एक स्त्री (डायन) की आत्मकथा

 

स्त्री (2018)

द्वारा

अमर कौशिक

 

एक मौलिक  पटकथा  पर आधारित फिल्म जिसमे राजकुमार राव और पंकज त्रिपाठी जैसे महारथियों ने शिरकत की हो  – इतना बहुत है किसी भी सिनेमा प्रेमी को स्त्री की ओर आकर्षित करने हेतु । इसके अलावा भी  इस फिल्म में कान्सैप्ट के तौर पर बहुत कुछ है ,जिसके बारे में विस्तार से चर्चा होनी चाहिए ।

 

फिल्म के केंद्र में  हैं एक  ‘नए भारत की चुड़ैल’ जो कंसेंट का मतलब भली-प्रकार समझती है । चँदेरी शहर में हर साल पूजा के समय यह चुड़ैल अकेले मर्दों पर आक्रमण करती है ।  लेकिन जैसा कि पंकज त्रिपाठी  राजकुमार और उनके मित्रों ,अपारशक्ति और मिर्ज़ापुर सिरीज़ में कमपाऊँडर बने अभिषेक बनर्जी  को समझाते हैं ,यह चुड़ैल किसी पुरुष के साथ जबर्दस्ती नहीं करती ,बल्कि पूछ कर ही जो कार्यवाही करना चाहती है, वह करती है । क्या करती है या करना चाहती है ,यह पूरी फिल्म में कहीं स्पष्ट नहीं है । यह मॉडर्न चुड़ैल पढ़ी लिखी भी है ,जो शहर के घरों की बाहर की दीवारों पर लिखे गए ‘स्त्री कल आना’ जैसे मैसेज पढ़ सकती है । फिल्म में कहीं न कहीं यह संदेश दिया गया है कि कोई भी स्त्री हो , सिर्फ प्यार और सम्मान चाहती है ।

 

राज और डीके ने इस फिल्म को लिखा है । इससे पहले उन्होने एक और बेहतरीन पटकथा लिखी थी- गो गोवा गोन । कहना उचित होगा कि zany अर्थात बौड़म ह्यूमर लिखने वाले और ऐसी फिल्में बनाने वाले फनकार अब बॉलीवूड को भी मिल गए हैं । फिल्म के शुरुआत में ही स्पष्ट किया गया है कि यह एक हास्यास्पद घटनाचक्र पर आधारित है । पर अंततोगत्वा इसमे तीखे  सामाजिक कटाक्ष ,स्वस्थ हास्य और थोड़े  बहुत हॉरर का शानदार सम्मिश्रण है  । फिल्म में ऐसा कोई खास सस्पेन्स नहीं है ,पर कहानी का ट्रीटमंट शानदार है,जो बांधे रखता है । खासकर सभी पात्रों का अभिनय तो  एकदम लाजवाब है ।

 

राजकुमार के बारे अब क्या नया कहा जाए –जैसा भी सीन हो,वे पूरा न्याय करते हुए अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं । यहाँ वे एक दर्जी के किरदार में नज़र आए हैं और क्या सधे हुए हाथों से सिलाई,तुरपाई और किस्सागोई भी करते  हैं।इस टेलर मास्टर कि खासियत यह है कि वह अपनी महिला ग्राहकों का नाप आँखों से ही ले लेता है-बिना इंची टेप का इस्तेमाल किया और बिना हाथ लगाए । मैं नहीं जानता कि आज के सामाजिक परिदृश्य में महिलाएं इस फन  को किस तरह से लेंगी ? आखिर इंच टेप और हाथों से नाप लेना साइन्स है तो अधिक स्वीकार्य होना चाहिए ,बनिस्पत आँखों से अंगों को निहार या घूर कर उनके   उभार-गिरावट-चौड़ाई-लंबाई की  कल्पना कर लेने के । बहरहाल अधिकतर महिलाएं परपुरुष के स्पर्श के बगैर ही नाप दे सकने में  राहत भी महसूस कर सकती हैं –ज़माना कुछ ऐसा ही  है ।

 

राजकुमार का चरित्र एक तवायफजादा  है । जिस गांभीर्य से वह इस सच को अंगीकार करता है ,काबिलेतारीफ है । राजू के अपने पिता के साथ कुछ संवाद हैं ,जो उसके अभिनय कि गहराई का शानदार मुजाइरा करते हैं। बरेली की  बर्फी के बाद यहाँ भी राजकुमार नें हास्य में अपना लोहा मनवाया है । कहने कि ज़रूरत नहीं कि नाज़ुक मौकों और अवसाद के तो वह बादशाह हैं ही  ।अपारशक्ति और अभिषेक बनर्जी ने राजकुमार के मित्रों के तौर पर अच्छा काम किया है । श्रद्धा कपूर अब स्थापित हो गयी हैं और उन्हे अच्छे रोल मिल रहे हैं । बत्ती गुल  कि तरह यहाँ भी उनका अभिनय ठीक-ठाक है । एक डायन-चुड़ैल के रोल में उनकी सादी खूबसूरती आश्चर्यजनक तौर से फिट बैठती है ।

 

पंकज त्रिपाठी गाँव के बकलोल शिरोमणि की भूमिका में हैं । उन्हें स्त्री के इतिहास और बचाव के तारीखों के बारे में बहुत कुछ पता है । जो अगर नहीं भी है,तो कमसकम इतनी  जानकारी तो जरूर  है  कि कौन  महानुभाव इस विषय में दखल रखते होंगे । इसी तरह वे बाकी पात्रों को साथ लेकर एक शास्त्री जी के पास पहुँच जाते हैं जो और कोई नहीं बल्कि स्वयं  विजय राज़ दि ग्रेट हैं  । विजयराज को ,आश्चर्यजनक तौर पर ,यहाँ हवाबाजी का कोई मौका नहीं मिला है । ही इज़ टोटली सब्ड्युड एंड आउट ऑफ फार्म  ।  पंकज त्रिपाठी जिस भी सीन में मौजूद हैं ,केन्द्रबिन्दु वही हैं ।

 

‘ कल आना ’ या ‘नला बे’  कर्नाटक और आंध्र के घरों कि दीवारों पर लिखा जाता रहा है । । जैसा फिल्म में दिखाया है ये  डायनें  भी भटकती दुलहनें ही थी ,जो किसी कारणवश अतृप्त रह गयी मानी जाती थीं  । भारत के परिप्रेक्ष्य में ऐसी कथाएँ और फिल्में बहुत संवेदनशील साबित हो सकती हैं । आखिर फिल्म में डायन दिखाई भी गयी है ,और उसकी चोटी की  महिमा का बखान भी है । इन सब से हमारे समाज में अंधविश्वास को बल  मिल  सकता है । सिनेमा को सिर्फ कला या मनोरंजन के तौर पर देखने कि काबिलियत हम में कितनी है ,यह कहना मुश्किल है ।

 

सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है फिल्म  डराती कितना  है ? दो घंटे में  तीन-चार ऐसे मौके ज़रूर आते हैं जब डर या झटका सा लगता है । यह विशुद्ध हॉरर फिल्म नहीं है ,पर कुछ-एक मौकों पर हिला-सा जाती है । लेकिन  मुख्य तौर पर इस फिल्म को राजकुमार और पंकज त्रिपाठी के हास्य अभिनय के लिए याद रखा जाएगा । और एक छुईमुई सी ,हैप चुड़ैल के लिए जिसके लिए दिल में चाहत ही नहीं ,श्रद्धा भी उत्पन्न होती है ।

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