश्यप इतनी फिल्में बना चुका है पर मजाल है की कि जिहादियों के खिलाफ आज तक कुछ बोला हो ? ट्विटर पे इस फट्टू के घरवालों को चार गालियां क्या ट्रोल्स ने दे दीं, पीएम को टैग कर दिया और फिर देश, समाज, हिन्दुत्व , संघ को गरिया कर  वहाँ से कट लिया ।पहले सिनेमा अच्छा बनाता था – वासेपुर 1 तक , उसके बाद से लगातार अपनी मरवा रहा है । तेरी सेकुलर गांड में दम हो तो अल्लाहु अकबर के भी कुछ उंगली करके दिखा चूतिये ।

 

गायतोंडे और सरताज एक दूसरे के पूरक हैं जैसे ट्रावोल्टा और निकोलस केज फेस-ऑफ में थे , और दोनों बंबई से बेइंतेहा मोहब्बत करते हैं । पूरा नेरेटिव इस सीज़न में शहर को बचाने या उड़ाने पर है- तू और तेरा शहर ,दोनों खल्लास टाइप । यहाँ तक कि ईसा ( दौड़) की माशूका भी बंबई ही है ! गायतोंडे गुरुजी की शरण में रहकर शहर का बलिदान करने को पूरी तरह तैयार हो जाता है ,लेकिन  बंबई आकर एक ही झटके में पलट जाता है । गांडु गुरुजी का गांडु मायाजाल इतना कच्चा साबित हुआ । वैसे दुनिया को नष्ट-भ्रष्ट करने निकला गुरु अगर अपनी तरह हिन्दू या हिंदुस्तानी होता तो लाहोर ,कराची या शंघाई में बम फटवाता,बंबई में नहीं । अगर गुरु को अपने टट्टे भी गिनने आते होते तो वो समझता कि अमरीका में बम फोड़े बिना सर्वनाश संभव नहीं है । इतना तो वो ओसामा मुल्ला भी समझता था , कि जब तक अमरीकियों को नहीं मारोगे, वे लोग लड़ेंगे ही नहीं । कुल मिलाकर विक्रम चंद्रा, कश्यप और नेट्फ्लिक्स को बस यही दिखाना था कि भगवा आतंकवाद किस हद तक डेंजरसली डेलूजनल हो सकता है और इसके लिए उन्होने ब्रह्म,ब्रह्मांड, कल्कि, सतयुग, कलयुग सब के साथ चोदमपट्टी मचा दी ।

सुरवीन चावला ने इस सीज़न में शानदार रोल किया  है । बिट्टू जतिन सरना ),पारुलकर (नीरज कबी), भोसले(गिरीश कुलकर्णी) ,माजीद और शाहिद खान (रणबीर शोरी) के किरदार सतही हैं। रॉ एजेंट के तौर पर अमृता सुभाष का काम बढ़िया है। छोटे से रोल में त्रिवेदी बहुत उछला पर आखिर में उसके भी लौड़े लग गए – गांडु की सारी शानपट्टी खल्लास  । सिरीज़ में इतने सब-प्लॉट और इतने किरदार हैं कि किसी का ढंग से विकास नहीं हो पाया है । सरताज के पिता ,माँ , पिछली बीवी –सबका कुछ न कुछ एंगल है । शाहिद खान (शोरी) भी अपनी माँ से बात करके बँटवारे की यादों मे खो जाता है । हर आदमी की गांड में ऐसी कोई उंगली है जो किसी और गांड में घुसकर आई है ।

 

वैसे कोई चूतिया ही होगा जो यह जानने के लिए आठ घंटे बर्बाद करेगा कि सरताज सिंह टाइप का लंड आदमी बंबई को परमाणु धमाके से बचा पता है या नहीं । सेक्रेड गेम्स सीज़न 1 का यू एस पी था गली-गलौज और सेक्स । पहले सीज़न में नवाजू और बिट्टू ने इतनी शिद्दत से गालियां थूकी थीं कि लाइफ सेट हो गयी थी । गालियां इस बार भी हैं पर उनमें वो करारापन नहीं रहा । अगर माफिया और पुलिसवालों की गालियों का इमपेक्ट पाद और तमाचे से भी हल्का पड़ने लगे तो समझ लेना चाहिए कि पिक्चर पिट गयी । पिछली बार दिल खोल कर सेक्स परोसा गया था – कुबरा सेठ (कुक्कू) , राजश्री देशपांडे ,एलनाज़ ने क्या जलवे बिखेरे थे । अबकी बार कुछ फर्जी गांडुगिरि ज़रूर दिखाई गयी है गुरुजी (पंकज त्रिपाठी) के आश्रम में , पर फ़िज़ पूरी तरह से नदारद है । गुरुजी और गायतोंडे के एक दो भौंडे सीन हैं – नोट माय आइडिया ऑफ टिटीलेशन । बाकी तो महिला किरदार इतनी ठंडी हैं जैसे सास-बहू चल रहा हो ।

सीज़न 2 का क्लाइमैक्स परम चूतियामेटिक है । एक बम को लिए-लिए फिर रहा एक जिहादी और उसके पीछे ढेर सारी पुलिस। फिर जाने कैसे बम मिल जाता है पर उसको निष्क्रिय करने का पासवर्ड नहीं । एक महिला परमाणु वैज्ञानिक ,जो कि भारत की मूर्खता का पर्याय है ,उसमे कुछ उंगली करती है, फिर वहाँ से भाग खड़ी होती है । अब सरताज पर है सारा दारोमदार ,जो वहाँ गायतोंडे के कहने पर आया है उस बंबई को बचाने जिस बंबई को बर्बाद करने के लिए गायतोंडे को भेजा था गांडु गुरुजी ने । इतना पोचा समापन तो बॉन्ड फिल्मों का भी नहीं होता । अनुराग और नीरज घेवान को प्रायश्चित के तौर पर आत्मदाह कर लेना चाहिए ।

 

 

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  1. Tania says:

    Touche. Outstanding arguments. Keep up the amazing effort.

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