एक पति का आत्मघात – दोषी कानून या समाज ?

आखिर में किसी को क्या मिल गया  ? वह ऐसा अवसाद ग्रस्त हुआ कि चला ही गया  । इतना दबाव भी अपने  पति  पर क्या बना देना  कि ऐसे हीरे के जेहन में  भी आत्मघात करने का ख्याल पनप जाए  ? आईआईटी से स्नातक ,भारतीय पुलिस सेवा में कार्यरत और  अपने गृह राज्य में गृह नगर के बगल वाले शहर में एसपी के पद पर सुशोभित  । तीस साल का यह मेधावी युवक आईआईटी जेईई और यूपीएससी सरीखी कठिन परीक्षाओं को पार करके बड़े सपने सँजोये  वहाँ तक पहुंचा होगा । उसने अपने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि हर बाधा को आसानी से पार कर सकने  वाला वह स्वयं कभी खुद की हस्ती मिटाने जैसा क्षुद्र कार्य करने पर मजबूर हो जाएगा । कोई इस तरह से  नहीं सोचता (यह भी एक बड़ी समस्या है )

सिवाय पारिवारिक कलह के अब तक आत्महत्या का कोई और कारण  सुनने या पढ़ने में  नहीं  मिला है । शोक से अधिक  क्षोभ होता है । डेढ़ साल भी नहीं हुआ था विवाह हुए । ये कौन सी  रणनीति है   जिसके चलते पति के परिवार को पूरी तरह से हाशिये पर डाल दिया गया  ? मृतक जब अपने परिवार से बात करता या मिलता जुलता तो झगड़ा होता था  ।खानपान का विवाद  समझ में आता है पर क्या पुत्र अपनी माँ और भाइयों से मेल जोल भी नहीं रखे ? क्या वह अपनी उत्पत्ति को ही  भूल जाए ? अपनी माँ से फोन पर बात किए हुए उसे दो महीने से अधिक हो गए थे । ये कैसा आत्मसमर्पण है ?ऐसे नियंत्रण झेल पाना किसी पुरुष के लिए कहाँ तक  संभव है ? इतना तुष्टीकरण नहीं करना चाहिए,चाहे लाभकर्ता आपकी प्राण प्राणेश्वरी ही क्यों न  हो । शुरू ही से नहीं ,कभी भी नहीं-न ऐसा करना उचित है ,न  न्यायसंगत   ।

अब बेचारा कोई  अफसर करे भी तो क्या करे  ? सरकारी आवास में बीबी झगड़ा करेगी तो बेइज्जती अफसर की  ही होगी । आने जाने वालों के सामने अभद्र व्यवहार से भी उसी की साख में बट्टा लगेगा  ? कुछ शरीफ लोग इस ब्लैकमेल के सामने घुटने टेक देते हैं । अलगाव और संबंध विच्छेद यथार्थवादी विकल्प नहीं हैं क्यूंकी कानून महिला सुरक्षा के नाम पर विषैले  हथियार पत्नियों के सुपुर्द कर देता   है । दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा के नाम पर किसी भी शख्स को  लपेटा जा सकता है । हो सकता है साल -दो साल बाद सब सैटल  हो जाए  (नहीं भी हो सकता है ) ,पर इसके इस्तेमाल से तुरंत प्रभाव से इज्ज़त का जुलूस तो निकाला  ही जा सकता है । इन क़ानूनों कि न्यूसेंस वैल्यू से डरकर बेचारा पुरुष,खासकर वो पति जिसके पास खोने के लिए कुछ है , हर मोड पर एडजस्ट करने की राह तलाशता  है । ये दोनों कानून दबाव बनाने वालों  के हाथ में वेपन ऑफ मास डेसट्रकषण  के तौर पर काम आते हैं ।इनके चलते  सामाजिक रिश्ते बहुत खिंचाव महसूस कर रहे हैं ।

सच्चाई जो भी रही हो मृतक के परिजन हाथ मलते ही रह गए   । अंगूठे के नीचे जिसको दबाना चाहा  वो तो अब  पंचतत्त्व में विलीन हो चुका है । थोड़ी सी सद्बुद्धि उसकी भार्या में होती  और थोड़ी सी  बेपरवाही उस जवान ने दिखाई होती तो यह ट्रेजडी टल सकती थी  । न्याय-व्यवस्था को भी यह सब समझना चाहिए ।  करोडों पिस रहे हैं इन क़ानूनों  के डर से  ।

जब से एसपी के जहर खाने की खबर आयी है तब से  मन में बहुत विक्षोभ है । एक प्रकार के उन्माद से भर गया हूँ। शोकग्रस्त  नहीं हूँ,जाने वाले ने  स्वेच्छा से पलायन किया  है । आत्मघाती चाहे मित्र हो या परिजन ,वह शोक का पात्र  नहीं है  । हृदय में मृत आत्मा के लिए  सम्मान है ,वह अजर,अमर है । पर यह कृत्य कायरतापूर्ण और निंदनीय   है । जब मृतक की माँ,पिता और भाई बहनों के बारे में सोचता हूँ तो खिन्न हो उठता हूँ  । मैं नहीं जानता क्या हुआ ,कैसे हुआ । शायद कोई जान भी नहीं पाएगा । बस जो अखबारों में छप रहा है ,उसी को पढ़कर उद्विग्न हूँ।

