अनुराग कश्यप की मनमर्जियाँ-गुड न्यूज़ फॉर गुड बॉय्ज़ एंड वुमेन ऑल्वेज़ हेव वन इन द हेंड एंड टू इन द बुश

(SPOILERS)

“एक बात बताओ, आप क्या बचपन से ही राम जी टाइप हो ?  राम जी  भी कभी-कभी   कैरक्टर के  बाहर निकाल आते थे ।”

रोमी टू रोबी …

रोबी (अभिषेक बच्चन) का किरदार   राम  सरीखा ही  धैर्यवान निकला और उनसे  बहुत ज्यादा लिबरल भी  । और आखिर में किसी धोबी के कुछ बकने  पर तो  नहीं ,पर अपने अहम पर चोट लगने कि वजह से वह भी अपनी धर्मपत्नी का त्याग कर देता है । वहीं से एक मूलभूत सवाल उठता है कि क्यूँ  सब कुछ जानते-बूझते हुए भी इस  एनआरआई बैंकर ने किसी और  के फटे में एक नहीं बल्कि दोनों  पैर डाल दिये   ? वह शुरू से ही नायिका की  परपुरुष आसक्ति से परिचित था तब क्यूँ देवतुल्य बना घूमता रहा । यह सस्पेन्स ता-फिल्म बना रहता है । शायद फिल्म खत्म होने के बाद भी ।   राम जैसे शीतल चरित्र से कोई गरम दूध पीकर मुंह जला लेने जैसे कृत्य की अपेक्षा नहीं रखता ।

पर अभिषेक बच्चन से ज़रूर कर सकता  है ।

सलमान खान जैसे दुरान्त बौड़म को धता बताकर उसकी  लॉन्ग टाइम महबूबा ऐश्वर्या से विवाह रच कर अभिषेक ने खुद को हिमालय जैसा अडिग और खतरों का खिलाड़ी साबित किया है । राहुल गांधी सरीखों ने भी जब अभिषेक को अपने पिता के सामने बौने होने पर ताने कस डाले ,तो भी  जूनियर ने होश नहीं खोये अपितु हंस कर राहुल की मूर्खज़बानी को हवा कर दिया । ऐसा शांतचित्त ,शूरवीर इंसान जीवन में  क्या नहीं कर सकता । फिर भी मैं कभी सोच नहीं सकता था कि अभिषेक जैसे फेलशुदा अभिनेता  को अनुराग कश्यप सरीखे डाइरेक्टर की फिल्म में रोजगार मिल सकता है ,मगर वह उसे वह भी मिला ।

और क्या खूब मिला । इससे बेहतर कास्टिंग हो नहीं सकती । अभिषेक इससे बढ़िया काम कर नहीं सकता । मैं अब  इस रोल में किसी और को रखकर सोच नहीं सकता ।

विकी (कौशल) एक डीजे है पर उसका फुल टाइम काम है रूमी (तापसी पन्नू) के साथ आशिकी करना । रूमी स्टेट हॉकी केंप तक पहुंची  थी पर विकी के चक्कर में खेलना छूट गया   । दोनों एक दूसरे को  बेहद चाहते हैं  जिसके इज़हार का एकमात्र तरीखा उनके  पास  है बकैती से भरपूर सेक्स  । क्या इतना भर प्यार नहीं है ? क्या यही प्यार है ? वे एक दूजे को मिले बिना  रह नहीं सकते – गली में नाचते गाते,छतें कूदते ,दीवारें फाँदते ,घरवालों की आँखों में धूल झोंक कर घर में ही मिलते , और जब भी मिलते  तो एक-दूसरे को  छूए बिना रह  नहीं सकते  । रहें  भी क्यूँ ?  शायद अनुराग के हिसाब से किसी के बिना, और उस से मिलने पर उसे  छूए बिना, न रह सकना  ही प्यार है ।

जो भी हो लेकिन यह  स्पष्ट है कि इस युगल के दरम्यान  मामला एकदमे टाइट है ।

ऐसे में लंदन से शादी करने आ टपकता है  रोबी बैंकर । एक शालीन ,संभ्रांत, समझदार एनआरआई ,पर अनुराग कश्यप  की संकल्पना  में एक  बोरिंग लौंडा, जिसको जब शादी के हिसाब से एक हॉकी खेलने वाली लड़की (रोमी ) की तस्वीर दिखाई जाती  है तो वह उसपर लट्टू हो  जाता है । एक डेन्टिस्ट लड़की का विकल्प भी रोबी को सुझाया जाता है पर वह उसे  रूमी जितनी कूल नहीं लगती (अनुराग का भी यही खयाल है –पढ़ने लिखने वाले और नौकरीपेशा लोग रसहीन होते हैं )  । फ़ेसबुक पर रूमी को खंगालते हुए बैंकर  जल्द ही समझ जाता है कि  हॉकी बेब किसी लफ़ाडी डीजे के साथ इश्क की  पींगे पढ़ रही है  ।

खैर बात रुक-रुक कर आगे बढ़ती है ,हिचकोले खाते हुई । शादी को लेकर कभी हाँ –कभी ना करती  रूमी के बारे में  रोबी को कोई मुगालते  नहीं है । वह जानता है कि रूमी और विकी के इश्क़ का रंग गहरा है ,लेकिन कितना फ़िज़िकल है ,शायद उतना नहीं जानता जितना कि हम दर्शक देख रहे  हैं ।  रोबी को अपनी मेच्योरिटी पर  गुमान है ,या फिर अपने वेल प्लेस्ड होने का आत्म-विश्वास ,या हो सकता है वह फोटो देखकर वास्तव में सच्चा प्रेम करने लगा हो और दिल के हाथों मजबूर हो ,पर यह बात मुश्किल से ही गले उतरती है कि आज के आधुनिक परिदृश्य में भी कोई मर्द इतना लिबरल या अपनी  चाहत के आगे इतना  हेल्पलेस हो सकता है कि किसी शेरनी को उसके शेर से जुदा करके उसके  साथ समागम करने की हसरत पाल  सके  । बैंकर के शब्दों में वह रूमी से बेइंतेहा प्यार करता है और उसके लिए डीजे के मुक़ाबले में एक और ऑप्शन (विकल्प )बनना चाहता है । समटाइम्स यू गोट टू लव दीस फ्रीक्स । दे टेक द  गेम हैड ऑन ।