यह पढ़ा कि स्त्री से समन्वय नहीं था । शायद माँ और बीबी में बनती नहीं थी । किसी कि बनी है क्या आज तक ? क्या यह कोई संगीन मुद्दा है  ? शादी,जो कि बस  एक कांट्रैक्ट भर  है ,के फेर में फंस  कर कोई अपनी माँ से रूठकर ऐसे ही  चला जाता है  ? किसी का क्या गया उस माँ के सिवाय ? अफसर दूसरा आ  चुका होगा । पत्नी को दूसरा पति भी कुछ समय बाद मिल ही  जाएगा । अपूरणीय क्षति सिर्फ माँ की हुई है  । आप स्वयं तो चिंताओं से मुक्त  हो गए । देशसेवा के सपने,समाज सुधार के संकल्प सब जल कर खाक हो गए । माँ और मातृभूमि दोनों को अंगूठा दिखा दिया सिर्फ  इसलिए की साल भर पुरानी पत्नी से विवाद चलता था  ? वह आपको घर वालों से मिलने नहीं देती थी ? माँ से बात किए हुए तीन महीने बीत चुके थे ? क्या जीवन पत्नी के सुपुर्द कर दिया था ? आत्मबल कहाँ चला गया ? ऐसा नैराश्य कैसे उत्पन्न होने दिया  ? इन सवालों के कोई जवाब नहीं हैं । खुद के प्राण हरने वाला कोई मूर्ख , नौसिखिया या अनपढ़ आदमी नहीं था । जब उसने ऐसा कदम उठा लिया  तो समझो कोई भी ऐसा कदम उठा सकता है  ।

क्या आपने ठेका लिया था कि माँ और बीबी के मध्य माधुर्य हो  ?  हमेशा सफलता चूमने वाला इंसान यह  मान बैठता है कि वह  सिरमौर है और उसका जीवन एक मिसाल कि तरह  होना चाहिए । इस फेर में न पड़िए । आत्मघात कर तो कोई भी सकता है। करने वाले के सर पर सींग नहीं होते । तनाव सबको होता है । कोई जीवन त्रुटिहीन और समस्याविहीन  नहीं है । झगड़े  कहाँ नहीं हैं ? आदर्श प्रेम उपन्यास और फिल्मों में मिलता  है । छोटे छोटे रोज़मर्रा में होने वाले विवाद अवसाद को जन्म दे सकते हैं ।

इसलिए बात करिए ,हल्के रहिए । दोस्त होने चाहिए । एक दो बुरी आदतें भी रखने में कोई  हर्ज़ नहीं है । तनाव पर पार पाने में व्यसन बड़े कारगर सिद्ध होते  हैं । युधिष्ठिर जुआरी था  ,कृष्ण की असंख्य रानियाँ थीं । दोनों ने जीवन के कठिन पल भी मज़े में काट दिये  । मर्यादा पुरुषोत्तम में दुर्गुण नहीं थे । तभी एक धोबी जैसे कर्कट के ताने भर से ही पत्नी का परित्याग कर बैठे  और परिवार उजाड़ दिया  ।

और शादी वादी को इतना सर पर मत बैठाईये  । विवाह इत्यादि  आपकी अपनी खुशी के लिए किए जाते हैं  ,न की सामाजिक प्रतिष्ठा या परिवार के सुख के लिए । माँ से तलाक संभव नहीं है । माँ के  प्रति संतान की  मूलभूत ज़िम्मेदारी है कि वह कमसकम अपने जीवन का तो सम्मान करे । दहेज और डोमेस्टिक वायलेंस कानून खतरनाक तो हैं पर प्राणघातक  क्षमता नहीं रखते । अगर आप कोई बड़े अपराधी नहीं है तो परस्पर मनमुटाव होने पर भी  यह कानून आपकी  इज्ज़त का रायता ही बना सकते हैं, आपकी नौकरी नहीं खा सकते ।कुल मिलाकर आपको  ऐसा नुकसान नहीं पहुंचा सकते कि आप मरण को जीवन पर तरजीह दें ।

शिद्दत से प्यार कीजिये  ,शादी हो जाए तो निभाने की कोशिश भी करिए   ,पर अगर पानी और पत्नी सर के ऊपर  से गुजरने लगें  तो यह सब हितैषियों से शेयर करें  । समस्या तभी तक समस्या है जब तलक प्रियजनों में उसे  बांटा नहीं गया  है । साझा होने पर उपाय मिलने लगते हैं । समाज से इतना मत डरो । यहाँ सब नंगे हैं । राम का भी तो सेपरेशन हुआ था ,फिर भी भगवान पुजाए । स्पाउस के मारे दुनिया में आप  अकेले नहीं हैं । भतेरे घूम रहे बाजार में । एक से बात करोगे ,चार निकलेंगे झुरमुट से – तलाक़शुदा ,सेपरेटेड ,अग्रिम जमानत धारी  ,हर रोज़ कलह के मारे , प्यार के भूखे  ,डिसिप्लिन में जकड़े हुए ,दबाव में जी रहे- प्रेत ,भूत ,जिन्न,पिशाच ,नरकंकाल ।

इस केस में सत्य अब एक अटकल के तौर पर ही  जीवित रहेगा  । हो सकता है अनाचार सहन के बाहर हो गए हों । चाहे नौकरी या शादी पर ही बन आई हो । तो भी क्या यह एक वाजिब कदम था ? वाजिब शब्द बेमानी है । ऐसी  सोच ही बेमानी है । आत्महत्या करने वाला तर्क और यथार्थ के बारे में नहीं सोच पाता । और   दोष चाहे मृतक का हो या उसकी पत्नी या परिवार का,कानून का चाहे सामाजिक संरचना का,मूल बात यह है कि एक युवा असमय मृत्यु कि गोद में समा गया।  ऐसा करने वाला आखिरी पति नहीं होगा ।

 

 

 

 

 

 

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