धर्मवीर भारती के ‘गुनाहों का देवता’ को  पढ़कर भी मैं समझ नहीं पाया था कि प्यार और वासना में अंतर क्या है ? क्या रूमानी मोहब्बत  ,शारीरिक प्यार से इतर  है ? क्या तस्वीर देखकर ही प्रेम हो सकता  है या सिर्फ मन ही मचलता है ? रोबी को रूमी पहले हॉट लगी ,फिर अच्छी । रूमी को रोबी पहले अच्छा लगा ,फिर हॉट । शायद जब कोई किसी को  दोनों ही लगने लगे-हॉट और अच्छा –तब प्रेम हुआ माना जा सकता है  । फिर शादी का कोण भी है । ज़रूरी नहीं कि अगर दोनों तरफ प्यार हो –विकी और रूमी- तो भी शादी वाजिब हो । रूमी आशिक ढूंढते-ढूंढते हसबेंड मटिरियल तलाश लेती है । कुल मिलाकर मनमार्जियाँ देखकर भी प्यार की परिभाषा तो समझ में नहीं आयी । पर इतना ज़रूर समझ आया कि कैसे एक लड़की अपने अपरिपक्व साजन  को चलता कर सकती है अगर  उसे एक ठोस प्रोस्पेक्ट्स वाला स्टेबल ,वेल सेट्टल्ड ,जिम्मेदार  व बीबी के नखरे और बच्चों का सरदर्द उठा सकने वाला  पति-अयस्क (ore) मिल जाए तो  ।

शुक्र है यहाँ पर जातियों का मुद्दा नहीं उठा  वरना इतने जटिल इमोश्नल  माहौल में  साईराट भी  बन जाती , धर्म कि बात नहीं उठी नहीं तो बॉम्बे कि याद आ जाती और अगर किरदारों में कोई भी पंजाब के अलावा दूसरे राज्य का होता तो 2 स्टेट्स बनानी पड़ जाती ।  यहाँ पेंच बस दिल के लगे हैं पर  अनुराग ने पूरी मकर संक्रांति का पतंगोत्सव मनवा दिया है ।

 

दो सीख है – पहली ,लंपट लौंडे प्यार-मोहब्बत  में भले बाज़ी मार लें ,पर शरीफ,पढे -लिखे ,अच्छी नौकरी करने वाले लड़के कमसकम विवाह के खेल में, अगर अनवरत  लगे रहें, तो अधिक सफल होने की उम्मीद रख सकते  हैं  ।

दूसरी –अगर अहम और सामंतवादी सोच को किनारे रख कर कतार में खड़े रहें तो हॉट लड़की भले ही प्रेमिका के तौर पर न मिले ,पर बीबी के रूप में मिल सकती है ।

मनमार्जियाँ इस लिहाज से अच्छे बालकों  के लिए अच्छी खबर है । बचपन या जवानी में गर्लफ्रेंड न भी बनी तो अधेड़ उम्र में अच्छी ,हॉट पत्नी मिलने की  संभावना  को खारिज नहीं किया जा सकता  ।

 

नोट –विकी कौशल और तापसी पन्नू का अभिनय जानदार है । पर फिल्म की  आत्मा अभिषेक है । फिल्म थोड़ी लंबी ज़रूर  है ,पर बेहतरीन अभिनय और संगीत ने समा बांध दिया है । अगर हम नैतिकता और  सभावनाओं टाइप कि फूहड़ कसौटियों पर फिल्म को न परखने बैठें  तो यह एक शानदार प्रस्तुति  है । उससे भी अधिक  आज के युग में प्रेम,विवाह और सम्बन्धों को समझने के लिहाज से  यह एक महत्त्वपूर्ण फिल्म है । इसे सबको देखना चाहिए ।

 


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6 Comments Add yours

  1. gautamshruti says:

    Although I didn’t find manmarziya this much good as the reasons you have stated: abhishek’s approval of rummi as wife and then leaving for a reason very well known to him. He seems confused. Vicky ek louta banda hai script me jo apni bhoomika me shuru se end tak clear hai. Film dekhne layak jaroor hai magar prem aur vivah ki parate kholne ke hisaab se thodi kamjor lagi. Abhishek ki acting achchi hai. Jaisa character tha us hisab se. Baki storyline confusing hai bahut. When vicky is changing himself, rummi tells him to go. Rest, music theek hai. Film amrita preetam ko dedicate ki gai hai. Main tenu fir milangi ki do lines ke alawa kuch nhi hai isme amrita ji ko dedicate karne layak. Prem ko thoda aur gahra dikhana tha.. thoda sa to.

    Opinion is sheer personal. Hope you don’t mind. 🙂

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    1. abpunch says:

      Shruti,i think Anurag meant to depict how love,relationships and marriages are in these times.Too much of social freedom has given a chance to people to express themselves a lot-physically,on social media,in front of families ….hence there is not a proper alignment between their desires,hopes and actions….which is why such situations occur.Remember ,this is just a story,not a template for society.AK is not saying this is love,he is just showing u three characters and their lives.

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